मधुमक्खियों की पीठ पर उड़ेगा नई प्रजाति का ड्रोन

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  • नये प्रयोग के शोध से जुड़े हैं कई भारतवंशी वैज्ञानिक भी

  • भारी बैटरियां नहीं तो वजन हल्का

  • लगाता सात घंटे तक उड़ेगा

  • खेती और मौसम में होगा इस्तेमाल

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः मधुमक्खियों का इस्तेमाल वैज्ञानिक काम में पहले भी होता रहा है।

इस बार मधुमक्खियों को ड्रोन ढोने की विधि पर भी सफलता हासिल कर ली गई है।

इस विधि के ड्रोन आकार में बहुत छोटे और वजन में बहुत हल्के हैं।

प्रयोगशाला में विकसित इस ड्रोन का आकार चावल के एक दाने के बराबर है।

इसका वजन भी बहुत कम सिर्फ 102 मिलीग्राम है।

आमतौर पर एक खास प्रजाति की मधुमक्खियां इस भजन को अपनी पीठ पर लेकर लगातार उड़ सकती हैं।

यह पहले से ही प्रमाणित हैं कि मधुमक्खी अपनी वजन के बराबर का वजन लेकर आसानी से उड़ सकती है।

वैज्ञानिकों ने इसी शक्ति का लाभ उठाया है।

ड्रोन के निर्माण में उसका वजन सबसे बड़ी बाधा है।

ड्रोन का आकार और उसकी उड़ने की क्षमता उसमें लगने वाले बैटरी ऊपर निर्भर है।

अधिक आकार और अधिक समय तक उड़ने में सक्षम ड्रोन के लिए बड़े आकार की बैटरियों की जरूरत पड़ती है जो उसे भारी बना देता है।

वैज्ञानिकों ने इस नई प्रजाति के हल्के ड्रोन में बैटरी की वह समस्या ही समाप्त कर दी है।

मधुमक्खियों ने ड्रोन की बैटरी की समस्या ही हल कर दी

इस चावल नुमा ड्रोन में एक बहुत ही छोटी बैटरी है जो उसे सिर्फ 7 घंटे तक लगातार संकेत भेजने में मदद पहुंचाती है।

क्योंकि इस संयंत्र को उड़ने के लिए कोई ऊर्जा खर्च नहीं करना पड़ता इसलिए उसका वजन हल्का भी कर लिया गया है।

अमेरिका के वाशिंगटन विश्वविद्यालय के 102 दल ने इस काम को कर दिखाया है

और उपयोग में यह ड्रोन लगातार 7 घंटे तक काम करने में कामयाब हुआ है।

वैज्ञानिकों के इस दल में विक्रम अय्यर, राजालक्ष्मी, नंद कुमार, अनुराग वंशावल एसली फूलर के अलावा श्यामनाथ बोलाकोटा शामिल थे।

इन लोगों ने मिलकर एक छोटा सा संयंत्र बनाया है जिसमें सेंसर वायरलेस संप्रेषण और लोकेशन ट्रैकर

जैसे उपकरण लगाए गए हैं।

इन उपकरणों की मदद से संयंत्र के उड़ने उसके स्थान और गतिविधियों का निरंतर पता वैज्ञानिकों को चलता रहता है।

किसी मधुमक्खी की पीठ पर सवार इस संयंत्र की वजह से मधुमक्खी जिन इलाकों से गुजरती है

उन इलाकों की सारी गतिविधियां संचालन उपकरण तक पहुंचती रहती है।

क्योंकि इस संयंत्र में उड़ने के लिए कोई ऊर्जा खर्च नहीं होती,

इसलिए उस काम की बैटरी को भी इससे अलग किया गया है

और यह संयंत्र मधुमक्खी के उड़ने की उर्जा से ही खुद को संचालित कर लेता है।

प्रयोग में प्रारंभिक तौर पर सफल होने के बाद वैज्ञानिक दल इस किस्म के अति सूक्ष्म ड्रोन का इस्तेमाल

कृषि और अन्य पर्यावरण संबंधी जांच में करना चाहता है।

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