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अगली पीढ़ी के भवन की सोच जापान के ओरिगामी पर आधारित

  • हस्तकला शिल्प से निकली नई वैज्ञानिक सोच

  • अस्थायी होने के बाद भी मजबूत ढांचा बनता है

  • चांद पर बस्ती बसाने में भी काम आयेगा यह

  • अंतरिक्ष अभियानों में भी काम आ सकेगी यह नई विधि

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अगली पीढ़ी के भवनकुछ इस तरीके बने होंगे, जो बिना किसी दबाव को झेले अपना

आकार कायम रख पायेंगे। जापान में कागजों को मोड़कर आकर्षक खिलौना जैसा आकृति

प्रदान करना ही ओरिगामी हस्तकला है।

वीडियो में देखिये क्या कहते हैं वैज्ञानिक

इसी पद्धति के आधार पर अब वैज्ञानिकों ने यह नया कमाल कर दिखाया है। वैसे भी

अस्थायी शिविर आदि बनाने में इससे मिलते जुलते तौर तरीकों का इस्तेमाल होता आया

है। खासकर अस्थायी अस्पताल और सैनिक छावनी जैसी जरूरतों में ऐसे अस्थायी ढांचे

काम में लाये जाते हैं। लेकिन अब तक ऐसे ढांचों के लिए यह आवश्यक होता था कि वे

लगातार अपने आकार को कायम रख पाने के लिए दबाव झेलते हैं। ऐसे अस्थायी तंबू जैसे

ढांचों को यथावत बनाये रखना कठिन कार्य होता है। ऐसे अस्थायी ढांचे दबाव हटाये जाने

पर सपाट से हो जाते हैं। अब हावर्ड जॉन ए पॉलसन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड एप्लाइड

साइसेंज (एसईएएस) ने इसका बिल्कुल नया समाधान खोजा है। वहां के वैज्ञानिकों ने

जापानी हस्तकला की तकनीक का इसमें प्रयोग किया है। इसके जरिए अगली पीढ़ी के

भवन ढांचे तैयार किये जा सकते हैं।

बड़ा आकार का ढांचा भी दबाव झेल सकता है

बड़े आकार के होने के बाद भी उन्हें अपने आकार में बनाये रखने के लिए अतिरिक्त प्रबंध

नहीं करना पड़ता है। काटिया बार्टोल्डी, विलियम और अमी कुआंन डैनोफ इससे जुड़े रहे

हैं। इनलोगों ने कहा कि जापान की हस्तकला ओरिगामी के आकार और दबाव के प्रबंधन

का गहन अध्ययन करने के बाद ऐसा किया जाना संभव हुआ है। ज्यामितीय गणित के

सिद्धांत के आधार पर ऐसा कर पाना संभव हुआ है। शोध दल ने सबसे पहले त्रिकोण

आकार के ढांचों पर काम किया और उन्हें आपस में जोड़ने का काम पूरा किया। अपनी मूल

हस्तकला के जैसा ही इस सिद्धांत पर बने ढांचे दबाव को चारों तरफ बांटकर आसानी से

अपने आकार में कायम रहने में सफल रह गये।

अगली पीढ़ी के बिल्डिंग मैटेरियल में नई उपलब्धि

इस सिद्धांत के बारे में इसी संस्थान के बेंजामिन गोरिसेन ने कहा कि अब तो किसी भी

पदार्थ से ऐसे बिल्डिंग मैटेरियल बनाये जा सकते हैं। यह न सिर्फ किफायती होंगे बल्कि

रिसाइकिल किये जाने लायक भी होंगे। अपने शोध के सिद्धांत को साबित करने के लिए

दल ने एक आठ फीट गुणा 4 फीट का ढांचा बनाया है। मोटे प्लास्टिक शीट से बना यह

ढांचा खुद ही फैल भी जाता है। इस बारे में डेविड मेलाकोन का कहना है कि किसी प्राकृतिक

आपदा की स्थिति में ऐसे ढांचे बहुत काम आयेंगे। इन्हें किसी ट्रक पर सपाट सतह की

तरह ढोकर ले जाया जा सकता है और जरूरत के स्थान पर उन्हें फैलाया जा सकता है। इन

ढांचों को आपस में मिलाकर नया और मजबूत आकार भी प्रदान किया जा सकता है।

फिलहाल वैज्ञानिक अगली पीढ़ी के मजबूत आकार के ढांचों पर ही ध्यान दे रहे हैं। इस बारे

में चक हॉबरमैन ने कहा कि अभी तो सिर्फ इस बात पर ध्यान दिया गया है कि उनका

प्राकृतिक आपदा में इस्तेमाल हो और वहां से सुरक्षित रहे। लेकिन भविष्य में अंतरिक्ष

अभियानों में भी ऐसे ढांचों का इस्तेमाल बहुत सारे काम आसान कर देगा। चांद पर इंसानों

की बस्ती बसाने अथवा मंगल ग्रह के अभियान में भी यह नये किस्म के ढांचे भविष्य में

काम आने जा रहे हैं। मुड़कर बिल्कुल सपाट होने और जरूरत के स्थान पर अपना आकार

स्थापित करने की यह खूबी ही इसके अगली पीढ़ी के बिल्डिंग मैटेरियल के तौर पर सामने

ला रही है।

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