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सार्क की नई प्रजाति का पता चला भारत महासागर में

  • पूर्वी अफ्रीका के इलाके में नजर आयी यह प्रजाति

  • चोंचनूमा नाक में शिकार करने की क्षमता है

  • छह गलफड़ों वाला पहला प्राणी जीवित अवस्था में

  • इस समुद्री मछली की नाक चोंच जैसी लंबी और घातक थी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सार्क की एक नई प्रजाति के बारे में वैज्ञानिकों को जानकारी मिली है। भारत

महासागर में अनुसंधान के दौरान उन्हें पहली बार देखा गया है। पूर्वी अफ्रीका के इलाके

में इस सार्क की नई प्रजाति के दो एक साथ नजर आये हैं। प्रारंभिक परीक्षण के दौरान

समुद्र वैज्ञानिकों ने कहा है कि यह सिक्स गिल शॉ सार्क की प्रजाति के हैं। आकार में यह

अभी काफी छोटे हैं। नजर आने के लिहाज से वे तीन से चार साढ़े चार फीट लंबे हैं। इस

प्रजाति की दूसरी सार्क नजर आने से वैज्ञानिक भी हैरान हुए हैं। इससे पहले इस प्रजाति

के होने का अंदेशा समुद्र वैज्ञानिकों को नहीं था। इस एक खोज से वैज्ञानिकों ने फिर इस

बात को दोहराया है कि अब भी आधुनिक विज्ञान समुद्र के अंदर के बारे में बहुत कुछ

नहीं जान सका है।

पश्चिम जर्मनी के हैमबर्ग के एलासमोब्रांच रिसर्च लैब के समुद्र वैज्ञानिक सिमोन

वेइगमान कहते हैं कि अभी भी समुद्र की गहराइयों में छिपे रहस्यों को पूरी तरह

समझने में शायद काफी वक्त लगेगा क्योंकि हर गहराई तक इंसान आज भी अपनी

आधुनिक तकनीक के बाद भी नहीं पहुंच पाया है। उन्होंने ही अपने सहयोगियों के साथ

मिलकर इस सार्क की नई प्रजाति के बारे में अपनी रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट

वैज्ञानिक पत्रिका पीएलओएस वन में गत 18 मार्च को प्रकाशित हुई है।

सार्क की नई प्रजाति की रिपोर्ट वैज्ञानिक पत्रिका में

शॉ सार्क के बारे में पहले ही पता है कि उनकी चोंच जैसी नाक के आकार भी दांतों जैसा

नुकीला होता है। वे अपने शिकार को इसकी मदद से छिन्न भिन्न कर देते हैं। अन्य

समुद्री प्राणियों के बारे दांतों का यह पैना हिस्सा उनके मुंह में होता है।

वैज्ञानिक परिभाषा के मुताबिक यह शॉ सार्क 23 फीट तक लंबा भी हो सकता है। इनमें

से कई के पास दोनों तरफ पांच पांच गलफड़े होते हैं। सिर्फ इस सार्क की नई प्रजाति के

पास दोनों तरफ छह छह गलफड़े हैं। इस प्रजाति के होने का पता चला था दक्षिण

अफ्रीका और मोजांबिक के इलाके के समुद्र में भी। अब इन्हें देखने के बाद वैज्ञानिक यह

मान रहे हैं कि वर्तमान दौर में छह गलफड़ों का होना ही यह साबित करता है कि यह

प्राचीन काल के सार्क की ही प्रजाति है। आज के दौर में इनकी अब कोई उपयोगिता नहीं

रह गयी है। इसलिए क्रमिक विकास के दौर में अन्य सार्कों पर से यह अतिरिक्त

गलफड़े समाप्त हो चुके हैं।

मैडागास्कर के पास भी एक मछुआरा ने पकड़ा था

इसके पहले भी वर्ष 2017 में एक मछुआरा को मैडागास्कर के पास इस सार्क की प्रजाति

मिली थी। इस मछुआरे से लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्युजियम में कार्यरत वेइगमान के

सहयोगी रहे रूथ लीनी से संपर्क साधा था। मछुआरा ने ही दो इसी प्रजाति के सार्क

पकड़ने की जानकारी दी थी। तब से छह गलफड़ों वाली इस प्रजाति के बारे में अधिक

जानकारी हासिल करने का काम चल रहा था। बाद में जांजीवार के पास भी ऐसा ही

सार्क पकड़ा गया था। इस प्रजाति के पास भी कैटफिश की तरह अपने भोजन तलाशने

के लिए अलग से अंग हैं। लेकिन भोजन तलाशने वाले ये अंग उनकी मुंह के दूर हैं। अब

समुद्र में उनके होने के बाद वैज्ञानिक इस सार्क की नई प्रजाति के जीवित अवस्था में

और तथ्य जुटाने का काम कर रहे हैं। आम तौर पर कम गहराई वाले इलाकों में रहने

वाले इस प्रजाति की मछलियां अक्सर ही मछुआरों के जाल में भी फंसकर मारी जा रही

है। लेकिन समुद्र वैज्ञानिक इस प्रजाति के जीवित अवस्था में होने के बारे में और

अधिक तथ्य जुटाना चाहते हैं। इसका असली मकसद सार्क सहित अन्य समुद्री जीवों

में जीवन के क्रमिक विकास की कड़ी को समझना है। इससे स्पष्ट हो पायेगा कि

आखिर किन परिस्थितियों में समुद्री जीवन भी धीरे धीरे बदलता चला गया है। वैसे

समुद्र की गहराइयों से लगातार नये नये तथ्य प्रकाश में आ रहे हैं। इस वजह से भी

शोधकर्ता यह मान रहे हैं कि अभी भी समुद्र के रहस्यों को पूरी तरह जाने बिना सारी

गुत्थियों को सुलझाना संभव नहीं है।


 

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