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अब अंतरिक्ष का कबाड़ साफ करने की तैयारियों में जुटे हैं

  • अंतरिक्ष अनुसंधान के भविष्य के लिए खतरा है यह कबाड़

  • मृत सैटेलाइट और उसके टुकड़े कभी भी बन सकते हैं खतरा

  • पृथ्वी के बाहर घूम रहे हैं असंख्य खलोगीय वैज्ञानिक कचड़ा

  • अंतरिक्ष में पकड़कर गुरुत्वाकर्षण में जलाने की योजना पर काम

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अब अंतरिक्ष का कबाड़ साफ करने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। पिछले

कई दशकों से लगातार हो रहे अंतरिक्ष अनुसंधान की वजह से अब अंतरिक्ष में खास कर

पृथ्वी के वायुमंडल के ठीक बाहर यह ढेर सारा कचड़ा एकत्रित हो गया है। इनमें से

अधिकांश बेकार हो चुके सैटेलाइट है। जो पृथ्वी के बाहर चक्कर लगा रहे हैं। किन्हीं

कारणों से अथवा किसी खगोलीय असंतुलन की वजह से अगर वे पृथ्वी के अंदर की तरफ

आ गये तो बड़ा खतरा हो सकता है। साथ ही यह कचड़ा भविष्य के अंतरिक्ष अनुसंधान के

रास्तों में भी अड़चनें पैदा कर रहा है। इसी वजह से अब अंतरिक्ष का कचड़ा साफ करने पर

गंभीरता से काम हो रहा है। इस दिशा में एक बिल्कुल नया प्रयोग कजाकिस्तान में भी

किया गया है। सोमवार की सुबह (स्थानीय समय के मुताबिक) वहां की बाईकोनूर

कॉस्मोड्रोम प्रयोगशाला में इसका परीक्षण किया गया है। इस प्रयोग को जमीन पर

इसलिए आजमाया जा रहा है ताकि पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में चले जाने की स्थिति में वह

सही तरीके से काम कर सकता है, उसकी प्रारंभिक जांच हो सके। इस विधि से अंतरिक्ष में

मंडराते इस किस्म के कचड़ों को पकड़कर नष्ट करने की योजना है। वैज्ञानिक अनुमान के

मुताबिक पृथ्वी के ठीक बाहर इस किस्म का करीब आठ हजार मेट्रिक टन कचड़ा एकत्रित

हो गया है। इससे कई किस्म की परेशानियां अब भी महसूस की जा रही हैं। इन कचड़ों से

हमारी दूरसंचार सेवा अथवा मौसम संबंधी जानकारी भी कभी भी प्रभावित अथवा ठप भी

पड़ सकती है। जिस विधि को कजाकिस्तान के प्रयोगशाला में आजमाया जा रहा है, उसकी

तकनीक का मूल आधार यह है कि इन सभी को पकड़कर उन्हें पृथ्वी के वायुमंडल के अंदर

धकेल दिया जाए।

अब अंतरिक्ष का कबाड़ खतरा बनता चला जा रहा है

अब अंतरिक्ष का कबाड़ साफ करने के लिए वैज्ञानिक इस सारे कचड़े को क्रमवार तरीके से

पृथ्वी की तरफ धकेलने की योजना पर प्रयोग कर रहे हैं। यह माना जा रहा है कि

वायुमंडल में प्रवेश करते ही गुरुत्वाकर्षण की वजह से इनमें जो गति पैदा होगी, उससे

उत्पन्न घर्षण की वजह से वे आसमान पर ही जलकर राख हो जाएंगे। जिस विधि को इस

काम के लिए आजमाया जा रहा है, उसका नाम एल्सा डी है। इसका पूरा नाम एंड ऑफ

लाइफ सर्विसेज बाई एस्ट्रोस्केल है। इस काम को अंजाम देने के लिए इसके तहत बनाये

गये उपकरणों को किसी अन्य उपग्रह की मदद से अंतरिक्ष में पहुंचाया जाएगा। इस

अनुसंधान के साथ जापान की एक कंपनी भी जुड़ी हुई है। इस काम को अंजाम देने के लिए

चुंबकीय गुणों का इस्तेमाल किया जाने वाला है। अंतरिक्ष में मौजूद इस कबाड़ में लोहे के

किसी भी स्वरुप के अंश है। इसलिए जब चुंबकीय शक्ति से उन्हें अपने साथ सटा लिया

जाएगा तो उन्हें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के दायरे में लाया जाएगा। यहां तक आने के बाद

सफाई रोबोट की तरह काम करने वाले उपकरण अपना चुंबकीय ताकत बंद कर देगा।

इससे अंतरिक्ष का कबाड़ पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के अंदर आने के बाद नीचे आते हुए घर्षण

की वजह स जलकर राख हो जाएगा। इस तकनीक से एक एक कर अब अंतरिक्ष का कबाड़

साफ किया जाता रहेगा। वैसे इस विधि में इस बात का भी ध्यान दिया जा रहा है कि किसी

खास इलाके का कचड़ा पूरी तरह साफ कर लेने के बाद ही दूसरी तरफ ध्यान दिया जाए।

इससे जमीन पर स्थापित नियंत्रण कक्षों को भी यह देखने में मदद मिलेगी कि भविष्य के

अंतरिक्ष अभियानों के लिए कौन सा इलाका ज्यादा साफ हो चुका है।

इस प्रक्रिया का परीक्षण कर सुधार किया जाएगा

मिली जानकारी के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया को यूके से आजमाया जाएगा। वहां से

उपग्रह को छोड़ा जाएगा। यह क्रम लगातार छह महीने तक चलता रहेगा। इसके जरिए जो

उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा जाएगा उसकी कार्यक्षमता की भी जांच होती रहेगी क्योंकि कचड़ा

साफ होने के बाद अर्थ स्टेशनों से भी यह पता चल पायेगा कि जिन कचड़ों को वे देख पा

रहे थे, वे धीरे धीरे कम होते जा रहे हैं। वैसे इस पूरी विधि में छोटे कचड़ों को ही जलाने की

तैयारी है। अंतरिक्ष में मंडराते मृत उपग्रहों को पकड़कर पृथ्वी की सीमा में लाने की कोई

योजना इस प्रयोग में शामिल नहीं है। वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया है कि भविष्य में ऐसे

उपग्रह भेजे जाएंगे, जो इन मृत सैटेलाइटों को अपने साथ चिपकाकर जलाने के लिए

पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के दायरे में ला सकें। दरअसल अब अंतरिक्ष का कबाड़ इसलिए भी

बढ़ता चला गया है क्योंकि कई बार गुरुत्वाकर्षण की सीमा से बाहर मंडराते ऐसे उपकरण

आपस में टकराकर भी छोटे छोटे हिस्सों में बंट गये हैं। अपनी अंतरिक्ष सैन्य ताकत का

परीक्षण करते हुए भारतवर्ष ने भी वर्ष 2019 में अपने ही एक सैटेलाइट को अंतरिक्ष में उड़ा

दिया था। उसके भी सैकड़ों टुकड़े अब वायुमंडल में मंडरा रहे हैं। जापान द्वारा इसके पहले

भी एक नेट लगा सैटेलाइट भेजा गया है जो अपनी जाल में ऐसे टुकड़ों को एकत्रित करने में

सक्षम है। जाल में कैद होने वाले टुकड़ों को बाद में पृथ्वी की तरफ धकेलकर जला दिये

जाने का क्रम भी जारी है।

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