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नये किस्म के ग्लेशियरों के मंगल ग्रह पर होन के संकेत मिले

  • ग्रह के कई इलाके इन्हीं ग्लेशियरों में ढके हुए हैं

  • ग्रह पर एक समतल इलाके में बनी है ऐसी स्थिति

  • इस अनोखे ग्लेशियर में गति भी दर्ज की गयी है

  • लाल ग्रह के भावी अभियान इसी पर होना तय है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नये किस्म के ग्लेशियरों से शायद मंगल ग्रह ढका हुआ है। उस ग्रह के कुछ इलाकों

में ऐसी परिस्थिति होने के वैज्ञानिक संकेत मिले हैं। नये किस्म के ग्लेशियरों के बारे में

वैज्ञानिकों का प्रारंभिक अनुमान है कि वहां के एक अपेक्षाकृत समतल इलाका, जिसे

आर्काडिया प्लानिशिया कहा गया है, में जो बर्फ हैं वे पृथ्वी के अंटार्कटिका में मिलने वाले

ग्लेशियों के जैसे ही हो सकते हैं। जिस इलाके को ग्लेशियरों से ढका हुआ समझा जा रहा है,

अगर वह अनुमान सही साबित हुआ तो भविष्य के मंगल अभियान निश्चित तौर पर इसी

इलाके की खोज के लिए होंगे, यह तय है। नासा और स्पेस एक्स की नजर पहले से ही इस

इलाके पर है। दरअसल खगोली दूरबीन से समतल नजर आने वाले इस इलाके में अंतरिक्ष

यान को उतारना अपेक्षाकृत आसान है।

इस बारे में कनाडा के वेस्ट ओंटारियो विश्वविद्यालय के शोध छात्र शैनन हिब्बार्ड ने कहा

कि समतल इलाके में बर्फ के जैसी स्थिति का होना आश्चर्यजनक है लेकिन दूसरे अनेक

वैज्ञानिक साक्ष्य तो यही संकेत दे रहे हैं कि वहां बर्फ के नये किस्म के ग्लेशियरों का

जमावड़ा है। मंगल ग्रह के इस समतल इलाके की उम्र का भी आकलन वैज्ञानिकों ने किया

है और पाया है कि यह इलाका करीब तीन बिलियन वर्ष पुराना है। इस इलाके में पहले

जीवित ज्वालामुखी के लावा का प्रवाह हुआ करता था। इसी वजह से लावा के ठंडा होने

बाद यह इलाका अपेक्षाकृत समतल हो चुका है। मंगल ग्रह के अन्य इलाके उबड़ खाबड़ ही

हैं। वैसे मंगल ग्रह की खाई जैसे इलाकों के अंदर की स्थिति के बारे में अभी ज्यादा शोध

नहीं हो पाया है।

नये किस्म के ग्लेशियरों को समझना चाहते हैं वैज्ञानिक

वहां की स्थितियों का जायजा लेने वाले अंतरिक्ष यानों से मिले आंकड़ों के मुताबिक यह

इलाका हाईड्रोजन से भरपूर इलाका है। हाईड्रोजन की उपस्थिति की वजह से ही वहां बर्फ

होने का भी अनुमान लगाया जा रहा है क्योंकि यह सभी जानते हैं कि हाईड्रोजन और

ऑक्सीजन मिलकर ही पानी बनाते हैं। काफी समय से मंगल ग्रह की संरचना पर गौर

करने वाले वैज्ञानिक मानते हैं कि नये किस्म के ग्लेशियरों ने ही कई इलाको को ढक रखा

है। इन ग्लेशियरों के नीचे पहाड़ भी हो सकते हैं, जो फिलहाल समतल अवस्था में ही नजर

आ रहे हैं क्योंकि वे ढके हुए हैं। वैसे वैज्ञानिक आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि नये किस्म

के ग्लेशियरों का प्रवाह किसी सांप की तरह हो रहा है। किसी समतल इलाके में ऐसा कैसे

हो रहा है, इस सवाल का उत्तर अभी वैज्ञानिक नहीं तलाश पाये हैं। इसे समझने के लिए

हर किस्म के आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया जा चुका है। पृथ्वी पर इस तरीके से

ग्लेशियरों का तेज गति से प्रवाह नहीं होता है। इसलिए उस बारे में अधिक वैज्ञानिक

आंकड़े फिलहाल मौजूद भी नहीं हैं। दिन औ रात में काफी चमकने वाले इन इलाकों में नये

किस्म के ग्लेशियरों मे गति क्यों है, यह समझना फिलहाल वैज्ञानिकों के लिए किसी

पहेली से कम नहीं है। पृथ्वी की परिस्थिति के मुताबिक अगर कोई ग्लेशियर सरक रहा है

तो उसके नीचे पानी का प्रवाह होता है। इसी जल के प्रवाह की वजह से पृथ्वी के ग्लेशियर

सरकते हैं। लेकिन वहां दरअसल क्या स्थिति है और इन नये किस्म के ग्लेशियरों के नीचे

की स्थिति के बारे में अब तक कोई अनुमान भी नहीं लगाया जा सका है।

लाल ग्रह के वायुमंडल में भी बर्फीले बादलों की मौजूदगी है

इस लाल ग्रह के ऊपर वायुमंडल में बर्फीले बादलों की मौजूदगी से भी शायद ग्रह के निचले

सतह पर गर्मी पैदा होती है। इससे ग्लेशियरों में मौजूद पानी नीचे से प्रवाहित होता है। वहां

की परिस्थितियों के बारे में अमेरिका के शोधकर्ताओं ने एक कंप्यूटर मॉडल भी तैयार

किया है। लेकिन पृथ्वी में जिस तरीके से माहौल है, उसके ठीक विपरीत मंगल ग्रह पर पूरी

तरह रेगिस्तानी माहौल है। ऐसे में नये किस्म के ग्लेशियर अगर हैं तो उनके नीचे क्या

कुछ राज छिपा है, इस पर वैज्ञानिकों के जानने की इच्छा तेज हो रही है। इसी वजह से

माना जा रहा है कि मंगल ग्रह पर होने वाले भावी अंतरिक्ष अभियान इन्हीं नये किस्म के

ग्लेशियरों को ध्यान में रखते हुए बनाये जाने वाले हैं।

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