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जनता के सवालों पर गंभीर बहसों से भाग रही नीतीश सरकार : दीपंकर

  •  11 मार्च को बिहटा में किसान सम्मेलन

  •  18 मार्च को किसानों के लिए विधानसभा मार्च,

  •  महागठबंधन के दलों से भी हो रही बात-चीत

पटना :  जनता के सवालों-मुद्दों पर चर्चा से भाग रहे हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार । भाकपा-

माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने बुधवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा यदि वे

भाजपा से अलग होने का दावा करते हैं तो उनकी राजनीति भी अलग दिखनी चाहिए।

लेकिन हम सब देख रहे हैं कि मोदी सरकार की तर्ज पर ही आज बिहार में तानाशाही का

विस्तार हो रहा है। केंद्र से लेकर बिहार तक पार्लियामेंट व विधानमंडलों की नई बिल्डिंगें

बनाई जा रही हैं, लेकिन अंदर से लोकतंत्र को खोखला किया जा रहा है। सोशल मीडिया को

प्रतिबंधित करने के हिटलरी फरमान की बात कर लें अथवा आंदोलनों में शामिल होने पर

नौकरी न देने का आदेश, ये चीजें दिखाती हैं कि नीतीश कुमार एक तानाशाह की भाषा

बोलने लगे हैं। जबकि वे खुद छात्र आंदोलन की उपज रहे हैं। जनता के सवालों यानी

लोकतंत्र के प्रति जो मोदी सरकार को रुख है, वही नीतीश जी का है। क्या फर्क रह गया है

दोनों में? इस संवाददाता सम्मेलन में उनके साथ माले राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो

के सदस्य धीरेन्द्र झा व राजाराम सिंह भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि तीनों कृषि कानूनों

के खिलाफ चल रहा किसान आंदोलन आज व्यापक स्वरूप ग्रहण कर चुका है। यह भी

जनता के सवालों में अहम विषय है। मोदी सरकार आज छोटे किसानों पर खूब घडि़याली

आंसू बहा रही है, लेकिन वह यह बताए कि छोटे-गरीब- बटाईदार किसानों को सरकार ने

कौन सा अधिकार प्रदान किया है? पीएम किसान सम्मान मूलतः 5 एकड़ तक जमीन

रखने वाले जमीन के मालिकों को ही मिल रही है।

जनता के सवालों में किसानों का मुद्दा अहम है

इस कैटेगरी में छोटे-बटाईदार किसान तो शामिल ही नहीं हैं. अधिकांश किसानों को यह

राशि नहीं मिल रही है। देश में बड़ी-बड़ी किसान महापंचायतों का आयोजन हो रहा है।

बिहार में भी माले ने 11 मार्च को बिहटा में किसान सम्मेलन आयोजित करने का फैसला

किया है। बिहार में धान अथवा अन्य फसलों की सबसे कम कीमत पर सबसे कम खरीद

होती है। यहां धान का कारोबार पूरी तरह बिचैलियों के हाथों में है। हमारी पार्टी ने इन

सवालों पर पूरे राज्य में 11 से 15 मार्च तक किसान यात्राओं का आयोजन करने का निर्णय

किया है। उन्होंने कहा कि 18 मार्च को विधानसभा मार्च की योजना बनाई गई है, जिस पर

महागठबंधन के दलों से बातचीत चल रही है। बिहार में हाल फिलहाल में तीन और बड़े

घोटाले सामने आए हैं। पहला घोटाला क्वारंटीन, दूसरा कोविड और तीसरा चुनाव से जुड़ा

है। कोविड के नाम पर जमुई सहित कई जिलों में हुए फर्जीवाड़े की कलई खुलने के बाद यह

स्पष्ट होता जा रहा है कि ऐसे घोटाले बिना उच्चस्तरीय राजनीतिक संरक्षण के नहीं हो

सकते। जहां एक ही नंबर पर तीस लोगों के आरटीपीसीआर दिखलाए गए हों और जिस

व्यक्ति का मोबाइल नंबर दिया गया है, वह यह कहे कि उसकी तो कभी जांच हुई ही नहीं।

कम से कम 6 जिलों में चुनाव के समय का बड़ा घोटाला सामने आ रहा है।

कोरोना काल में भी अनेक किस्म के घोटाले उजागर हो रहे हैं

मास्क, सेनेटाइजर आदि के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई की लूट की गई है। फर्जीवाड़े

में पटना का स्थान दसवां है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में जिले

में अर्द्धसैनिक बल की 60 कंपनियां आई थीं, तो उनपर 2 करोड़ तीस लाख खर्च हुए, लेकिन

2020 में 215 कंपनियों पर 42 करोड़ का खर्चा दिखलाया गया है। कंपनियों की मात्रा तीन

गुना बढ़ी लेकिन खर्च 21 गुना बिल बस के नंबर का दिखलाया गया, लेकिन बाद में पता

चल रहा है कि वह नंबर किसी बस का नहीं बल्कि बाइक का है। सृजन जैसे घोटाले की

तरह ये घोटाले भी राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं हैं। हम मांग करते हैं कि

सरकार इस पर श्वेत पत्र लाए। राज्य में बढ़ते अपराध का ग्राफ, 60 प्रतिशत से अधिक

दागियों का मंत्रिमंडल में होना बेहद ही चिंताजनक है। यह ताज्जुब की बात है कि जो

सरकार ‘सुशासन’ का दंभ भरती हो, उसके 18-18 मंत्रियों पर गंभीर आरोप हों। जाहिर

सी बात है कि राज्य सरकार का क्राइम, करप्शन व कम्युनलिज्म के नाम पर जीरो

टॉलरेन्स की बात पूरी तरह बेमानी है और वह भी जनता के सवालों के भाग रही है। 

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