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भाजपा के लिए अगला लोकसभा बन गयी है महत्वपूर्ण चुनौती


भाजपा के लिए अगला लोकसभा चुनाव कितना महत्वपूर्ण है, यह तो गुजरात के मुख्यमंत्री को बदलने से ही स्पष्ट हो चुका है। सबसे पहले इस क्रम में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाया गया था।

उनके स्थान पर आये तिरथ सिंह रावत भी बहुत जल्द ही रवाना कर दिये गये। कर्नाटक के बीएस येदियुरप्पा जैसे कद्दावर नेता को भी मजबूरी में ही हटना पड़ा। असम में अधिकांश विधायकों का समर्थन हिमंता बिस्वा सरमा की तरफ होने की वजह से वहां भी सर्वानंद सोनोवाल को बदला गया, जिन्हें अब केंद्रीय मंत्री बना दिया गया है।

अब गुजरात के मुख्यमंत्री की बारी आयी है। ऐसा फैसला तब हो रहा है जबकि राज्यों में विधानसभा चुनाव करीब आते जा रहे हैं। वैसे गुजरात के लिए अगला मुख्यमंत्री कौन, यह बड़ा सवाल है। वहां तो कई नामों पर दांव भी लग रहे हैं।

इनमें से प्रमुख दावेदारों में उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल, केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया, पुरुषोत्तम रुपाला, गुजरात भाजपा नेता आर सी फालदू, सी आर पाटिल और लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल बताए जा रहे थे।  हालांकि, यह पहले से ही माना जा रहा था कि इस बार भी नया नेता पाटीदार समुदाय से होगा।

दरअसल पश्चिम बंगाल चुनाव में मिली करार हारी ने भाजपा के आत्मविश्वास को ध्वस्त कर दिया है। भाजपा के लिए भलाई की चिंता करते हुए कई वरिष्ठ नेता अब खुलकर सामने आये हैं, जिन्होंने बंगाल चुनाव के पहले तक चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह को अपने दायरे में रहने की नसीहत देते हुए अपना काम प्रारंभ कर दिया है।

भाजपा के लिए अगले चुनाव में अमित शाह की नहीं चलेगी

यह स्पष्ट है कि अगर गुजरात के मुद्दे पर अमित शाह का अंतिम फैसला मान्य होता तो विजय रुपाणी को नहीं बदला जाता क्योंकि अमित शाह ने ही आनंदीबेन पटेल के साथ अपने मतभेदों की वजह से सत्ता परिवर्तन कराया था।

उस समय गुजरात के मुद्दों पर सिर्फ और सिर्फ अमित साह की ही सुनी जाती थी। घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि भाजपा के अंदर भी बहुत कुछ बदल चुका है और कभी देश में नंबर दो भाजपा नेता समझे जाने वाले अमित शाह को भी अब पार्टी या यूं कहें कि आरएसएस, औकात में लाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर चुकी है।

बंगाल चुनाव में पराजय और उसके बाद ममता बनर्जी द्वारा विरोधी मोर्चा तैयार करने का एलान भी भाजपा को वोटों के प्रतिशत के खेल की गंभीरता को समझने पर विवश कर रहा है।

इसलिए यह स्पष्ट है कि अगले लोकसभा चुनाव तक भाजपा किसी अन्य राज्यो मे विधानसभा का चुनाव नहीं हारना चाहती है। खास कर उन राज्यों में, जहां उनकी सरकारें हैं।

एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश में भाजपा को पचास सीटों का नुकसान भी नेतृत्व की चिंता बढ़ाने वाली बात है।

पहली बार कोरोना संकट की वजह से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में तेजी से आयी कमी की वजह से मोदी के नाम पर ही चुनाव जीतने की चाल वर्ष 2024 में कामयाब होगी अथवा नहीं, इस पर शायद भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों को भी संदेह है।

इसलिए वे हर राज्य में अपनी जमीन को और मजबूत करना चाहते हैं ताकि अगले लोकसभा चुनाव में राज्य स्तर का नेतृत्व भी केंद्रीय नेतृत्व के हाथ मजबूत कर सके। लेकिन गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने को कोई सामान्य प्रक्रिया मान लेना भी गलत होगा।

गुजरात में विजय रुपाणी को लाने और आनंदीबेन को हटाने में शाह की भूमिका

इस बात को हर कोई जानता है कि विजय रुपाणी दरअसल अमित शाह की पसंद थे। अमित शाह ने ही आनंदीबेन पटेल के मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाया था ताकि उनकी पसंद का कोई नेता इस कुर्सी पर बैठे।

विजय रुपाणी कुर्सी संभालने के बाद भी पूरी तरह दिल्ली पर आश्रित ही रहे। इस वजह से उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ साथ पार्टी की लोकप्रियता में भी कमी आती चली गयी। नीचे से ऊपर तक यह बात स्पष्ट हो गयी थी कि विजय रुपाणी की अगुवायी में चुनाव लड़ना घाटे का सौदा होगा।

गुजरात के पिछले चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला देखा गया था। बीजेपी किसी तरह सत्ता बचाने में कामयाब हो गई थी लेकिन अब वह जोखिम नहीं लेना चाहती।

स्थानीय निकाय के चुनावों में आम आदमी पार्टी ने भी भाजपा की नींद खराब की है। लिहाजा अमित शाह के हाथ में करने को कुछ बचा नहीं रह गया था और बंगाल चुनाव के बाद उनकी बातों पर सवाल भी उठने लगे हैं।

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