fbpx Press "Enter" to skip to content

उत्तर भारत की धार्मिक नगरी गया में सज गया तिलकुट का बाजार

गयाः उत्तर भारत की सांस्कृतिक नगरी गया में तिलकुट के बाजार की रौनक बढ़ गयी है।

उत्तर भारत की सांस्कृतिक नगरी गया मौसमी मिठाइयों के लिए मशहूर रही है। बरसात

में ‘अनारसा’, गर्मी में ‘लाई’ और जाड़े में ‘तिलकुट’।मकर संक्रांति के दिन लोगों के भोजन

में चूड़ा-दही और तिलकुट शामिल होता है। तिलकुट को गया की प्रमुख पारंपरिक मिठाई

के रूप में देश-विदेश में जाना जाता है। मकर संक्राति 14 जनवरी को लेकर बिहार में

तिलकुट की दुकानें सज गई हैं। गया का तिलकुट बिहार और झारखंड में ही नहीं, बल्कि

पूरे देश में प्रसिद्ध है। मकर संक्रांति करीब आते ही लोग तिलकुट, तिलवा एवं लाई को याद

करने लगते हैं। हालांकि, तिल से बने ये सभी उत्पाद दूसरी जगहों पर भी बनते हैं लेकिन

जब बात तिलकुट की हो तो गया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अन्य वर्षों की

तरह इस बार भी मकर संक्रांति से पहले गया के तिलकुट बाजार में भारी चहल-पहल है।

बिहार के गया में 14 जनवरी (मकर संक्राति) को लेकर तिलकुट की दुकानें सज गई हैं।

गया में तिलकुट की मुख्य मंडी रमना और टिकारी रोड में है, जहां खरीददारी करने लोग

दूर-दूर से आ रहे है।

उत्तर भारत की इस नगर का तिलकुट दुनिया में मशहूर

मकर संक्रांति के एक महीने पहले से ही गया की सड़कों पर तिलकुट की सोंधी महक और

तिल कूटने की धम-धम की आवाज लोगों के जेहन में इस पर्व की याद दिला देती है। पर्व

के एक से डेढ़ महीने पूर्व से यहां तिलकुट बनाने का काम शुरू हो जाता है। मोक्षनगरी गया

में हाथ से कूटकर बनाए जाने वाले तिलकुट बेहद खस्ता होते हैं।

मकर संक्रांति के एक महीने पहले से ही गया की सड़कों पर तिलकुट की सोंधी महक और

तिल कूटने की धम-धम की आवाज लोगों के जेहन में इस पर्व की याद दिला देती है। पर्व

के एक से डेढ़ महीने पूर्व से यहां तिलकुट बनाने का काम शुरू हो जाता है. गया में हाथ से

कूटकर बनाए जाने वाले तिलकुट बेहद खस्ता होते हैं। गया में तिलकुट बनाने की परंपरा

की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रमाण तो नहीं है, लेकिन सर्वमान्य धारणा है कि

धर्मनगरी गया में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व तिलकुट बनाने का कार्य प्रारंभ हुआ था। गया में

निर्मित तिलकुट और उसके स्वाद का मुकाबला कहीं नहीं है। यहां के तिलकुट के स्वाद का

जोड़ कहीं नहीं है। यही वजह है कि गया के तिलकुट झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान,

पश्चिम बंगाल, दिल्ली, महाराष्ट्र सहित पाकिस्तान, बांगलादेश, नेपाल जैसे देशों में भी

भेजी जाती है।

विदेशों में भी हर साल यहां से भेजे जाते हैं तिलकुट

गया आने-जाने वाले लोग यहां के तिलकुट का स्वाद जरूर लेते है और अपने दूर-दराज के

रिश्तेदारों के लिए भी तिलकुट ले जाते है। गया के मोहनपुर प्रखंड अंतर्गत डंगरा के गुड़

एवं तिल के बने तिलकुट की मांग देश-विदेश में भी है। मंकर संक्रांति को लेकर डंगरा

बाजार में तिलकुट कूटने एवं बनाने को लेकर दुकानों में लगभग डेढ़ सौ लोग रात-दिन

काम कर रहे हैं। इसे खरीदने के लिए सुबह से ही ग्राहकों की भीड़ लग जाती है। लोग

महीनों पहले ही ऑर्डर बुक करा देते हैं। प्रत्येक वर्ष डंगरा बाजार में अक्टूबर से तिलकुट

बनाने का काम शुरू होता है और जनवरी तक युद्ध स्तर पर जारी रहता है। पहले अन्य

राज्यों और विदेशों में, फिर जिले में सप्लाई की जाती है। सउदी अरब एवं अमेरिका के

अलावा दिल्ली, कोलकता, झारखंड, मुंबई एवं अन्य शहरों में सप्लाई होती है। तिलकुट के

कारोबार से जुड़े एक व्यवसायी ने बताया कि मकर संक्रांति की तिथि नजदीक होने के

चलते उन लोगों पर काफी दबाव है। कारीगर लगातार काफी मेहनत कर रहे हैं। जैसे-जैसे

संक्रांति की तिथि नजदीक आ रही है, तिलकुट की मांग और ग्राहकों की संख्या बढ़ रही है।

अभी गया के बाहर से आनेवाले ग्राहकों की संख्या ज्यादा है। इनमें राज्य से बाहर के भी

खरीददार शामिल होते हैं।

पिछले साल के मुकाबले कीमतों में हुई है बढ़ोत्तरी

व्यवसायी ने बताया कि इस बार गया में औसतन 240 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से

तिलकुट बिक रहा है। पिछले साल इसकी कीमत 220 रुपये थी। इस बार तिल की कीमत

में 80 फीसदी तक की वृद्धि हो गयी है। ऐसे में महंगाई का कुछ वजन खुदरा ग्राहकों के

कंधों पर भी पड़ेगा।तिलकुट व्यवसाय से जुड़े लोग बताते है कि तिल और चीनी से

तिलकुट का निर्माण किया जाता है। इसके लिए एक निश्चित मात्रा में तिल और चीनी के

मिश्रण को कोयले की आग पर निश्चित समय सीमा तक मिलाया जाता है और एक

निश्चित समय तक इसे कूटा जाता है, जिसके बाद लजीज और जायकेदार खास्ता

तिलकुट खाने के लिए तैयार हो जाता है। मिश्रण और कूटने की प्रक्रिया में थोड़ी भी

गड़बड़ी होती है तो स्वाद बिगड़ने का डर रहता है। गया के प्रसिद्ध तिलकुट प्रतिष्ठान के

एक बुजुर्ग कारीगर ने बताया कि गया के रमना मुहल्ले में पहले तिलकुट निर्माण का कार्य

प्रारंभ हुआ था। वैसे अब टेकारी रोड, कोयरीबारी, स्टेशन रोड सहित कई इलाकों में

कारीगर हाथ से कूटकर तिलकुट बनाते हैं। रमना रोड और टेकारी के कारीगरों द्वारा बने

तिलकुट आज भी बेहद लजीज होते हैं। कुछ ऐसे परिवार भी गया में हैं, जिनका यह

खानदानी पेशा बन गया है।तिलकुट की तासीर गर्म होती है इसलिए ठंड के मौसम में

इसकी मांग बढ़ जाती है। यह आयुर्वेदिक दवा का भी काम करता है।

इसी मौसम में उत्तर भारत में इसके खाने का असली आनंद और फायदा

तिलकुट खाने से कब्ज जैसी बीमारी नहीं होती है और यह पाचन क्रिया को भी बढ़ाता है।

एक अनुमान के मुताबिक, इस व्यवसाय से गया जिले में करीब सात हजार से ज्यादा लोग

जुड़े हैं। उत्तर भारत में जाड़े में तिलकुट के कारीगरों को तो अच्छी मजदूरी मिल जाती है

लेकिन इसके बाद इनके पास कोई काम नहीं होता। सर्दी के मौसम के बाद ये कारीगर

आइस्क्रीम बेचकर और रिक्शा चलाकर अपनी जीविका चलाते हैं। गया में चीनी के अलावा

गुड़, नारियल और खोवा का भी तिलकुट बनाया जाता है, जो विभिन्न दरों पर बाजार में

बेचा जा रहा है। इस वर्ष 240 रुपये से लेकर 300 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से तिलकुट

बाजारों में बिक रहा है। तिलकुट के एक पुराने कारोबारी ने बताया कि तिलकुट की कई

किस्में होती हैं। मावेदार तिलकुट, खोया तिलकुट, चीनी तिलकुट एवं गुड़ तिलकुट बाजार

में मिलते हैं। ग्राहकों का कहना है कि तिलकुट के दाम बढ़ने का उनके ऊपर कोई असर

नहीं हैं । मकर संक्रांति पर तिलकुट खाने की पुरानी परंपरा है इसलिए अपने परिवार,

बच्चों एवं रिश्तेदारों के लिए खरीददारी तो करनी ही है। अपने परिजनों के साथ-साथ

अपने दूर के रिश्तोंदारों को भी वे तिलकुट खरीदकर भेज रहे है।

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from ताजा समाचारMore posts in ताजा समाचार »
More from बिहारMore posts in बिहार »
More from लाइफ स्टाइलMore posts in लाइफ स्टाइल »

4 Comments

Leave a Reply