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ब्रिटेन में कोविड 19 की रोकथाम के लिए नई पद्धति पर विचार जारी

  • असली वायरस तैयार कर जांच की तैयारी

  •  अब तक ऐसा पहले कभी नहीं हुआ

  •  कई लोग इस प्रयोग के पक्ष में भी

  •  समय और पैसे दोनों की बचत होगी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः ब्रिटेन में कोविड 19 के असली वायरस प्रयोगशाला में तैयार करने तथा उसे

स्वयंसेवकों को देने की तैयारियां जोरों पर हैं। आम तौर पर इससे पहले कभी भी असली

वायरस को प्रयोगशाला में तैयार करने के बाद इंसानों पर उसका परीक्षण नहीं किया गया

है। लेकिन कोरोना की चुनौती से निपटने के लिए ब्रिटेन के विशेषज्ञ इस तरीके को

आजमाना चाहते हैं। इसलिए लिए सरकार से आवश्यक अनुमति हासिल करने की

तैयारियां प्रारंभ हो चुकी हैं। इस क्रम में एक ब्रिटिश कंपनी को वायरस तैयार करने की

अनुमति भी दी गयी है। दवा कंपनी ओपन ऑरफन की शाखा एचविवो में यह काम किया

जाने वाला है। इसके तहत वायरस के प्रभाव को प्रयोगशाला में वास्तव में तैयार किया

जाना है। वायरस तैयार होने के बाद उसे इंजेक्शन के जरिए स्वयंसेवकों को दिया जाएगा।

उसके बाद वायरस का प्रभाव और उसकी रोकथाम के तौर तरीकों पर आगे के अनुसंधान

होंगे ताकि इस वायरस को रोकने का कोई कारगर तरीका विकसित किया जा सके।ब्रिटेन

में कंपनी ने औपचारिक तौर पर इसकी पूरी प्रक्रिया की जानकारी दे दी है। दरअसल कंपनी

के इस खतरनाक प्रयास को अब समर्थन भी मिला है। कोरोना वैक्सिन के परीक्षण में

लगने वाले समय और उसमें हजारों स्वयंसेवकों पर लगातार चिकित्सीय जांच करने के

समय को कम करने एवं खर्च भी कम करने के लिहाज से इस रास्ते का भी अनेक लोग

समर्थन कर रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि कम संख्या में स्वयंसेवकों पर जब इसका

परीक्षण किया जाएगा तो सभी की चिकित्सीय देखभाल अपेक्षाकृत आसान होगी।

ब्रिटेन में इस पद्धति का समर्थन और विरोध दोनों है

साथ ही इसमें खर्च भी कम आयेगी। सीधे इंसानों पर असली वायरस देने के बाद उसके

असर तथा उसकी काट तैयार करने का काम कम समय में किया जा सकता है। लोग यह

भी चाहते हैं कि इस कोरोना वायरस से बचाव का कोई एक रास्ता निकले ताकि सारी

दुनिया फिर से पटरी पर लौट सके। लेकिन इस तरीके से दवा खोजने के विरोधी भी हैं। ऐसे

लोग मानते हैं कि इस किस्म के किसी को जानबूझकर वायरस का इंजेक्शन देना

चिकित्सा शास्त्र की नैतिकता के खिलाफ है। लंदन के इंपीरियल कॉलेज भी इस प्रयास के

समर्थन में है। इस परीक्षण के लिए लंदन के ही रॉयल फ्री अस्पताल को तैयार किया जा

रहा है। इसी अस्पताल में वायरस का इंजेक्शन लेने वाले स्वयंसेवकों को रखा जाएगा और

उनकी निरंतर चिकित्सीय निगरानी की जाएगी। ब्रिटेन में इन तैयारियों के बीच फाइजर

कंपनी ने अपनी तरफ से अगले माह से अपनी उस वैक्सिन के प्रयोग की अनुमति मांगी

है, जो अभी परीक्षण के दौर में है। कंपनी का दावा है कि इस महीने के अंत तक अपने

क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों का बड़ा हिस्सा उसके पास मौजूद होगा। यह उनके वैक्सिन

के तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल का परिणाम होगा।

इस जांच से वैक्सिन के असर का पता भी चल जाएगा

इस दौरान यह साबित भी हो जाएगा कि वाकई यह वैक्सिन कोरोना के मरीजों पर असर

डालती है अथवा नहीं। साथ ही इस वैक्सिन का कोई साइड एफेक्ट तो नहीं है, उसकी भी

पुष्टि हो जाएगी। कंपनी के सीईओ अलबर्ट बोउरला ने इस बारे में एक खुली चिट्ठी लिखी

है। जिसमें अमेरिकी अधिकारियो से यह अनुमति प्रदान करने की गुजारिश की गयी है कि

गंभीर किस्म के मरीजों पर इस वैक्सिन का इस्तेमाल करने की अनुमति प्रदान की जाए।

वैसे भी नवंबर के तीसरे सप्ताह तक इस तीसरे चरण का क्लीनिकल ट्रायल भी पूरा हो

जाएगा। उनके मुताबिक इस माह के अंत तक ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस वैक्सिन की

कार्यक्षमता क्या है अथवा इसके इस्तेमाल के साइड एफेक्ट्स क्या हैं। लेकिन अमेरिकी

प्रशासन इसकी इजाजत देगा अथवा नहीं, यह अब तक तय नहीं है। खास कर दवा और

वर्तमान परिस्थिति में कोरोना की दवा के मामले में अमेरिकी फुड एंड ड्रग एडमिंस्ट्रेशन

हर बात की बारिकी से जांच कर रहा है। यहां तक की ऐसी अनुमति के लिए बाहर के

विशेषज्ञ भी शामिल किये गये हैं। लेकिन यह तय है कि अगर कंपनी की वैक्सिन कारगर

साबित होती है तो इस साल के अंत तक पूरे अमेरिका में यह वैक्सिन उपलब्ध करा दिया

जाएगा। दुनिया में भी इसके साथ ही व्यापक उत्पादन की तैयारियां पहले से ही कर ली

गयी हैं ताकि हर इलाके तक कम सम में यह वैक्सिन पहुंचायी जा सके।

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