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रोशनी की पहचान करने वाले प्रोटिन को प्रयोगशाला में तैयार किया गया

  • अंधेपन को दूर करने में सक्षम होगी यह विधि

  • अंधे चूहे पर किया गया प्रयोग सफल रहा है

  • रेटिना और दिमाग के संपर्क को जोड़ता है

  • किसी अतिरिक्त इंतजाम की जरूरत नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः रोशनी की पहचान खुद करने में सक्षम प्रोटिन अब विकसित किये गये हैं। इनकी

मदद से अंधेपन को दूर करने की दिशा में बहुत कुछ बदल जाने की उम्मीद है। दरअसल

इस प्रोटिन को प्रयोगशाला में विकसित करने के बाद उनका प्रयोग चूहों पर किया गया है

और यह प्रयोग सफल रहा है। दृष्टि क्षमता गवां चुके चूहों को इस प्रोटिन की मदद से

देखने की मदद मिली है।

यह जो नया प्रोटिन विकसित किया गया है उसे एमसीओ1 ऑपसिन कहा गया है। रिसर्च

के दौरान यह अंधे चूहो को देखने की क्षमता दे पाया है। दरअसल जब इस प्रोटिन को चूहे

के रेटिना के बाई पोलर कोषों से जोड़ा गया तो अंधे चूहा को देखने की यह ताकत मिली।

इस काम को करने के लिए वैज्ञानिकों ने जीन थैरापी की मदद ली थी। इसी के जरिए यह

प्रोटिन अंधे चूहे के रेटिन के कोष से जोड़ा गया था।

अमेरिका में यह प्रयोग सफल होने के बाद शीघ्र ही इसका क्लीनिकल ट्रायल भी प्रारंभ

किया जाने वाला है। वहां की राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था से जुड़ी नेशनल आई इंस्टिट्यूट ने

नैनोस्कोप नामक कंपनी को यह प्रोटिन बनाने की इजाजत दी है।

रोशनी की पहचान करने वाली प्रोटिन से भारतवंशी जुड़े हैं

नैनोस्कोप नाम की कंपनी ने इस बारे में अपने अनुसंधान के संबंध में विस्तृत जानकारी

दी है। इसमें बताया गया है कि पूरी तरह अंधा हो चुके चूहे की आंख की हालत कुछ ऐसी थी

कि उसकी रेटिना में कोई सक्रियता नहीं थी। देखने की क्षमता खो चुके इस चूहे को जब

इस प्रोटिन के संपर्क में जोड़ा गया तो उसके देखने की शक्ति लौटी। उनकी रेटिना भी फिर

से सक्रिय हो गयी। इसी शोध से वैज्ञानिक अंधत्व दूर करने की दिशा में नया कुछ कर पाने

को लेकर काफी उत्साहित हुए हैं। चूहों पर हुए प्रयोग के बाद ऐसा माना जा रहा है कि

इंसानों पर भी इसका एक जैसा ही असर होगा। जिस अंधे चूहे को यह प्रोटिन दिया गया

था, वह प्रोटिन के सक्रिय होने के बाद अपने आंख के सामने की गतिविधियों तथा

उपस्थित वस्तुओँ और घटनाक्रमों को देखने समझने के लायक हो गया था। वह इसकी

मदद से खेत के अंदर भी सही तरीके से दौड़ पा रहा था।

ऑपसिन नामक इस प्रोटिन के बारे में शोधकर्ता बताते हैं कि यह शरीर के अन्य कोषों तक

विभिन्न किस्म के संकेत भेजने की क्षमता रखता है। खास तौर पर सक्रिय आंख की

गतिविधियों में जिस किस्म की आतंरिक गतिविधियों की आवश्यकता होती है, वह इन

सभी से जुड़ता है और उन्हें सक्रिय बनाता है। रोशनी के संपर्क में आते ही यह प्रोटिन

रेटिना के अंदर बने न्यूरॉनों को भी संकेत देता है। इससे आंख के ऑप्टिक नस को

सक्रियता मिलती है और यह संकेत वहां से होता हुआ दिमाग तक पहुंचता है। इसी वजह

से दिमाग देखने की क्षमता के अनुरुप काम करने और अन्य संकेत जारी भी करने लगता

है।

आंख की कई बीमारियों को हम अच्छी तरह जानते हैं

वर्तमान में आंख से संबंधित कई किस्म की बीमारियां हमारी जानकारी में है। इनमें उम्र

जनित मैक्यूलर डिजेनरेशन यानी उम्र की वजह से होने वाला क्षय भी शामिल है। इसके

अलावा अलग अलग कारणों से रेटिना को क्षति पहुंचती है। इससे देखने की शक्ति चली

जाती है। आंख की संरचना में फोटो रिसेप्टर की जो भूमिका होती है, वह इससे भले ही पूरी

तरह काम नहीं करे लेकिन रेटिन के अन्य सुक्ष्म कोष इस प्रोटिन की मदद से सक्रिय होते

हैं। खास तौर पर देखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बॉईपोलर कोष इससे सुरक्षित

हो जाते हैं। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने फोटो रिसेप्टर के क्षतिग्रस्त होने के बाद भी

ऑप्टिक बाई पोलर सेल्स की मदद से इस कमी को दूर करने का काम किया है।

नैनो स्कोप के संस्थापक और भारत वंशी वैज्ञानिक डॉ समरेंद्र मोहंती ने इस बारे में कहा

कि प्रोटिन की सक्रियता ही आंख की रेटिना को देखने की शक्ति प्रदान करती है। इसलिए

ऐसा माना जा सकता है कि रेटिना की गड़बड़ी की वजह से जिन लोगों के देखने की शक्ति

चली गयी हो, उन्हें नये सिरे से देखने की शक्ति प्रदान की जा सकती है। इसके पहले भी

देखने की क्षमता विकसित करने वाली बॉयोनिक आंखों का आविष्कार हो चुका है लेकिन

उसके लिए बड़ी सर्जरी की जरूरत होती है तथा इस आंख से देखने की क्षमता के लिए

अन्य उपकरण भी साथ लेकर चलना पड़ता है। नया प्रोटिन तकनीक आंखों के अंदर की

रेटिना को सक्रिय बनाते हुए उसके और दिमाग के बीच के संपर्क को कायम कर देता है।

जीन थैरापी पर काम करती है यह विधि

इस विधि में सिर्फ एक बार इंजेक्शन देने की जरूरत होती है और इंजेक्शन देने के बाद

किसी अन्य उपकरण की आवश्यकता भी नहीं होती। इस जीन थैरापी की विशेषता यह है

कि इसके बाद आंखों को तेज रोशनी से बचाने जैसे उपाय भी नहीं करने पड़ते हैं। उम्मीद है

कि 20/60 विजन वाले मरीजों को भी इस विधि से मदद मिलने वाली है। शोध से जुड़े दूसरे

भारतवंशी वैज्ञानिक डॉ सुब्रत बटव्याल ने कहा कि फिलहाल तो यह रेटिना की बीमारी से

जूझ रहे मरीजों पर ही आजमाया जाएगा

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