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निर्भया कांड से देश को मिला सबक लेकिन कानूनी छेद भी दिखे

निर्भया कांड के अपराधियों को आज सुबह अंततः फांसी पर लटका दिया गया। इस

सजा से बचने के जो तौर तरीके आजमाये गये, उससे यह साफ हो गया है कि जघन्य

अपराध के बाद भी कानून के फंदे से बचने के अनेक तौर तरीके से हमारे कानून

व्यवस्था में मौजूद हैं। अत्यधिक उत्तेजना के क्षण में कई बार हमलोग इस किस्म की

कानून व्यवस्था की आलोचना भी करने लगते हैं। हमें ऐसा कई बार लगता है कि देश

का कानून पहुंच वालों की मददगार बनता है। कई बार इसके ठीक विपरीत फांसी जैसे

कठोरतम दंड के खिलाफ भी जनमानस उठ खड़ा होता है। लेकिन निर्भया कांड की

घटनाएं कुछ ऐसी थी कि कठोरतम दंड भी कई बार ऐसे अपराधियों के लिए कम नजर

आने लगता है। इसलिए शांत चित्त से यह विचार किया जाना चाहिए कि बलात्कार

और हत्या जैसे जघन्य अपराध के लिए देश के पास कौन से कानूनी प्रावधान उपलब्ध

है। निर्भया कांड को इसलिए भी याद रखा जाएगा क्योंकि इस एक कांड के बाद कांग्रेस

के नेताओं की प्रतिक्रिया ने देश के नागरिकों और खासकर दिल्ली के नागरिकों को

कांग्रेस के खिलाफ कर दिया था। लगे हाथ बाबा रामदेव के आंदोलन और बाद में अन्ना

हजारे के आंदोलन में भी कांग्रेसी नेताओं के तेवर एक जैसे ही रहे। नतीजा है कि पिछले

दो चुनावों में कांग्रेस को दिल्ली की जनता ने सत्ता के करीब फटकने तक नहीं दिया है।

हो सकता है कि कांग्रेस के नेता इस बात की गंभीरता को स्वीकार करना नहीं चाहते

लेकिन यह तय है कि निर्भया कांड के दौरान कांग्रेस की सरकार को जो संवेदना और

गंभीरता प्रदर्शित करनी चाहिए थी, उसमें बहुत कमी रही।

निर्भया कांड से सबक क्या दूसरों पर लागू होगा

अब निर्भया कांड के बाद हुए प्रदर्शनों से सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपा को भी यह

सबक लेना चाहिए। कई अवसरों पर सत्तारूढ़ भाजपा नेताओं के आचरण, बयान और

बॉडी लैंग्वेज उसी कांग्रेसी राज की याद दिला देते हैं। दूसरी तरफ चुपचाप हरेक के

आचरण को गौर करती जनता इन मुद्दों पर सोच समझकर अपना फैसला भी सुना देती

है। अब निर्भया के अपराधियों को फांसी लग चुकी है। इसलिए ठंडे दिमाग से यह विचार

किया जाना चाहिए कि क्या इस किस्म के जघन्य बलात्कार कांड के अपराधियों को

बचाव का पर्याप्त से अधिक अवसर भी प्रदान किया जाना चाहिए। यह सवाल इसलिए

प्रासंगिक है क्योंकि कई बार इस किस्म के सजा को अमल में लाने से होने वाले विलंब

से भी जनाक्रोश भड़कता है। लेकिन अब निर्भया कांड के बाद भाजपा की चुनौती

कुलदीप सेंगर और स्वामी चिन्मयानंद के सवाल पर भी एक जैसा आचरण करने का

है। यह दोनों ही भाजपा के नेता हैं और बलात्कार के आरोपी है। इन दोनों के खिलाफ

पुलिस का आचरण बिल्कुल ही पीड़ित विरोधी रहा है, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं

है। बलात्कार की पीड़ित को न्याय दिलाना तो दूर पुलिस ने इन पीड़ितों की शिकायत

तक दर्ज करने में आनाकानी की है। इसलिए क्या भाजपा के लोग अपने ही दल के दो

नेताओं के खिलाफ भी ऐसा ही कठोर दंड देने की वकालत कर पायेंगे, इसमें संदेह की

पूरी गुंजाइश है। लेकिन फांसी के सवाल पर जैसा कि देश के न्यायविद पहले से ही

कहते आये हैं, यह सही है कि फांसी जैसे कठोरतम दंड की सजा बहुत सोच समझकर दी

जाने वाली सजा है।

फांसी की सजा बहुत सोच समझकर ही दी जाए

निर्भया कांड के अपराधियों को उनके जघन्य अपराधों के कृत्य के लिए जो फांसी की

सजा दी गयी है, वह समय और समाज की मांग के अनुरुप ही है। अब यह देखना है कि

ऐसे अपराध में शामिल अपराधियों को भी बचने के लिए इतना अधिक समय दिया

जाना कहीं न्याय व्यवस्था का माखौल उड़ाना तो नहीं है। इसलिए यह माना जा सकता

है कि निर्भया कांड के पटाक्षेप के बाद ठंडे दिमाग से इन बातों पर फिर से विचार करने

का वक्त आ चुका है। वैसे अकेले इस एक कांड ने पूरे देश में बलात्कार जैसे अपराधों के

खिलाफ त्वरित कार्रवाई की न्याय प्रक्रिया के तहत ही बलात्कार जैसे मामलों की

सुनवाई अब फास्ट ट्रैक अदालतों में होने लगी है। अनेक ऐसे मामलों में दोषियों को

सजा भी मिल चुकी है। इसलिए न्यायिक सक्रियतावाद के अनेक बेहतर नमूनों के बीच

से इस किस्म के अपराधों के लिए अलग से विचार करने का समय भी आ चुका है। यह

अच्छी बात है कि इनदिनों बलात्कार जैसे मामलों में सामाजिक स्तर पर विरोध के स्वर

उठने लगे हैं। कुछ ऐसा ही बेंगलुरु की घटना में भी सामने आया है। जहां बलात्कार की

घटना के अपराधियों को पुलिस ने मार गिराया है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में बचाव पक्ष

के वकील एपी सिंह की भूमिका पर भी विचार करना चाहिए, जिन्होंने इस पूरे मामले में

यह दिखा दिया है कि भारतीय कानून में कितने छेद हैं।


 

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