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अब मरीजों की निरंतर निगरानी करने वाले यंत्र देंगे दवा

  • सूचना तकनीक से बदल रही है चिकित्सीय जांच की पद्धति
  • रोगी को डाक्टर के भरोसे चौबीस घंटे नहीं रहना होगा
  • उपकरण खुद ही आंकड़ों को डाक्टर तक भेज देंगे
  • कई यंत्र खुद दवाई का डोज जारी करने में सक्षम
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अब मरीजों को अपने दैनिक दवा के डोज के लिए डाक्टर

के प्रेसक्रिप्सन पर हमेशा निर्भर रहने का जमाना बीतने वाला है। ऐसे

वैज्ञानिक उपकरण तैयार हो चुके हैं जो निरंतर मरीज के शरीर के हाल

की निगरानी करेंगे। इसके आधार पर वे शरीर में दवा के डोज को कम

या अधिक करने का निर्देश भी देंगे। सूचना तकनीक के विस्तार की

वजह से अब डिजिटल मेडिसीन की दुनिया में ऐसे बदलाव शीघ्र ही

देखने को मिल सकते हैं। दूसरी तरफ इससे यह संभावना भी व्यक्त

की जा रही है कि पारंपरिक तरीके से होने वाली जांच में अगर कोई

गड़बड़ी रह गयी हो तो इन आधुनिक उपकरणों से प्राप्त होने वाले

आंकड़ों से उन्हें सुधार अथवा समझा भी जा सकेगा। अच्छी बात यह है

कि मरीज जब गहरी निद्रा में होगा तब भी ऐसे सूचना तकनीक

आधारित उपकरण उनकी सेहत का ख्याल रखेंगे। दुनिया भर में

डिजिटल मेडिसीन के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान चल रहे हैं।

दरअसल सबसे पहले सामान्य किस्म के रोगों की पहचान और उनके

उपचार की विधि के लिए इस सूचना तकनीक आधारित पद्धति को

ज्यादा सहज समझा गया था। जैसे जैसे इसमें प्रगति होती जा रही है,

उसमें नये नये आयाम भी जुड़ते चले जा रहे हैं। अच्छी बात यह है कि

अब मरीजों को निरंतर निगरानी में रखने की आवश्यकता भी इन

उपकरणों की वजह से समाप्त होने वाली है।

अब मरीजों को निरंतर निगरानी का लाभ भी मिलेगा

ऐसे उपकरण शरीर की तमाम गतिविधियों पर नजर रखते हुए

आवश्यकतानुसार दवा देने का काम भी कर लेंगे। इससे मरीज को

जरूरत पड़ने पर शरीर में दवा का डोज तुरंत पहुंचा पाना संभव हो

जाएगा। कुछ खास किस्म के रोगों के लिए इसका प्रयोग होने लगा है।

आम जीवन में सूगर की जांच करने वाले उपकरण अब डाक्टरों के

साथ साथ घर के जरूरी उपकरणों तक में शामिल हो गये हैं। इसी तरह

अब डिजिटल थर्मामीटर भी पुराने थर्मामीटर को बदल चुका है।

दुनिया की बदलती जरूरतों और तकनीक को ध्यान में रखते हुए

पारंपरिक दवा के कारोबार से जुड़ी कंपनियां भी धीरे धीरे अपने आप में

यह बदलाव लाती चली जा रही है। दूसरी तरफ अच्छी बात यह है कि

इस नई विधा में अनेक नये उद्यमी भी शामिल हुए हैं, जिनकी

कंपनियां आकार में छोटी होने के बाद भी तेजी से नये नये डिजिटल

उपकरणों से बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत करने में लगी हैं। इनमें से

अधिकांश युवा उद्यमी हैं, जिनके पास अपना हुनर और ज्ञान भी है।

इन नये वैज्ञानिकों में एक भारतीय नाम डॉ मुकेश कुमार का है।

उन्होंने क्लीनिकल ब्लड टेस्टिंग की तकनीक बनायी है।  इस तकनीक

की वजह से उन्हें यूरोप में 35 साल से कम उम्र के श्रेष्ठ उद्यमियों में

से एक होने का पुरस्कार भी मिल चुका है। सूचना तकनीक आधारित

उपकरणों की बदौलत बेहतर और बड़े अस्पतालों तक जाने के बदल

सीधे इन परीक्षणों की रिपोर्ट विशेषज्ञ डाक्टरों तक भेजी जा सकती है।

ऐसे उपकरण सीधे डाक्टर तक रिपोर्ट भी भेज लेते हैं

इस विधि से मरीज के सामने नहीं होने के बाद भी विशेषज्ञ रोग की

पहचान कर उसके ईलाज की पद्धति निर्धारित कर सकते हैं। इसमें

मरीज के अस्पताल तक आने जाने का खर्च बचता है और खास तौर

पर समय की भी बचत होती है। कई कंपनियों ने आवश्यकता को

ध्यान में रखते हुए शरीर में धारण किये जाने वाले उपकरणों पर ध्यान

केंद्रित किया है। इन उपकरणों के शरीर से जुड़े होने की वजह से मरीज

की स्थिति में कोई ज्यादा बदलाव होते ही मरीज को इसके संकेत मिल

जाते हैं। इससे बचाव का रास्ता तुरंत खुल जाता है। इसी तरह मधुमेह

जैसी कई बीमारियों के लिए 24 घंटे निगरानी करने में सक्षम उपकरण

पहले ही बाजार में आ चुके हैं। जो आवश्यकतानुसार दवाई भी देते हैं।

इससे मरीज की हालत बिगड़ने के पहले निदान प्रारंभ हो पाता है।

शरीर में धारण अथवा पहने जाने वाले उपकरणों की विशेषता यह है

कि वह मरीज की हर गतिविधि को चुपचाप दर्ज करते जाते हैं। दर्ज

आंकड़ों के आधार पर इन गतिविधियों का विश्लेषण भी होता जाता है।

इस विधि की वजह से मरीज की हालत कभी भी नियंत्रण से बाहर नहीं

जा पाती क्योंकि नियंत्रण सीमा के बाहर जाते ही यह उपकरण अपने

आप ही काम करना प्रारंभ कर देते हैं। साथ ही वह मरीज को जानकारी

देने के अलावा सूचना तकनीक से लैश होने की वजह से डाक्टर तक

मरीज की स्थिति की जानकारी भी अपने आप भी प्रेषित कर देते हैं।

इसलिए अगर किसी मरीज की हालत बिगड़ने पर उसे डाक्टर तक

पहुंचना पड़ता है तो उसके पहुंचने के पहले ही डाक्टर को उसकी हालत

के सारे आंकड़े मिल चुके होते हैं। इससे मरीज का ईलाज प्रारंभ करने

में कोई समय नष्ट नहीं होता है।

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