दिल्ली की नकल करना अब दूसरे राज्यों की मजबूरी

दिल्ली की चाल से भाजपा बेहाल

दिल्ली में सरकारी सेवाओं के एक भाग को घर पहुंच सेवा में शामिल कर वहां की सरकार ने



बिना कुछ कहे ही दूसरे राज्यों को ऐसा करने पर सोचने के लिए बाध्य कर दिया है।

जाहिर है कि वहां की पूरी पद्धति को समझने के बाद अन्य राज्यों में भी मामूली फेरबदल के साथ

इस योजना को नये नाम से लागू किया जाएगा।

ठीक इसी तरह मोदी केयर योजना को भी केजरीवाल केयर नाम से दिल्ली में चलाने की

आम आदमी पार्टी ने पहले ही मांग रखी है।

इसलिए समझा जा सकता है कि जनता को आने वाले दिनों में सरकारी काम-काज की

लेटलतीफी और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलने का एक मार्ग दिल्ली की सरकार ने प्रशस्त कर दिया है।

आम तौर पर पूरे भारत में इस किस्म की सरकारी सेवा का लगभग एक जैसा हाल है।

इन कार्यालयों पर मुख्य तौर पर दलालों का कब्जा है। ये दलाल वहां के कर्मचारियों के लिए

काम करते हैं और नियमानुसार वहां काम कराने की चाह रखने वालों को इतना परेशान किया जाता है कि

समय और परिश्रम से बचने के लिए लोग इन दलालों के माध्यम से अपना काम कराना बुद्धिमानी समझते हैं।

इस दलाली का पैसा आपस में बंटता है।

दिल्ली का फैसला जिम्मेदारी भी तय करेगी

इसलिए अब एक सरकार में जब तय समयसीमा के भीतर काम करने की जिम्मेदारी तय होगी

तो अन्य राज्य सरकारों को भी अपने अपने भौगोलिक सीमा क्षेत्र में जनता के इन्हीं सवालों का उत्तर देना पड़ेगा।

वर्तमान में सरकारी कार्यालयों में जिम्मेदारी तय नहीं होने की वजह से किसी को न तो दंडित किया जा सकता है

और न ही यह प्रमाणित किया जा सकता है कि दरअसल काम में विलंब की असली वजह भ्रष्टाचार है।

जब समय सीमा के अंदर काम पूरा करने की जिम्मेदार तय हो जाएगी तो जिनके जिम्मे यह काम है,

उन्हें भी काम नहीं हो पाने का कोई संतोषजनक उत्तर देना पड़ेगा।

दिल्ली में अरविंद ने घेर दिया है भाजपा को

दिल्ली सरकार ने इसी क्रम में चुनावी तिकड़म के तहत अस्थायी शिक्षकों के मामले में भी

भाजपा को बुरी तरह घेर दिया है।

विधानसभा में इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान उनके तर्कों के आगे भाजपा के तीन विधायकों को

सदन छोड़कर जाना पड़ा।

जबकि खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उन्हें यह प्रस्ताव दिया था कि इन पंद्रह हजार

अस्थायी शिक्षकों को स्थायी करने के प्रस्ताव पर अगर कोई खामी है

तो उसे लगातार बैठक कर दुरुस्त कर लिया जाए और जरूरत पड़े तो

रात को भी सदन चालू कर इस प्रस्ताव को पारित किया जाए।

यूं तो प्रचंड बहुमत की सरकार वैसे भी विधानसभा में इस प्रस्ताव को बहुमत के आधार पर पारित करा सकती थी।

लेकिन बैठकर इस प्रस्ताव की खामियों को दूर करने के प्रस्ताव पर भाजपा के पीछे हटने से यह स्पष्ट हो गया है भाजपा अब भी उप राज्यपाल के पीछे से खेल रही है और घर पहुंच सेवा प्रारंभ करने के बाद अरविंद केजरीवाल उन्हें बेनकाब करने में कामयाब हुए हैं।

अब घर पहुंच सेवा वहां चालू होने के बाद अन्य राज्यों की जनता भी इसी किस्म की सेवा की मांग कर ही सकती है क्योंकि दिल्ली की सरकार के पास वैसे ढेर सारे अधिकार नहीं हैं, जो किसी अन्य राज्यों के पास होते हैं।

दिल्ली के बाद दूसरे राज्य की जनता भी सरकार से सवाल अवश्य पूछेगी

इस स्थिति में अगर दिल्ली की सरकार 40 सरकारी सेवा को इस घर पहुंच योजना में शामिल कर सकती है तो अन्य राज्य भी इसे लागू कर ही सकते हैं।

अलबत्ता इस पूरी योजना पर बहुत कम खर्च कर केजरीवाल ने इसकी नकल के लिए भी एक लक्ष्मण रेखा खींच दी है।

योजना के क्रियान्वयन के नाम पर सरकारी धन की लूट की गुंजाइश भी उन्होंने कम कर दी है।

राज्यों में सरकारी कार्यालयों से आम आदमी का जिन दस्तावेजों के नाम पर निरंतर पाला पड़ता है, उन्हें भी इसमें शामिल किया गया है।

इसलिए अन्य राज्यों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर ऐसे काम करने की नैतिक जिम्मेदारी आ चुकी है।

अब सीधा सवाल होगा कि जो काम दिल्ली में हो सकता है, उसे लागू करने में दूसरे राज्यों को क्या परेशानी हो सकती है।

अब देखना है कि इस योजना को दूसरे राज्य कब और किस तरीके से लागू करने की पहल करते हैं।

इसके ठीक पीछे केजरीवाल की राशन की घर पहुंच सेवा भी है।

जिसे लागू करने से अनेक किस्म के राजनीतिक भ्रष्टाचार भी कम होंगे क्योंकि राशन की कालाबाजारी में सिर्फ दुकानदार ही दोषी नहीं होता।

इस सेवा के भी घर पहुंच योजना में शामिल होते ही इस किस्म की गड़बड़ी पर रोक लगेगी।

वैसी स्थिति में राशन के सामान से लाभान्वित होने वाले नेता और अफसर भी औकात में आ जाएंगे।

अब देखना है कि कौन किस तरीके से जनता की हित का दावा करने के बाद इन योजनाओं को लागू कर पाता है।



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