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सरकारी संपत्ति में बेचने में सरकार का यू टर्न

सरकारी संपत्ति को बेचने के संबंध में हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बात कही

थी। उन्होंने कहा था कि सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। लेकिन सरकार का घाटा

कम करने के लिए घाटे में चल रही अथवा गैर उत्पादक बोझ बनी कंपनियों को बेचने की

बात कही गयी थी। अब सरकारी संपत्ति बेचने में सरकार ने इसमें भी यू टर्न ले लिया है।

नई जानकारी यह है कि केंद्र सरकार अपने पहले रुख से पलटते हुए मुनाफा कमाने वाले

उपक्रमों के निजीकरण नीति पर आगे बढ़ सकती है। इससे पहले सरकार ने घाटे वाली

सार्वजनिक इकाइयों को बंद करने या विलय करने की बात कही थी।

सरकार की वैचारिक संस्था नीति आयोग निजीकरण के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों

की सूची तैयार करने की प्रक्रिया में है। इसकी संभावना जताई जा रही है कि पहली सूची में

गैर-रणनीतिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ वे कंपनियां शामिल हो सकती हैं जिनमें हिस्सा

बेचने के लिए मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल गई है। योजना के बारे में जो जानकारी मिली है

उसके मुताबिक छांटी गई कंपनियों को 3-4 किस्तों में लाया जाएगा और पहली सूची में

गैर-रणनीतिक क्षेत्र की फर्में होंगी। उसके बाद रणनीतिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण

या विनिवेश पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। नीति आयोग का दृष्टिकोण विनिवेश और

संपत्तियों के मुद्रीकरण नीति के लिए सरकार की नई रणनीति के अनुरूप है, जिसमें

निजीकरण पर स्पष्ट ध्यान रहेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा निजीकरण के पक्ष में

बयान देने के बाद कंपनियों को छांटे जाने की प्रक्रिया में तेजी आई है।

मुद्रीकरण तथा आधुनिकीकरणका मंत्र दिया था

प्रधानमंत्री ने कहा था कि सरकार का काम कारोबार चलाना नहीं है और उन्होंने ‘मुद्रीकरण

तथा आधुनिकीकरण’ का मंत्र दिया था। इससे स्पष्ट है कि सरकार दरअसल जो कुछ बोल

रही है, वह उसके वास्तविक फैसलों से अलग है और मुनाफे की कंपनियो को बेचकर

सरकार किसे फायदा पहुंचाना चाहती है, यह सरकार को स्पष्ट करना चाहिए।

पहले जब नरेंद्र मोदी ने इस किस्म की बात कही थी तो यह बात लोगों के जेहन में असर

कर पायी थी कि आखिर घाटे में चलने वाली कंपनियों को निजी हाथों में सौंपकर सरकारी

घाटा कम क्यों  नहीं किया जाए। लेकिन इस दलील के पीछे का वह सच सरकार छिपा

गयी थी कि जिन  संपत्तियों को सरकार घाटे का सौदा बता रही है, उसकी वास्तविक

स्थायी संपत्ति यानी खुले शब्दों में जमीन कितनी है। उदाहरण के लिए प्रसार भारती के

तहत काम करने वाली संस्थाओं के पास पूरे देश में जितनी जमीन है, वह उनकी कुल

कीमत से कहीं अधिक है।

निजी कंपनियों की नजर इन जमीनों पर भी लगी हुई है। इसलिए घाटे की कंपनी बताने के

साथ साथ उन्हें बेचने के वक्त उनकी जमीन का दाम भी अगर जोड़ दिया जाए तो किसी

को आपत्ति नहीं होगी। लेकिन अब तो मोदी सरकार उन कंपनियों को भी बेचना चाहती हैं,

जो सरकार को मुनाफा दे रहे हैं। इसे स्वीकार कर पाना सहज नहीं है। नीति आयोग की

रिपोर्ट में सरकार के लिए बहुलांश हिस्सेदारी बेचने, रणनीति विनिवेश, चुनिंदा संपत्तियों

का मुद्रीकरण या शेयर पुनर्खरीद की योजना और समयसीमा का खाका होगा। इस योजना

को अगले वित्त वर्ष में 1.75 लाख करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य को ध्यान में रखकर

तैयार किया जाएगा।

सरकारी संपत्ति बेचने में अब मुनाफा वाली कंपनियां क्यों

मंत्रिमंडल द्वारा रणनीतिक बिक्री के मंजूर फर्में इस रिपोर्ट में शामिल हो सकती हैं,

जिनमें आईडीबीआई बैंक, बीपीसीएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन, कंटेनर कॉर्पोरेशन, नीलाचल

इस्पात निगम, पवन हंस और एयर इंडिया प्रमुख हैं। इनका विनिवेश वित्त वर्ष 2022 में

पूरा होने की उम्मीद है। आईडीबीआई बैंक के अलावा सरकार अगले वित्त वर्ष में

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और वित्तीय संस्थानों, दो बैंकों और एक बीमा कंपनी में भी

हिस्सा बेच सकती है। लेकिन उसमें स्थायी संपत्ति का बाजार भाव भी जोड़ा जा रहा है या

नहीं इस पर बहुत कुछ निर्भर है। वरना झारखंड में हम बिहार एलॉय के लगातार बिकने

और उसके नाम पर बैंकों का हजारों करोड़ डूब जाने का उदाहरण देख चुके हैं। सिर्फ कबाड़

के नाम पर ही वहां से लोगों ने अरबों रुपये कमाये हैं, यह भी एक सच है। 

केंद्र का लक्ष्य गिने-चुने सार्वजनिक उपक्रमों को ही रणनीतिक क्षेत्र में रखने की है, जिसमें

रक्षा, बैंकिंग, बीमा, पेट्रोलियम, स्टील और उर्वरक शामिल हो सकते हैं। वित्त मंत्री

निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा था कि घाटे वाले सार्वजनिक उपक्रमों को

शीघ्रता से बंद करने के लिए संशोधित नीति लाई जाएगी और राज्य पीएसयू में हिस्सा

बेचने वाले राज्यों को प्रोत्साहन पैकेज दिया जाएगा। लेकिन अब फिर से सरकारी संपत्ति

के मामले में सरकार का यू टर्न किसी अन्य सोच का स्पष्ट संकेत दे रहा है।

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