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साहिबगंज में अब गंगा पुल भी शीघ्र बने




 

साहिबगंज में गंगा नदी पर पुल एक प्रतीक्षित मांग है। राज्य गठन के तुरंत बाद से ही

अनेक स्तरों पर इसकी मांग की जाती रही है।

सैद्धांतिक तौर पर हर सरकार ने इसे स्वीकार तो किया है पर पुल की डिजाइन के मुद्दे पर

निजी हित साधने का मामला इस पुल के निर्माण में अड़ंगे लगाता रहा है।

अब साहिबगंज में जल परिवहन की भी शुरुआत हो चुकी है।

कभी यह इस पूरे पूर्वी भारत के नौ परिवहन क्षेत्र का बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था।

इस बात के ऐतिहासिक तथ्य अब भी मौजूद हैं। समय के साथ साथ यह

व्यापारिक केंद्र जल परिवहन के बाधित होने की वजह से मरता चला गया।

अब सड़क परिवहन के बोझ को कम करने तथा गंगा नदी पर हुए परिवहन सेवा में वृद्धि के बाद

इसे नये सिरे से चालू किये जाने से कमसे कम संथाल परगना और उससे सटे

बिहार की सीमाओं में इसका लाभ तो अवश्य होगा।

लेकिन इसी क्रम में गंगा नदी पर पुल बनना और भी जरूरी है।

यह पहले से ही हर नीति निर्धारक को पता है कि इस पुल के बन जाने से

असम हाई वे की गाड़ियां संथाल परगना के रास्ते ही असम की तरफ बढ़ जाएंगे।

वर्तमान में यह सारे भारी ट्रक पश्चिम बंगाल से प्रारंभ होने वाले असम हाई वे से होकर असम की तरफ जाती है।

साहिबगंज के गंगा नदी पर पुल बनने से ऐसे सभी ट्रकों की असम तक की

दूरी कमसे कम 70 किलोमीटर कम हो जाएगी।

यह समझना कोई कठिन काम नहीं है कि हर दिन इस मार्ग से गुजरने वाले पांच हजार से अधिक

ट्रक अगर साहिबगंज के पुल के रास्ते से गुजरे तो इलाके की अर्थनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है।

सरकार चाहे तो इस पुल और उससे जुड़ी सड़क के बेहतर निर्माण पर होने वाले

खर्च की वसूली के लिए वहां टोल टैक्स भी लगा सकती है।

यह आसानी से समझ में आने वाली बात है कि अगर किसी ट्रक का डीजल का खर्च कम हो

और समय में भी दो से तीन घंटे की बचत हो तो यह एक बड़ी बचत होगी।

लिहाजा वे धनबाद के बाद गोविंदपुर के इलाके से ही संथालपरगना की तरफ

बढ़ेंगे और संथाल के कई जिलों से गुजरते हुए

साहिबगंज के रास्ते असम हाई वे पर आगे जाएंगे।

इन तमाम ट्रकों का परिचालन इस सड़क से होने का सीधा अर्थ है कि

परिवहन सेवा से जुड़े अन्य रोजगार के नये अवसरों का सृजन है।

जब किसी रास्ते पर अधिकाधिक वाहन गुजरने लगते हैं तो पेट्रोल पंप के अलावा,साहिबगंज में अब गंगा पुल भी शीघ्र बने

गाड़ी मरम्मत की दुकान, पंक्चर बनाने की दुकान,

ढाबे, होटल, रात्रि विश्राम के लिए मोटल और छोटे मोटे चाय की दुकानें भी खुल जाती हैं।

ट्रकों और अन्य वाहनों के परिवहन के आधार पर इनका कारोबार चलता रहता है।

वर्तमान में इस सड़क पर ऐसी कोई सुविधा नहीं है।

लिहाजा अगर गंगा नदी पर साहिबगंज में पुल बना तो यह रास्ता चालू होगा

और रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों के नये रास्ते खोल देगा।

इसलिए भी झारखंड सरकार को चाहिए कि वह अपने ही पैसे से बिहार की सीमा तक इस पुल का निर्माण कराने में जल्दबाजी करे।

परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ऐसे मामलों में एक गंभीर राजनेता समझे जाते हैं।

उन्होंने जब इस दिशा में पहल की है तो झारखंड को इसका पूरा फायदा उठाना चाहिए।

अलबत्ता फिर से इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि

ठेकेदार और उनसे कमिशन खाने वाले अफसर पारंपरिक पुल निर्माण की ही दलील देंगे।

लेकिन जल परिवहन प्रारंभ होने के बाद वहां अब केबल स्ट्रे ब्रिज का बनना ज्यादा उपयुक्त होगा।

कोलकाता के विद्यासागर सेतु को हम इस श्रेणी के बड़े ब्रिज का नया नमूना मान सकते हैं।

बाढ़ के दिनों में गंगा नदी पर जल के प्रवाह के अलावा वहां की मिट्टी और

अन्य भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन कर इस श्रेणी का केबल स्ट्रे ब्रिज बनाना ही साहिबगंज के लिए उपयुक्त होगा।

लेकिन पहले भी यह बात यहां के नीति निर्धारकों की समझ में इसलिए नहीं आयी थी

क्योंकि इस श्रेणी के ब्रिज के निर्माण में सीमेंट और बालू का खर्च पारंपरिक ब्रिज के मुकाबले कम होता है।

ऐसे में कमिशन की अतिरिक्त कमाई के रास्ते भी कम हो जाते हैं।

पहले भी अफसरों ने सिर्फ इसी वजह से साहिबगंज में केबल स्ट्रे ब्रिज

बनाने के प्रस्ताव को अपनी अपनी अलग अलग दलील देकर खारिज कर दिया था।

उनकी मंशा थी कि सीमेंट और बालू की खपत अधिकाधिक हो और इससे ब्रिज निर्माण की लागत जितनी बढ़ेगी,

उन्हें ज्यादा लाभ मिलेगा। सरकार को अब इस गोरखधंधे से उबरते हुए

जरूरत के लिहाज से तकनीक के इस्तेमाल पर ध्यान देना चाहिए।

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