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नये धातुओं से बदल रही है वैज्ञानिक तकनीक और आयाम

  • दुनिया भर में चल रहे हैं अनेक शोध और अनुसंधान

  • सुपर कंडक्टर तैयार करने में इनकी प्रमुख भूमिका

  • बिजली चालित मशीनों की डिजाइन ही बदलेगी

  • अभी से बेहतर कार्यकुशल होगी भावी मशीनें

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः नये धातुओं से आने वाले दिनों में विज्ञान और वैज्ञानिक

उपकरणों का चेहरा और काम करने का तरीका भी बदल सकता है। इन

नये धातुओं की खास विशेषता उनके सुपरकंडक्टर यानी बेहतर चालक

के गुण का अत्यंत विकसित होना है। सुपरकंडक्टर के बारे में यह जान

लें कि यह ऐसी धातु है तो बिजली के तंरगों को आगे बढ़ाने के रास्ते में

कोई रुकावट पैदा नहीं करती और उससे ऊर्जा का क्षय भी नहीं होता है।

वर्तमान में अनेक ऐसे धातु हैं जो यह काम करते वक्त अत्यधिक गर्म

होने लगते हैं। इस वजह से उन्हें ठंडा रखने के लिए अलग से इंतजाम

करना पड़ता है। जब कोई नया धातु बिना गर्म हुए यह काम लगातार

करता जाएगा तो उसे ठंडा रखने के उपाय की जरूरत नहीं पड़ेगी। शोध

में यह भी प्रमाणित हो चुका है कि नये धातुओं के गर्म होने की स्थिति

में भी काम करने की गुणवत्ता पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

लेकिन अब तो विज्ञान वैसे नये धातुओं को तैयार करने में जुटा है

जो सामान्य तापमान में बेहतर तरीके से अपनी जिम्मेदारियों को

अंजाम दे सके।

जाहिर है कि वैज्ञानिक उपकरणों के संचालन में उसे ठंडा रखने की

आवश्यकता जब पूरी तरह समाप्त हो जाएगी तो मशीन का डिजाइन

भी बदल जाएगा और ठंडा रखने का अलग से प्रबंध नहीं होने की वजह

से ऐसी मशीनों का आकार भी कम हो जाएगा। दुनिया के कई शोध

संस्थानों में इस पर तेजी से काम चल रहा है और कई नये धातुओं को

तैयार करने में सफलता भी मिल चुका है।

नये धातुओं का विकास वैज्ञानिक तकनीक बदल देगी

टी यू वेइन (वियना, ऑस्ट्रिया) के अलावा राइस विश्वविद्यालय

(ह्यूस्टन, टेक्सास) ने इसमें काफी सफलता पायी है। इन दोनों शोध

संस्थानों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो इस किस्म के पदार्थों के

अत्यंत पतले पर्त को भी जांच सकती है। पहले इनकी जांच मशीनी

आंकड़ों के आधार पर होती थी, जिनमें गलती होने की गुंजाइश रहती

थी। अब तो इस विधि से किसी भी पदार्थ के अंदर की गतिविधियों को

आंखों से देखा जा सकता है क्योंकि वे किसी भी स्क्रीन पर नजर आने

लगते हैं। इससे नये पदार्थ और सुपर कंडक्टर तैयार करने की दिशा में

उल्लेखनीय सफलता मिलने की उम्मीद है। वर्ष 1987 में पदार्थ

विज्ञान का नोबल पुरस्कार इसी सिद्धांत पर दिया गया था। लेकिन

उसके बाद से इतने दिनों बाद भी इस विधि को और आगे नहीं जाया

जा सका है। वियेना टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय के प्रो. सिल्के बूह्लर

कहते हैं कि वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने की आवश्यकता की

वजह से इसे आगे और विकसित करने की सख्त जरूरत है। जब इस

दिशा में काम होने लगेगा तो तय है कि खास तौर पर बिजली से

संचालित होने वाले सारे उपकरणों की डिजाइन बदलेगी और उनका

आकार भी काफी छोटा हो जाएगा। तांबा अथवा सोना जैसे धातु भी

थोड़ी बहुत अवरोध पैदा करते हैं इसी वजह से बिजली के काम में उनके

उपयोग के दौरान भी आणविक कणों के आदान प्रदान से उत्पन्न होने

वाली ऊर्जा को कम करने के लिए अलग इंतजाम करने पड़ते हैं। सुपर

कंडक्टर बनाने में नये धातुओं का इस्तेमाल इस अवरोध को भी

समाप्त कर देगा। मशीन का ताप बढ़ने से रोकने का जो इंतजाम

वर्तमान मशीनों में करना पड़ता है, अगर उनकी जरूरत समाप्त हो

गयी तो आगे क्या कुछ होगा इसे आसानी से समझा भी जा सकता है।

क्वांटम थ्योरी पर इसी दिशा में बहुत काम हो चुके हैं

क्वांटम सिद्धांत पर सर्वाधिक काम इसी आवश्यकता की वजह से हो

रहा है। इस क्वांटम सिद्धांत पर कई कंप्यूटर संरचनाओं का निर्माण भी

हो चुका है तो वर्तमान पीढ़ी के कंप्यूटरों और सुपर कंप्यूटरों के

मुकाबले अधिक तेज गति से एवं अधिक बेहतर तरीके से काम कर

सकते हैं। नये धातुओं में येटिबियम, रोडियम, सिलिकॉन जैसे

आविष्कार उल्लेखनीय है। इन सभी को नये धातु की श्रेणी में रखा

गया है। इन्हें वैज्ञानिक स्ट्रैंज मैटल यानी अजीब धातु भी कहते हैं। इन

सभी नये धातुओं में ऊर्जा का स्थानांतरण इतनी तेज गति से होता है

कि सामान्य तरीके से उन्हें नापा भी नहीं जा सकता है। अत्यंत तीब्र

गति के इस आणविक क्रिया को नापने के बाद ही उनकी वास्तविक

संरचना को पूरी तरह समझा जा सकता है। इन नये धातुओं से तैयार

होने वाले सभी उपकरण दूसरे ही वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित

होंगे, इस बात को अच्छी तरह समझा जा सकता है। वर्तमान में इनमें

से कई काम करने के दौरान वाष्प बनकर काम करते हैं इसलिए उनकी

गुणवत्ता का सही आकलन भी नहीं हो पा रहा है। आकार में अत्यंत

क्षुद्र होने की वजह से उनके काम करने की गुणवत्ता को फिलहाल

नियंत्रित करने की दिशा में काम चल रहा है। इनके विकल्प के तौर पर

एक और नया धातु सामने आया है। इसे जर्मानियम का नाम दिया

गया है। स्फटिक जैसी इसकी संरचना येटिबियम में सही तरीके से

फिट हो जाते हैं। इससे अत्यंत पतला पर्त के बाद भी बेहतर कार्य किये

जा सकते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि सुपर कंडक्टर का आकार

काफी छोटा होने की वजह से सब कुछ बदलने वाला है। दुनिया इस

बदलाव को शीघ्र ही देख भी पायेगी।

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  1. […] नये धातुओं से बदल रही है वैज्ञानिक तकन… दुनिया भर में चल रहे हैं अनेक शोध और अनुसंधान सुपर कंडक्टर तैयार करने में इनकी … […]

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