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नील नदी शायद तीस मिलियन वर्ष से भी पुरानी है

  • नदी की गहराई में वैज्ञानिकों ने देखा तो सामने आया नया राज
  • इथोपिया में हुआ था यह भीषण ज्वालामुखी विस्फोट
  • ज्वालामुखी विस्फोट के प्रमाण नदी में मौजूद
  • नदी की गहराई से मिले प्राचीनता के सबूत
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः नील नदी का नाम दुनिया की अन्यतम प्रसिद्ध नदियों में से एक है।

यह चौड़ाई और अपनी लंबाई के लिए भी पूरी दुनिया में ख्यातिप्राप्त है।

इसके अलावा कई जलज जीवन भी इसी नदी में जीवन बसर करते हैं।

इनमें से कुछ खास प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर होने की वजह से उनपर पूरी दुनिया

के वैज्ञानिकों का ध्यान लगा रहता है। इसी क्रम में इस नदी की गहराई में चल रहे एक

शोध के दौरान कुछ ऐसे प्रमाण सामने आये हैं जिनसे इस नदी के जन्म का इतिहास और

भी प्राचीन होने का अनुमान व्यक्त किया गया है। पहले इस नदी को पृथ्वी पर करीब

पांच मिलियन वर्ष पहले बना हुआ माना गया था। अब नदी के अंदर से मिलने वाले

पत्थरों की जीवन की गणना से ऐसा समझा जा रहा है कि यह नदी तीस मिलियन वर्ष से

भी अधिक पुरानी हो सकती है। इस बारे में एक नये शोध प्रबंध में जानकारी उपलब्ध

करायी गयी है। इस शोध प्रबंध को नेचर जिओसाइंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

इसमें नदी के हर वैज्ञानिक पहलु का उल्लेख करते हुए इसके इतिहास का वर्णन किया

गया है। तथ्यों के आधार पर शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि दरअसल यह नदी पूर्व

के अनुमान से कहीं अधिक प्राचीन है। नदी के तल पर जो पत्थर मिले हैं, वे दरअसल

पृथ्वी के लावा के हिस्से हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि पृथ्वी पर हुए उथल पुथल और भीषण

ज्वालामुखी विस्फोट से यह पत्थर पृथ्वी के गर्भ से बाहर निकले थे। तरल अवस्था में

होने के बाद वे शीतलता पाकर पत्थर जैसे बन गये। उनके ऊपर नदी के पानी के प्रवाह का

दाग देखा गया है। इसी आधार पर नदी के इतिहास के पूर्व के अनुमान से अधिक पुराना

होने का यह तथ्य निकाला गया है।

नील नदी की गहराई में पाये गये पत्थरों में दर्ज है प्रमाण

समझा जाता है कि इस नदी की गहराई में वैसे पत्थर मौजूद हैं, जो पृथ्वी के अंदर के

तरल लावा के जमे हुए हिस्से हैं। इनपर नदियों के जल के प्रवाह के चिह्न मौजूद हैं। इसी

वजह से यह समझा जा सकता है कि यह नदी उसी दौरा में इन पत्थरों पर से बहती हुई

अपनी छाप छोड़ती गयी है।

टेक्सास विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिकों ने वहां के नमूने एकत्रित करने के बाद उनका

गहन विश्लेषण किया है। इसके तहत नदी और आस-पास के इलाकों की बनावट की भी

जानकारी ली गयी है। वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि इथोपिया के इलाके में पृथ्वी

की गहराई से इस किस्म के गले हुए पत्थरों की एक श्रृंखला ऊपर की तरफ आती गयी है।

दक्षिण के हिस्से से बाहर निकलने के बाद वे उत्तर की दिशा में बढ़ते चले गये हैं। यह

प्रवाह नील नदी के नीचे से भी गुजरा है। इसी वजह से नदी के नीचे पत्थर होने का अर्थ है

कि उस दौर में भी यह नदी मौजूद थी। पत्थरों पर पानी के निशान से ही माना जा रहा है

कि नदी का वास्तविक प्रवाह तीस मिलियन वर्ष पहले का है।

पृथ्वी के इस हिस्से और गहराई की संरचना के बारे में बताया गया है कि पृथ्वी के सबसे

आंतरिक छोर का यह बाहरी हिस्सा मैंटल कहलाता है। यह लगातार एक तरफ से दूसरी

तरफ सरकता रहता है। नदी के प्रवाह के साथ साथ इसके बहने की वजह से इससे बाहर

निकले वाले पत्थर नदी के जल के संपर्क में आते रहे हैं। इथोपिया के ऊंचाई वाले पहाड़ी

इलाकों में ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद से यह परिस्थिति बनी होगी। इसी आधार पर

पत्थरों अथवा लावा का प्रवाह वहां से प्रारंभ होकर नदी के तल तक पहुंचा है।

ज्वालामुखी विस्फोट का प्रवाह इथोपिया से नदी के डेल्टा तक आया

अब नदी की गहराई में ऐसे पत्थर इस बात को साबित कर रहे हैं कि दरअसल तीस

मिलियन वर्ष पहले भी यह नदी मौजूद थी। जिसके नीचे यह पत्थर दबे पाये गये हैं। नील

नदी के डेल्टा क्षेत्र में ऐसे पत्थरों की बहुतायत पायी गयी है।

इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने इसके लिए कंप्यूटर मॉडल का भी

सहारा लिया है। इसके आधार पर यह माना जाता है कि इथोपिया का यह पठारी इलाका

भी उसी ज्वालामुखी विस्फोट का परिणाम है। जिसमें जमीन के अंदर से गर्म लावा के

बाहर निकलने के साथ साथ यह हिस्सा भी उभरकर ऊपर की तरफ आ गया था। बाद में

यह धीरे धीरे पठारी क्षेत्र में तब्दील हो गया।

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