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विज्ञान की नजरों से अब भी ओझल थी कुछ प्राचीन मानव प्रजातियां

  • डीएनए जांच में अज्ञात मानव प्रजाति का पता चला

  • पूर्व मानव के इस तीसरी प्रजाति का कोई रिकार्ड नहीं

  • पश्चिमी अफ्रीका के इलाकों में पाया गया यह डीएनए

  • इस प्रजाति का कोई पूर्व उल्लेख विज्ञान में नहीं था

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः विज्ञान की नजरों से अब भी बहुत कुछ ओझल ही है। मसलन

अंतरिक्ष के बारे में हमारी जानकारी बहुत कम है। अब दुनिया के अनेक

इलाकों तक हमारी बेहतर पहुंच नहीं होने की बात भी सभी को मालूम है।

लेकिन इंसान यह मानता था कि वह अपनी इंसानी प्रजाति के बारे में सब

कुछ जानता है। यह धारणा भी अब गलत साबित हो चुकी है। पश्चिमी

अफ्रीका के इलाकों में ऐसी मानव जाति के अवशेष मिले हैं, जिनके बारे

में विज्ञान के पास कोई पूर्व आंकड़ा अथवा तथ्य नहीं था। इस लिहाज से

इस अनुसंधान को भी नई खोज की श्रेणी में रखा गया है।

यह तो विज्ञान की नजरों में आ चुका है कि लाखों वर्षों के बीच वर्तमान

इंसान का विकास क्रमिक तौर पर हुआ है। इसलिए हम चिंपाजी को

अपना पूर्वज मानते हैं। लेकिन अब ऐसी इंसानी प्रजाति के डीएनए अवशेष

मिले हैं, जिनका उल्लेख वर्तमान विज्ञान में अब तक नहीं था। यह इंसानी

प्रजाति अफ्रीका के इलाकों में हजारों वर्ष पूर्व रहा करती थी और इस खोज से

इंसान के क्रमिक विकास में एक और नई जानकारी जुड़ गयी है।

इस नये किस्म के डीएनए का पता चलने के बाद शोध के तहत यह पाया गया

है कि इस डीएनए के अंश अफ्रीका की वर्तमान इंसानी प्रजाति में मौजूद हैं।

लेकिन यह अंश महज दो से 19 प्रतिशत तक ही सीमित हो गये हैं। लिहाजा

यह बीते कल की प्रजाति को तौर पर आंका गया है।

विज्ञान की नजरों में ओझल क्यों, जांच जारी

शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि यह प्रजाति करीब 43 हजार वर्ष पूर्व दूसरी

इंसानी प्रजातियों के संपर्क में आयी थी। यह विचार कैलिफोर्निया

विश्वविद्यालय (लॉस एंजिल्स) के प्रो. श्रीराम शंकररमण ने व्यक्त किया है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल साइंस में इस मुद्दे पर प्रकाशित लेख के वह

मुख्य लेखक हैं। इसमें बताया गया है कि काफी समय के अंतराल के बाद एक

प्रजाति का दूसरी प्रजाति के साथ संपर्क में आने के बाद तीसरी प्रजाति का

निर्माण हुआ है। इंसान के क्रमिक विकास की यही कड़ी है।

विज्ञान की नजरों में प्रथम प्रजाति के इंसानों को होमोसेपियन नाम दिया

गया है। यह प्रजाति करीब तीन लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व में आयी थी। वे

अफ्रीका में ही विकसित हुए थे और बाद में पूरी दुनिया में फैल गये। इस

दौरान यूरेशिया में नियरडेरथाल्स और नियरडेरथाल्स प्रजाति भी इनके

संपर्क में आये। इन तमाम प्रजातियों के होने के फॉसिल्स पहले ही मिल चुके

हैं। डीएनए विज्ञान के विकसित होने की वजह से उनके डीएनए साक्ष्य भी

पहले ही मिल चुके थे। यह पहला मौका है जबकि इन सभी प्रजातियों से

भिन्न डीएनन रखने वाले इंसानी अवशेष का पता चला है।

शोधकर्ता दल के नेता शंकर रमण ने कहा कि अभी इस अज्ञात प्रजाति के बारे

में ज्यादा कुछ पता नहीं चल पाया है। यहां तक कि यह प्रजाति किस इलाके में

बहुतायत में थी, यह भी प्रमाणित नहीं है। साथ ही इस प्रजाति से मिलते

जुलते अवशेषों का मिलना भी अभी शेष है। इन तथ्यों को उपलब्ध होने के

बाद ही यह मालूम पड़ेगा यह इस प्रजाति का इस दुनिया से सफाया कैसे और

क्यों हो गया।

अन्य मानव प्रजातियों से इसका कोई मेल नहीं

शोध दल का यह भी मानना है कि शायद इंसान की यह अनजानी प्रजाति

होमोसेपियन समूह से अलग की हो और उनका अस्तित्व पृथ्वी पर साढ़े छह

लाख वर्ष पहले का हो। लेकिन क्रमिक विकास के तहत इंसानों की पूर्व

प्रजातियों का एक दूसरे से संपर्क हुआ था, यह संकेत तो पहले ही मिल चुके हैं।

पश्चिमी अफ्रीका में रहने वाले सैकड़ों लोगों के जिनोम का परीक्षण भी इस

शोध के तहत किया गया है। नाइजिया और सिएरे लिओन के इलाके में रहने

वालों के डीएनए का परीक्षण किया गया था। लेकिन इनके डीएनए में

नियरडेरथाल्स और डेनिसोवांस के अलावा भी दूसरी प्रजाति के अंश पाये गये

हैं। इस अज्ञात प्रजाति के बारे में पता चलने के बाद यह कैसी थी और

किसतरीके से बाद में बदलती चली गयी अथवा पूरी तरह समाप्त हो गयी,

इस पर आगे का अनुसंधान प्रारंभ हो चुका है।

वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि इस अज्ञात प्रजाति के इंसानी डीएनए

से अफ्रीका के इस इलाके के लोगों को क्या कुछ फायदा हुआ है। यह जांचना

इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हर प्रजाति के डीएनए के आधुनिक इंसान को

कुछ न कुछ फायदा हुआ है। मसलन तिब्बत के लोगों को इसी डीएनए की

बदौलत अधिक ठंड के इलाके में रहने का गुण स्वाभाविक तौर पर हासिल

हुआ है।

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