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अब पेट्रोल डीजल पर यू टर्न की बारी है क्योंकि चुनावी माहौल भारी है




अब पेट्रोल डीजल पर सरकार को हम पीछे हटते देखने जा रहे हैं। यह दलील भी दी जाएगी




कि तेल कंपनियों को होने वाले नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार अपनी जेब से करेगी

ताकि जनता पर बोझ ना पड़े। लेकिन सवाल है कि सरकार की जेब में भी पैसा किसका है।

कोरोना काल ने तो बता दिया कि सभी सरकारें चाहे वह केंद्र की हों या राज्यों की, सभी

जनता के पैसे पर ऐश कर रहे हैं।  पांच राज्यों का विधानसभा चुनाव पहले के मुकाबले

थोड़ा पेचिदा हो गया है। इसलिए यह तय मानिये कि मतदाताओं की नाराजगी कम करने

के लिए केंद्र सरकार अब पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले केंद्रीय करों को कम करने जा

रही है। यानी अब फिर से केंद्र सरकार का एक और यू टर्न हमें देखने को मिल सकता है।

दरअसल इतने दिनों में इस अनियंत्रित तरीके से ईंधन और रसोई गैस के दाम क्यों बढ़ाये

गये हैं, इस संबंध में सरकार की तरफ से आज तक कोई संतोषजनक उत्तर नहीं आया है।

यह मुद्दा इसलिए भी अधिक चर्चा में हैं कि इसी भारतीय जनता पार्टी के नेता पहले डॉ

मनमोहन सिंह को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। ऐसे अवसरों पर उस दौर की

स्मृति ईरानी बहुत याद आती हैं। कभी डॉ मनमोहन सिंह को चूड़ी भेजने का एलान करने

वाली महिला को शायद अपनी सरकार के सत्ता में होने का वास्तविक अनुभव अब हो रहा

है। यानी जब आप विपक्ष में होते हैं तो आपको कुछ भी बोल जाने की आजादी होती है।

सरकार अपनी हो तो यह मर्म समझ में आती है कि व्यक्ति को हमेशा ही सोच समझकर

बोलन चाहिए वरना उनका पूर्व में दिया गया बयान उसके ही गले में फंदा बन जाता है।

अब लोग स्मृति ईरानी को खोजते फिर रहे हैं

ठीक ऐसा ही अभी स्मृति ईरानी के साथ हुआ है। चुनावी पेंच उलझते जाने की वजह से

भाजपा को भी यह बात समझ में आ चुकी है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को

भाजपा ने जितनी सहजता के साथ लिया था, अब की परिस्थितियां उतनी सहज नहीं रह

गयी हैं। भाजपा की चुनौती को स्वीकारते हुए पश्चिम बंगाल में खुद ममता बनर्जी ने

इसी नंदीग्राम की सीट से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है।

जंग का असली मैदान नंदीग्राम ही होगा 

 नंदीग्राम से भाजपा के प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी हैं, जिन्होंने हाल ही में खेमा बदल किया

है। असम में प्रफुल्ल महंत को टिकट नहीं मिला है जबकि बोड़ोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भाजपा

से नाता तोड़कर महागठबंधन से अपना रिश्ता बना लिया है। लिहाजा इन दोनों राज्यों में

भाजपा की जीत अब उतनी आसान नहीं रह गयी है। ऐसे में पूरे देश की जनता में पेट्रोल




डीजल के दामों को लेकर जो नाराजगी है, उसे दूर करने का सरल तरीका यही है कि केंद्रीय

करों में कटौती की जाए। देश के कुछ इलाकों में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर या

उससे अधिक होने के बाद यह लगातार सुर्खियों में हैं। नेपाल और भूटान की सीमा पर बसे

इलाकों में पड़ोसी देशों से इंधन की आमद धड़ल्ले से हो रही हैं। ऐसे में ईंधन की उच्च

कीमतों को लेकर बन रहे राजनीतिक दबाव का जवाब देने की इच्छा समझी जा सकती है।

सरकार के पास अब उत्तर देने लायक कुछ नहीं बचा है

आर्थिक तौर पर बात करें तो सरकार को इसके सामने झुकना नहीं चाहिए। लेकिन पहले

हो चुकी गलतियों की वजह से फिलहाल राजनीतिक नुकसान कम करने का कोई दूसरा

रास्ता भी केंद्र सरकार के पास नहीं है। ऊपर से किसान आंदोलन की वजह से जो हालात

बनते जा रहे हैं, वे भी भाजपा के लिए बहुत परेशानी वाली बात है। इस मामले में कड़ाई से

पेश आने की एक वजह तो राजनीतिक है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि

उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल की ऊंची कीमतों को लेकर शिकायत नहीं करनी

चाहिए क्योंकि यह बढ़ोतरी कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और तेल विपणन

कंपनियों के निर्णयों से संचालित है।

अब पेट्रोल डीजल पर कही गयी बातें ही लोग याद दिला रहे हैं

यह सही है कि कर अंतिम मूल्य निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाते हैं लेकिन सच

यह भी है कि यदि इनमें किसी तरह की कटौती की जाती है तो यह उपभोक्ताओं की मांग

के जवाब में की जाने वाली कमी होगी। यदि सरकार राजनीतिक वजहों से ईंधन कीमतों से

छेड़छाड़ करती है तो यह पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर नियंत्रण की ओर वापसी होगी।

महामारी ने कर राजस्व को बुरी तरह प्रभावित किया है। बहरहाल विश्व स्तर पर कच्चे

तेल की कीमतों में शुरुआती गिरावट के बाद ईंधन कीमतें लगातार ऊंची बनी हैं। यही

वजह है कि चालू वित्त वर्ष में उत्पाद शुल्क संग्रह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 50

प्रतिशत से अधिक बढऩे का अनुमान है। यानी सरकार का बजट भी कर संग्रह कम होने

की वजह से ईंधनों से मिलने वाली रकम पर काफी निर्भर हो चुका है। बाजार के सुधरने के

बाद जैसे जैसे आर्थिक स्थिति सुधरेगी, यह निर्भरता कम होगी। लेकिन तब तक चुनावों

में अगर गाड़ी उलट गयी तो भाजपा के लिए यह घाटे का सौदा साबित होगा। प्रचंड बहुमत

की सरकार बदलती परिस्थितियों को भांपते हुए इस किस्म का जोखिम उठाने की स्थिति

में भी नहीं हैं।



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