fbpx Press "Enter" to skip to content

अब तो घोषणा पत्र को दस्तावेज मानकर याद रखिये







अब तो राजनीति और उसके हथियार भी तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में जिन हथियारों का इस्तेमाल कर राजनीतिक
दल सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रहे हैं, उन हथियारों को संभालकर और संजोकर रखा जाना चाहिए।

यह राजनीतिक दलों का घोषणा पत्र भी है।

वरना वर्ष 2014 के चुनाव में काला धन, हर खाते में पंद्रह लाख जैसे मुद्दों पर बात करने पर भाजपा के लोगों
को नाराजगी होती है। दूसरी तरफ अन्य दलों को भी यह भय सताने लगता है कि  शायद उनके पुरानी बातों
पर से सवाल उठाये जाएंगे।

इसलिए पुरानी बातों पर मिट्टी डालते हुए नई शुरुआत करने में कोई बुराई नहीं है। इस बार में झारखंड विधानसभा
के चुनाव के दौरान हर दल अपनी तरफ से भावी योजनाओं की जानकारी दे रहा है। लिहाजा इस घोषणापत्रों को
आधुनिक राजनीतिक इतिहास का दस्तावेज समझकर संजोकर रखा जाना चाहिए।

अगले पांच वर्षों तक अगर इन्हीं मुद्दों पर सवाल उठाते जाते रहे तो मजबूरी में पिछली बार की तरह असली सवाल
को टाल जाने का मौका किसी भी दल को नहीं मिलेगा। वर्तमान में जिस तरीके से चुनावी दंगल में जोर आजमाइश
की मोर्चाबंदी हो रही है, उसमें इन दस्तावेजों का इस्तेमाल चुनाव समाप्त होने के बाद होना चाहिए।

हर दल ने जनता के सामने इस दौरान क्या कुछ वादा किया है, उस पर उसे आगे याद दिलाया जाना चाहिए।

यद्यपि बदली परिस्थितियों में भारतीय राजनीति इनदिनों असहिष्णुता से पीड़ित हो चुकी है। दरअसल नेताओं
को अपने बारे में पूछे गये तीखे सवाल बुरे लगते हैं। इस वजह से जनता के बीच जो सवाल उमड़ते रहते हैं, उन
सवालों के बारे में मीडिया में भी चर्चा नहीं होती। लेकिन हाल के घटनाक्रम तो यही दर्शाते हैं कि भारतीय
जनता लोकतांत्रिक तौर पर अधिक परिपक्व होती चली जा रही है।

अब तो तीन राज्यों के परिणाम विश्लेषण का यही नतीजा है

इसके लिए तीन राज्यों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जा सकता है। लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान,
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव हुए थे। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस को जबर्दस्त सफलता
मिली थी। इनमें से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस को बहुत दिनों के अंतराल के बाद सत्ता में आने
का मौका मिला था।

इस चुनाव के संपन्न होने के तुरंत बाद मध्यप्रदेश के नये मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनी तरफ से किसान ऋण
माफ करने का पहला आदेश जारी कर केंद्र सरकार को सकते में ला दिया था।

उसके बाद मजबूरी में केंद्र सरकार को भी आनन फानन में किसानों के लिए कई निर्णय लेने पड़े।

लेकिन दोबारा जब इन्हीं राज्यों में लोकसभा का चुनाव हुआ तो नरेंद्र मोदी को प्रचंड जनादेश का लाभ इन राज्यों
से भी मिला। जाहिर है कि इतने कम समय में किसी राज्य सरकार के प्रति जनता की नाराजगी नहीं उपज
सकती है। दरअसल यह भारतीय जनता की सोच का परिणाम था, जिसमें वह अब भी यूपीए 2 के कार्यकाल
के दौरान लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को भूला अथवा माफ नहीं कर पायी है।

इस कड़ी में अब तो हरियाणा और महाराष्ट्र को भी रखा जा सकता है। इन राज्यों में भी विधानसभा के चुनाव
परिणाम के आंकड़े लोकसभा चुनाव से मेल नहीं खाते हैं।

लिहाजा किस राजनीतिक दल ने चुनाव के दौरान क्या कुछ वादा किया है, इसे याद रखना जरूरी होता चला
जा रहा है। वरना नेताओं को पुरानी वीडियो क्लीपिंग देखकर कई बार यह हैरानी होने लगती है कि यह नेता
जब सत्ता में नहीं था तो क्या कुछ कहा करता था  और अब सत्ता में है तो कैसे गिरगिट की तरह
रंग बदल रहा है।

सत्ता के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने वालों की खबर लीजिए

दूसरी तरफ जिनके हाथ में पहले सत्ता थी, वे अपने समय में जो काम नहीं कर पाये, उसी काम के लिए अब
वर्तमान सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

इसलिए अब तो कौन क्या कह रहा है, उसे ही नई बहस का आधार बनाकर बात आगे बढ़ाने की जरूरत है।

पुरानी बातों से कोई फायदा होने वाला नहीं है। इसलिए अब तो जो कुछ अभी कहा जा रहा है, उसके आधार
पर नये सिरे से हर बात का मूल्यांकन प्रारंभ किया जाना चाहिए।

यह प्रक्रिया कुछ वैसी ही है, जैसे व्यापारी के यहां पुराने हिसाब को बंद कर नये बही-खाता से नये वर्ष का कारोबार
प्रारंभ किया जाता है।

जो बीती बातें थे, उन्हें पीछे छोड़कर जो अभी कहा जा रहा है, उसे ही नई शुरुआत का आधार बनाकर आने वाले
दिनों में सवाल पूछने का नया दौर प्रारंभ किया जाना चाहिए।

राजनीतिक दलों को फिर से यह एहसास दिलाना होगा कि भारतीय जनता की याददाश्त उतनी कमजोर भी
नहीं है, जितना वे समझते हैं। लेकिन जिन्हें पुरानी बातों के उठने से तकलीफ है, उन्हें अब सिर्फ नई घोषणाओं
पर आगे क्या कुछ हो रहा है, इस पर केंद्रित रखा जाना चाहिए।



Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Be First to Comment

Leave a Reply