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उम्र तो आने वाले दिनों में बस एक संख्या बनकर रह जाएगी

  • आयु के क्षरण को रोकने की दिशा में एक और कदम

  • खमीर पर परीक्षण से उम्र का प्रभाव नजर आया

  • बिजली के सर्किट की भांति काम करता है यह

  • पूरी प्रक्रिया का ही नवनिर्माण करने की तैयारी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः उम्र तो आने वाले दिनों में महज एक संख्या बनकर रह जाएगी। दरअसल

इंसानों पर उम्र की वजह से पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक

और कदम बढ़ाने में सफलता पायी है। इंसानी शरीर के कोषों का गहन अध्ययन करने

वालों ने इसकी विशेषताओं को पाने की दिशा में कुछ नये तथ्य भी हासिल किये हैं। इसका

निष्कर्ष है कि एक ही प्रकार के दो कोष (सेल) भी शरीर के अंदर अलग अलग ढंग से काम

करते हैं। इसी अलग अलग काम करने की वजह से ही उम्र के साथ साथ उनकी सक्रियता

कम होती चली जाती है। उससे उम्र बढ़ने के साथ साथ शारीरिक क्षमता में भी कमी आती

है। अब इन कोषों की सक्रियता को अगर स्थायित्व प्रदान किया जा सके तो इंसान के

जीवन में उम्र तो वाकई एक संख्या भर बनकर रह जाएगी क्योंकि उम्र के साथ साथ शरीर

पर उसके प्रभाव न्यूनतम हो जाएंगे।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (सैन डियागो) के शोध दल ने इस पर काम किया है। वे

काफी समय से शरीर के अंदर मौजूद कोषों और उसके उम्र पर पड़ने वाले प्रभाव पर काम

कर रहे हैं। शोधकर्ताओं को पहले ही यह बात जानकारी में आयी थी कि एक ही प्रकार के

कोष होने के बाद भी वे कई बार अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं। अब अपने शोध

के बारे में उनलोगों ने एक वैज्ञानिक पत्रिका में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है।

उम्र पर हुए शोध में खमीर के कोषों पर हुआ है परीक्षण

जांच को और आगे बढ़ाने के लिए उनलोगों ने इंसानी कोष के बदले खमीर के कोषों पर

इसका गहन अध्ययन किया। इस परीक्षण के दौरान यह पाया गया कि खमीर के ऐसे कोष

में से आधे एक खास समय सीमा के बाद क्षरण के प्रभाव में आ गये। उनके न्यूक्लीयस में

कमी आयी। खमीर का यह न्यूक्लीयस एक गोलाकार क्षुद्र कोष है, जो केंद्र में स्थित होता

है। लेकिन परीक्षण में शामिल किये गये इसी किस्म के दूसरे सेल जब मिटोचौंड्रिया के

सही तरीके से काम नहीं करने के प्रभाव में आया तो उनकी गुणवत्ता ही बदल गयी।

बताते चलें कि यह मिटोचौंड्रिया वह पदार्थ है, जो कोश के लिए ऊर्जा पैदा करने का काम

करता है। इस परीक्षण के पूरा होन के बाद अन्य परीक्षण आंकड़ों और कंप्यूटर मॉडल के

सहारे इस पूरी प्रक्रिया को समझने की कोशिश की गयी। इसकी वजह से यह जान पाना

संभव हुआ कि दरअसल यह कोष यह काम कैसे और किन संकेतों के आधार पर किया

करते हैं। इससे आयु के बढ़ने की उस प्रक्रिया का पता चला जो उम्र के साथ साथ

कार्यक्षमता में कमी को दर्शाता है।

इस मॉलिक्यूलर प्रक्रिया को समझने के लिए कई परीक्षण भी किये गये। इस शोध से जुड़े

वरिष्ठ वैज्ञानिक नान हाओ कहते हैं कि यह काफी हद तक किसी घरेलू इलेक्ट्रॉनिक

उपकरण के सर्किट के जैसा है, जो निर्देशों के आधार पर काम करता है। इस पद्धति को

समझ लेने के बाद वैज्ञानिक इसे कृत्रिम तरीके से प्रभावित करने के प्रभावों को भी

कंप्यूटर पर जाच चुके हैं। उनकी सोच इस सेल के अंदर मौजूद बिजली के सर्किट जैसी

स्थिति को नये सिरे से तैयार करना और डीएनए संशोधन की वजह से उसे पूरी तरह नये

सिर से बनाना है।

सेल को क्षरण से मुक्त किया तो आयुजनित परेशानी भी गयी

इस परीक्षण के आधार पर ही वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि शरीर के अंदर के सेल को उम्र

के क्षरण से मुक्त कर दिया गया तो इंसान की आयु का उसके क्रियाकलापों पर प्रभाव

पड़ना समाप्त हो जाएगा। कोष के क्षरण की प्रक्रिया को रोकने जाने की स्थिति में इंसान

की उम्र तो बढ़ेगी लेकिन उम्र की वजह से उसके काम काज पर पड़ने वाला प्रभाव समाप्त

अथवा न्यूनतम बनकर रह जाएगा। खमीर पर परीक्षण समाप्त और सफल होने के बाद

शोध दल इसी प्रक्रिया को इंसानी कोषों पर भी आजमाना प्रारंभ करेंगे।


 

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