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पृथ्वी से कार्बन के प्रदूषण को कम करने का नया आविष्कार सामने आया







  • वैज्ञानिकों ने कार्बन सोखने वाला नया पदार्थ तैयार किया
  • दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बना है कार्बन डॉईऑक्साइड
  • कार्बन सोखकर इस्तेमाल के लायक आर्गेनिक बनाता है
  • ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा कम करने में होगा मददगार
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी से कार्बन को कम करना दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

जैसे जैसे दुनिया में औद्योगिकीकरण बढ़ा है, यह परेशानी भी उसी अनुपात में बढ़ती चली गयी है।

अब इस दिशा में एक नये पदार्थ का आविष्कार इस चुनौती को कम कर सकता है।

यह पदार्थ आसानी से एक खास वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत कार्बन को सोखकर उसे आर्गेनिक पदार्थ में तब्दील कर देता

है। इसके विकास से दुनिया में कमसे कम ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को कम करने में बड़ी मदद मिलने की उम्मीद की

जा रही है। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक यह दावा कर रहे हैं कि इस पदार्थ की मदद से जो आर्गेनिक पदार्थ तैयार होते हैं,

उनका भी बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

जापान के कोयोटो विश्वविद्यालय के शोध कर्ता भी इस वैज्ञानिक परीक्षण में शामिल थे।

इसी शोध में शामिल दल के सदस्यों ने बताया है कि यह नया पदार्थ कुछ ऐसा है कि वह खुद ही

कार्बन डॉइऑक्साइड को अपनी तरफ खींच लेता है। एकबार कार्बन को खींच लेने के बाद तुरंत ही

उसे बदलने की प्रक्रिया इसेक अंदर प्रारंभ हो जाती है।

प्रक्रिया समाप्त होने के बाद कार्बन के बदले उसमें से जैविक पदार्थ तैयार होकर बाहर निकलते हैं,

जो हमारे काम आ सकते हैं। इस विधि को आगे बढ़ाये जाने पर इसका सबसे बेहतर इस्तेमाल

दुनिया के ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को कम करने में किया जा सकता है।

इस शोध की सफलता की जानकारी नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में

नेचर कम्युनिकेशन नामक एक पत्रिका में जानकारी दी गयी है।

इस प्रकाशित लेख में बताया गया है कि वर्तमान में जैविक इंधन को जलाने की वजह से जो

कार्बन डॉईऑक्साइड वातावरण में घुल रहा है, वह ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ा रहा है।

इसी बदलाव की वजह से पृथ्वी में वातावरण भी बदल रहा है तथा पर्यावरण तेजी से बिगड़ता जा रहा है।

पृथ्वी के बिगड़ते पर्यावरण के अनेक जीवंत उदाहरण भी हमारे सामने लगातार आ रहे हैं।

खास तौर पर उत्तरी ध्रुव और आस-पास के इलाकों से बर्फ के ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना

पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बन रहा है।

इसी तरह भारत में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से कई इलाकों में तबाही आ सकती है।

दरअसल पृथ्वी पर कार्बन डॉइऑक्साइड को मात्रा को नियंत्रित करने वाले पेड़ों की संख्या में भी कमी आयी है।

इससे यह समस्या दिनोंदिन विकराल होती जा रही है।

वर्तमान में कार्बन डॉईऑक्साइड को बदलने की जो वैज्ञानिक प्रक्रिया उपलब्ध है, उसमें बिजली की खपत अत्यधिक है।

दूसरी तरफ कमरे को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले एयर कंडिशनर और खाद्य पदार्थों को ठंडा रखने

के लिए बने फ्रीज भी ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को बढ़ाते चले जा रहे हैं।

दूसरी तरफ गर्मी के निरंतर बढ़ते जाने की वजह से लोगों को सुविधा के लिए भी

इन खास उपकरणों की अधिक जरूरत पड़ रही है।

पृथ्वी से कार्बन कम करना अब पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती

नये पदार्थ का आविष्कार एक साथ इन सभी चुनौतियों का मुकाबला कर सकता है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक मानते हैं कि जहां जैविक ईंधन से काम हो रहा है, वहां इसका अधिकाधिक इस्तेमाल

प्रारंभ में ही ग्रीन हाउस गैस बनने की प्रक्रिया को स्थायी तौर पर समाप्त कर सकता है।

इसके लिए संयंत्रों में जहां इस कार्बन डॉईऑक्साइड का उत्सर्जन होता है,

वहीं इस विधि को स्थापित किया जाना चाहिए।

इसे तैयार करने के संबंध में वैज्ञानिकों ने जो सामान्य जानकारी दी है, उसके मुताबिक एक छिद्रदार आवरण

वाला खोल तैयार किया गया है। इसे जिंक के आवणिक कणों से धातु के स्वरुप में रखा गया है।

इस पदार्थ की जांच एक्सरे से की गयी थी। इसकी वनावट के बारे में पाया गया है कि

यह अपनी संरचना की वजह से कार्बन डॉईऑक्साइड के कणों को दस गुणा अधिक गति से सोख सकता है।

यह विधि दूसरी पीसीपी में भी है लेकिन गति के मामले में यह सबसे तेज साबित हुआ है।

दरअसल इसकी आणविक संरचना किसी घूमने वाले प्रोपेलर के जैसी है।

जब कार्बन डॉईऑक्साइड के कण इसके करीब पहुंचते हैं तो यह चक्का घूमने लगता है।

इस चक्कर की वजह से कार्बन के कण इसमें अलग हो जाते हैं।

आतंरिक वैज्ञानिक संरचना की वजह से ये बदलते हैं जबकि इसी पीसीपी के अंदर की बनावट

उन्हें अगले चरण में आर्गेनिक पदार्थ में बदल देती है।



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