चुनाव के मौसम में अयोध्या पर फिर से शांति का माहौल

सर्वोच्च न्यायालय ने राफेल मामले में फैसला सुरक्षित रखा
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चुनाव का बुखार पूरे देश में धीरे धीरे चढ़ता जा रहा है।

ऐसे में अगर अयोध्या का मामला फिर से चर्चा के केंद्र में रहता

तो निश्चित तौर पर कुछ लोगों को इसी मुद्दे पर फिर से राजनीति करने की छूट मिल जाती।

घटनाक्रम यह साबित कर चुके हैं कि कई लोगों के लिए अयोध्या में

राम मंदिर का मुद्दा दरअसल एक चुनावी मुद्दा है।

हर चुनाव के पहले इस मुद्दे को अपनी झोली से निकाला जाता है

और चुनाव निपट जाने के बाद उसे फिर से वापस झोली में डाल दिया जाता है।

इसके बहाने वोट और चंदे की दुकानदारी अच्छी हो जाती है।

इस बार सर्वोच्च न्यायालय की भी आलोचना में अनेक लोग पीछे नहीं थे।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन आलोचनाओं की परवाह किये बिना अपने तरीके से काम किया।

अदालत का रुख भांपते हुए ही कुछ संगठनों ने अपने मंदिर निर्माण के आंदोलन को स्थगित करने का एलान कर दिया।

जगतगुरु शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती ने कश्मीर की स्थिति को

ध्यान में रखते हुए अपने आंदोलन को स्थगित करने की घोषणा कर दी।

जो लोग पहले अदालत द्वारा इस मामले को टालने का आरोप लगाकर बयानबाजी कर रहे थे।

यह कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट जानबूझकर हिंदुओं की धार्मिक भावना के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

इन आरोपों के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने प्रारंभिक देर के बाद भी

अंततः संविधान पीठ का गठन किया और इसी पीठ ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थों की भूमिका तय कर दी।

सही फैसला यह भी है कि इस प्रक्रिया को बंद कमरे में करने की हिदायत दी गयी है।

बंद कमरे में होने वाली मध्यस्थता से कमसे कम किसी को नये सिरे से

अपनी दुकान चलाने का मौका नहीं मिल पायेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद

के सौहार्दपूर्ण निपटारे के प्रयास के तौर पर मध्यस्थता को अहमियत

प्रदान करते हुए शुक्रवार को मध्यस्थकार नियुक्त किये। 

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय

संविधान पीठ ने शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश एफ एम कलीफुल्ला की

अध्यक्षता में तीन-सदस्यीय मध्यस्थकार समिति गठित की,

जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू शामिल होंगे। 

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आवश्यकता पड़ने पर और लोगों को भी समिति में शामिल किया जा सकता है।

समिति कानूनी सहायता भी ले सकती है। 

न्यायमूर्ति गोगोई ने संविधान पीठ की ओर से आदेश सुनाते हुए कहा कि मध्यस्थता की प्रक्रिया गोपनीय रहेगी और इस पर पूरी तरह मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध रहेगा। 

यह अपने आप में विवाद को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण निर्णय है क्योंकि पूर्व में भी दरअसल मीडिया रिपोर्टिंग के बहाने मीडिया ट्रायल की वजह से अधिकांश अवसरों पर सुलह के मौके भी नष्ट हुए हैं।

मध्यस्थता की प्रक्रिया फैजाबाद में होगी और समिति को चार हफ्ते में प्रगति रिपोर्ट सौंपनी होगी।

मुख्य न्यायाधीश ने आदेश में कहा, ”हमें इस मसले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का रास्ता अपनाने में कोई कानूनी बाधा नजर नहीं आती है। ”

संविधान पीठ में न्यायमूर्ति गोगोई के अलावा एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।

न्यायालय ने कहा कि मध्यस्थता प्रक्रिया की सफलता सुनिश्चित करने के लिये इसकी कार्यवाही बंद कमरे में होगी और इसे आठ सप्ताह में पूरा किया जायेगा।

यह वह अवधि है जिसमें न्यायालय ने अयोध्या मामले के मुख्य पक्षकार मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुवाद का अवलोकन करने की अनुमति दी है।

पीठ ने कहा कि इस विवाद का संभावित समाधान तलाशने के लिये इसे मध्यस्थों को सौंपने में उसे कोई कानूनी अड़चन नजर नहीं आती है।

शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि मध्यस्थता की कार्यवाही की सफलता

सुनिश्चित करने के लिये इसकी कार्यवाही में पूरी गोपनीयता बनाये

रखी जानी चाहिए और मध्यस्थ तथा पक्षकारों के विचार गोपनीय

रखे जाने चाहिए तथा किसी भी व्यक्ति को इसकी जानकारी नहीं दी जानी चाहिए।

पीठ ने कहा, हमारी यह भी राय है कि जब मध्यस्थता की कार्यवाही चल रही हो

तो इसकी किसी भी मीडिया -प्रिंट तथा इलेक्ट्रानिक- को

इसकी कार्यवाही की रिपोर्टिंग नहीं करनी चाहिए।

हालांकि, पीठ ने इस संबंध में कोई स्पष्ट आदेश देने से गुरेज किया

और आवश्यकता पड़ने पर इस कार्यवाही के विवरण के प्रकाशन पर

रोक लगाने के बारे में लिखित में आदेश देने का अधिकार मध्यस्थों को दे दिया।

इससे स्पष्ट हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव में यह राम मंदिर नये सिरे से चुनावी मुद्दा नहीं होगा।

साथ ही यह भी स्पष्ट हो चुका है कि चुनाव होने तक इस मध्यस्थता की रिपोर्ट भी नहीं आयेगी।

ऐसे में चुनावी अखाड़े में राम मंदिर का मुद्दा किसी के लिए दांव लगाने का हथियार नहीं बनेगा।

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