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आम जनमानस को उसके असली मुद्दों से भटकाते न्यूज चैनल

आम जनमानस और खास तौर पर कहें तो भारतीय जनता की वर्तमान चुनौतियां और

प्राथमिकताएं समाचार चैनलों में कहां हैं, इस पर विचार नहीं खुली बहस की जरूरत है।

न्यूज चैनल जिस तरीके आम आदमी की बौद्धिक क्षमता पर संदेह कर रहे हैं, उसका सबसे

अधिक खतरा खुद चैनलों के भविष्य को लेकर है। विकल्प के अभाव में यह जब तक जी

रहे हैं वे अपनी करनी से धीरे धीरे सोशल मीडिया के आगे हथियार डाल देंगे, ऐसी स्थिति

खुद न्यूज चैनलों ने बना ली है। रिया चक्रवर्ती और कंगना रनौत अभी देश की प्राथमिकता

नहीं है। टीआरपी के बहाने इसी मुद्दे की आड़ में असली चुनौतियों से मुंह मोड़ते न्यूज

चैनलों ने शायद भारतीय राजनीति के उथल पुथल वाले इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा

है। इसी वजह से उसके नीति निर्धारकों को यह भ्रम है कि वे जिस तरीके से चाहें जनता को

हांक सकते हैं। लेकिन इसके बाद भी हाल के दिनों में कई उदाहरण ऐसे मौजूद हैं, जो यह

बता देते हैं कि न्यूज चैनल अपनी करनी से अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं। दूसरी तरफ

इसके भी साक्ष्य मौजूद हैं कि न्यूज चैनलों की भरपूर कोशिशों के बाद भी भारतीय

मतदाता उनके प्रभाव में आये बिना भी गंभीर किस्म के राजनीतिक फैसले लेते रहे हैं।

आम जनमानस की प्राथमिकताओं को भटकाने की साजिश भी

दरअसल देश की जनता के जो असली मुद्दे हैं, वे सरकार को परेशानी में डाल सकते हैं और

न्यूज चैनलों को यह भ्रम है कि ऐसे विषयों पर चर्चा से उनकी सेहत पर असर पड़ सकता

है। लेकिन न्यूज चैनलों के अपने इतिहास पर ही गौर करें तो यह साफ हो जाता है कि हरेक

को खुश रहने की प्रवृत्ति से चलने वाले चैनलों को अंततः दर्शकों ने नकार दिया है। इसी

वजह से आज का दर्शक किसी एक चैनल से टिककर नही रहता और वह महत्वपूर्ण विषयों

पर हर चैनल की दिशा और दशा को चैनल देखकर भांपता रहता है। वैसे इसके पीछे की

एक कड़वी सच्चाई पैसा कमाने की होड़ भी है। लोकतंत्र के नाम पर अर्थतंत्र की नौकरी

करने वालों के लिए यही प्राथमिकता आने वाले दिनों में उनके पूरी तरह से खारिज होने का

कारण भी बनेगी, यह तय है। यह भ्रम फैला दिया गया है कि आज के दौर में किसी मुद्दे पर

सरकार का विरोध दरअसल अघोषित अपराध है। इसी वजह से असली मुद्दों से अलग

हटकर दूसरे मुद्दों को परोसते हुए जनता पर सामूहिक सम्मोहन बनाने का खेल चल रहा

है। दूसरी तरफ सच यह भी है कि भारतीय जनता खुद को सम्मोहित किये जाने के इस

खेल को अच्छी तरह समझते हुए सम्मोहित हुए जाने का ढोंग भी कर रही है। राजनीतिक

फैसलों के अवसरों पर जनादेश यह स्पष्ट कर देगा कि वे न तो पहले और न अभी न्यूज

चैनलों में परोसी गयी खबरों के आधार पर मतदान का फैसला नहीं लेते हैं।

चैनलों की बहस अब एक प्रायोजित कार्यक्रम भर है

यह कहना गलत नहीं होगा कि न्यूज चैनलों में निरर्थक विषयों पर भी होने वाली बहस

अब एक किस्म का नकली नाटक जैसा प्रतीत होने लगा है। इस में मुंबई के मसाला फिल्म

की तर्ज पर हर कुछ परोसा जाता है और लोगों को जोड़ने के लिए मानसिक हिंसा और

तनाव की स्थिति बार बार पैदा की जाती है। लेकिन दरअसल भारतीय जनमानस क्या है,

यह तो कोरोना का संकट काल भी बता गया है। पैदल चलते प्रवासी मजदूरों के लिए गांव

देहात की बूढ़ी महिला द्वारा अपने घर के पेड़ से चार पपीता तोड़कर देना और साथ में

कागज की एक पुड़िया में नमक देकर खा लेने का आग्रह करना ही असली भारत है।

पाश्चात्य दुनिया के अंधानुकरण का घाटा उठा रहे हमलोग

काफी अरसे से इस पर पश्चिम के प्रदूषण की धूल जम गयी थी, जिसे कोरोना से उपजी

परिस्थितियों ने साफ कर देने का काम किया है। दरअसल अधिकांश न्यूज चैनल और

खास कर हिंदी भाषी चैनल इन दिनों बहस की बजाय आग भड़काने वाले तेवर और शब्दों

का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। इस किस्म के नाटक कुछ इस तरीक से गढ़े जा रहे हैं कि

दर्शकों को भी मानसिक तनाव हो। लेकिन न्यूज चैनल यह भूल जाते हैं कि टीवी का

रिमोट तो अंततः घर पर बैठे व्यक्ति के पास ही है। वह जब चाहे इस हिंसक माहौल से खुद

को अलग कर सकता है और किसी अन्य चैनल का रुख कर लेता है। वहां से भी मन भर

गया तो वह टीवी बंद भी कर सकता है। उसके बाद उसके भेजे में जो बातें डालने की

कोशिशें की गयी थी, उन्हें सोशल मीडिया के माध्यम से परखने का काम करता है।

लिहाजा यह मान सकते हैं कि आम जनमानस को चंद बुद्धिजीवियों ने जिस स्तर पर

बेवकूफ समझ रखा है, दरअसल आम जनमानस बौद्धिकता के मामले में कहीं उनसे

अधिक संपन्न है। वह अपना भला बुरा अच्छी तरह समझ सकती है।


 

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