नसों को ठीक करने और दोबारा बनाने में काम आयेगा यह नया यंत्र

नसों को ठीक करने और दोबारा बनाने में काम आयेगा यह नया यंत्र
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  • आकार में सिक्के जितनी बड़ी मशीन

  • मोटाई किसी कागज के जितनी ही

  • चूहों पर प्रयोग पूरी तरह सफल रहा

प्रतिनिधि



नयादिल्लीः नसों को सुधारने तथा नये तरीके से उनका निर्माण करेगा नया यंत्र।

इस यंत्र की विशेषता यह है कि यह अपना काम पूरा करने के बाद खुद ही समाप्त हो जाएगी।

एक सिक्के के आकार और एक कागज की मोटाई का यह यंत्र एक वायरलैस यंत्र होगा।

यंत्र का काम खराब पड़ी नसों के भीतर नये सिरे से विद्युतीय प्रवाह को चालू करना होगा।

इसके अलावा वह जहां की नसें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, वह अपने अंदर के संकेतों से उन्हे नये सिरे से तैयार भी करने में सक्षम होगा।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इस यंत्र को तैयार किया है।

एक वैज्ञानिक पत्रिका में इस यंत्र के बारे में पहली बार जानकारी दी गयी है।

इस यंत्र को तैयार करने से जुड़े वैज्ञानिकों ने इसके काम करने के तरीकों पर भी जानकारी दी है।

चूहों पर इसका सफल परीक्षण किया जा चुका है।

नसों की इस मशीन का अब इंसानों पर होगा परीक्षण

अब आगे के दौर में मनुष्यों पर इसके क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी चल रही है।

यह यंत्र शरीर के अंदर दो हफ्ते तक रहता है और अपनी जिम्मेदारी निभाता जाता है।

यह अपने स्तर पर लगातार विद्युतीय तरंग भेजकर नसों को नये सिरे से सुधारता है और उन्हें पहले जैसा बना देता है।

अपना काम पूरा करने के बाद यह मानव शरीर में अपने आप ही घुल भी जाता है।

यह माना जा रहा है कि प्रयोग सफल होने के बाद खास तौर पर कार दुर्घटना और खेल के दौरान लगने वाली चोटों का इससे सबसे बेहतर ईलाज हो पायेगा।

इस शोध प्रबंध के सह लेखक और वाशिंगटन विश्वविद्यालय के न्यूरोसर्जरी विभाग के एसोसियेट प्रोफसर विल्सन रे ने बताया है कि इस बात की जानकारी सभी को है कि सर्जरी होने के बाद विद्युती तरंगों के माध्यमों से सुस्त पड़ चुकी नसों में नई जान फूंकी जाती है।

अब यह मशीन शरीर के अंदर रहकर यही काम करने जा रहा है।

इस छोटी सी मशीन से लगातार यह विद्युतीय तरंग प्रवाहित किये जाने की वजह से नसों के फिर से सुधरने की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाएगी।

वर्तमान में सर्जरी के दौरान जो तरंग प्रवाहित किये जाते हैं, वह सर्जरी समाप्त होने के बाद अपने आप ही रूक जाती है।

इसलिए अगर सर्जरी के बाद यह काम अबाधित गति से और नियमित अंतराल से चलता रहे तो मरीज को ठीक होने में कम समय लगेगा।

इस शोध प्रबंध के वरीय सह लेखक और नार्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय के जॉन रोजर्स ने बताया है कि

इसकी विशेषता यह है कि अपना काम पूरा करने के बाद यह मशीन घुल जाती है और शरीर में कुछ समय के बाद उसका कोई भी अंश शेष नहीं रहता।

इसे काम में लाने की विधि के बारे में भी जानकारी दी गयी है।

नसों के ऊपर बांध दी जाती है यह मशीन

इसके अनुसार क्षतिग्रस्त नसों के बाहर यह लचीली मशीन बांध दी जाती है।

जो एक खास अंतराल पर नसों के अंदर तरंगों को प्रवाहित करती रहती है।

इससे नसों के दोबारा सुचारू रुप से काम करने में बहुत कम समय लगता है।

इसे बाहर की एक मशीन के द्वारा निर्देशित और नियंत्रित किया जाता है।

इससे चिकित्सक और वैज्ञानिक नसों में हो रहे बदलाव को भी लगातार देख समझ पाते हैं।

चूहों पर हुए प्रयोग के दौरान चूहों के क्षतिग्रस्त सियाटिक नसों पर इसका अध्ययन किया गया।

इन नसों का इस्तेमाल पिछले पैरों के संचालन में किया जाता है।

प्रयोग के दौरान चूहों पर अलग अलग अंतराल पर यह विद्युतीय तरंग छोड़े गये।

यह पाया गया कि जिन चूहों पर यह तरंग कम समय के अंतराल में छोड़े गये थे, वे जल्दी स्वस्थ हो गये।

साथ ही इन तरंगों का चूहों पर कोई उल्टा असर भी नहीं पाया गया।

क्लीनिकल ट्रायल में इसके सफल होने के बाद इस विधि से होने वाले उपचार से

भीषण दुर्घटना के शिकार लोग भी बहुत जल्द स्वस्थ होंगे, ऐसी उम्मीद जतायी गयी है।

 

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