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धरती के प्राचीन इतिहास को समझने की वैज्ञानिकों की नई कोशिश




ग्रेट कैनियोन के इलाके छिपा है करोड़ों वर्षों का राज
जिरकॉन के अंदर भी हैं बदलाव के सारे राज
जमीन के सतहों पर मौजूद साक्ष्यों की जांच
राफ्ट पर सवार होकर पूरे इलाका पर शोध
राष्ट्रीय खबर

रांचीः धरती के प्राचीन इतिहास और उसकी संरचना के क्रमिक विकास को समझना वैज्ञानिकों के एक निरंतर खोज का विषय रहा है। अलग अलग स्थानों से मिलने वाले अवशेषों और अन्य भौगोलिक पहचानों के आधार पर यह काम काफी समय से चलता आ रहा है। इस बार इसी प्रयास के तहत ग्रेट कैनियोन के इलाके से धरती के प्राचीन इतिहास को समझने का नया प्रयास वैज्ञानिकों के द्वारा किया गया है।




इसके तहत वहां की जलधारा से गुजरते हुए वैज्ञानिकों ने नये नमूने एकत्रित किये हैं। उनकी यह यात्रा लगातार 11 दिनों की थी, जिसमें वे एक राफ्ट (छोटी नाव) के सहारे पूरे इलाके का अध्ययन करते हुए आगे बढ़ते गये हैं। इंडियाना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता ओलिविया थर्स्टन कहती है कि प्राचीन काल से अब तक क्या क्या होता आया है, उन सभी के कुछ न कुछ प्रमाण इस ग्रेट कैनियोन की धरती की सतह पर छिपे हुए हैं।

सिर्फ उनकी पहचान कर तथ्यों को समझने की जरूरत है। दरअसल इस ऊबड़ खाबड़ इलाके की धरती पर अलग अलग कालखंड के अपने निशान मौजूद हैं, यह पहले भी पता चल चुका है। अब वैज्ञानिकों का दल क्रमवार तरीके से इन्हीं निशानों को खोजने तथा उनके आधार पर प्राचीन पृथ्वी पर घटित घटनाओँ को समझने की कोशिश कर रहा है।

यह पहले ही पता चल चुका है कि इसकी सतह के सबसे नीचे जो पत्थर मौजूद हैं वे करीब 1.3 बिलियन वर्ष से भी पुराने हैं। लेकिन इस प्राचीन काल के बाद कब क्या हुआ है, यह समझना पृथ्वी के इतिहास और भूगोल के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

धरती के प्राचीन इतिहास के वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद हैं

दरअसल समय के साथ साथ इस इलाके की सतह के नीचे दबे वैज्ञानिक साक्ष्य धीरे धीरे बाहर आ रहे हैं। इससे प्राचीन काल के घटनाक्रमों को समझने में भी आसानी हो रही है। इसी वजह से थर्स्टन और 25 अन्य वैज्ञानिकों का दल राफ्ट पर सवार होकर वहां का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने गये थे।

यूं तो यह ग्रेट कैनियोन का इलाका एक प्रमुख पर्यटन केंद्र है लेकिन वैज्ञानिकों की नजर में यह प्राचीन धरती में कब क्या होता आया है, उसके साक्ष्य साथ लेकर बैठा है। वहां के पत्थरों और मिट्टी में प्राचीन घटनाक्रमों के साक्ष्य मौजूद हैं। इस दल ने जिरकोन हिलियम थर्मोक्रोनोलॉजी विधि का भी इस्तेमाल किया है।

इस विधि से कमसे कम इस बात की जानकारी मिल पाती है कि यूरेनियम के ठंडा होने में कितना वक्त लगा है, उसका पता इस विधि से चल जाता है। अंदर दबे खनिज जब क्षरण की वजह से अंदर से बाहर की तरफ निकलते हैं तो उनकी पहचान और समय को तय कर पाना आसान हो जाता है।




दरअसल यह जान लेना भी जरूरी है कि वहां के खनिजों में मौजूद ऐसे तत्व भी हैं, जो दरअसल रेडियोधर्मी हैं और ऐसे पदार्थों को ठंडा होने में एक खास समय लगता है।

प्रारंभिक खोज में यह संकेत भी मिले हैं कि अलग अलग कालखंड में यह इलाका धरती से ऊपर की तरफ भी उठा है। इसकी भी खास वजहें हो सकती हैं लेकिन उसके लिए अतिरिक्त साक्ष्यों का मिलना जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि ऐसा किसी उल्कापिंड के गिरने की वजह से अथवा किसी बड़े भूकंप की वजह से हुआ है।

नई तकनीक से सही स्थिति का पता लगायेंगे वैज्ञानिक

नई जिरकॉन हिलियम तकनीक का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक उसके भी आंकड़े एकत्रित कर रहे हैं ताकि बाद में उनका विश्लेषण कर सही स्थिति का पता लगाया जा सके। ग्रेट कैनियोन में जिरकोन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

जिसके अंदर यूरेनियम और हिलियम की उपलब्धता होती है। इसलिए जिरकॉन के अंदर मौजूद इन तत्वों की पहचान से समय की पहचान करना आसान हो जाएगा और यह नई विधि अधिक परिष्कृत तौर पर समय के प्रभाव को दर्शा सकती है।

धरती के प्राचीन इतिहास को संजोकर रखने वाला यह पुराना इलाका पृथ्वी पर समय समय पर होने वाले बदलावों का भी प्रमाण अपने अंदर समेटे हुए हैं। अब वैज्ञानिक इस नई विधि से उसे ही समझने की कोशिश कर रहे हैं।

वातावरण के विभिन्न कारणों से वहां के मिट्टी के अंदर से दबे पड़े जो साक्ष्य भूक्षरण की वजह से बाहर आ रहे हैं, उनमें भी इस विधि से बहुत कुछ जानने समझने का मौका इस दल को मिला है। जिसके आधार पर इस दल ने अपनी एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की है।



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