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दुनिया पर नये किस्म का संकट मंडराता नजर आया

  • पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण तेजी से कम होता जा रहा है

  • यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने ध्यान दिलाया इस तरफ

  • अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के बीच है इलाका

  • ढाई लाख साल के अंतराल में ऐसा होता रहता है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः दुनिया पर नये किस्म का संकट गहराता जा रहा है। कई अन्य किस्म की

गड़बड़ियों की तरफ ध्यान जाने के बीच अब पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के तेजी से कम होने

की जानकारी सामने आयी है।

खगोल वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि एक सीमा से अधिक होने की स्थिति में यह परेशानी

अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित सैटेलाइटों के साथ साथ तमाम अंतरिक्ष यानों के लिए भी

बहुत बड़ी परेशानी खड़ी कर सकती है।

शोध के तहत इस गड़बड़ी को अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के बीच दर्ज किया जा रहा है।

साउथ अटलांटिक के इलाके के तौर पर परिचित इस क्षेत्र में ऐसा क्यों हो रहा है, इस बारे में

वैज्ञानिक और शोध कर रहे हैं। लेकिन अब तक इसके कारणों का कोई पता नहीं चल पाया

है।

यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने अपने आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर सबसे पहले इसकी तरफ

दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया था। जब इस पर शोध हुआ तो पता चला कि वर्ष 1970 से

अब तक इसमें आठ प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी है।

शायद हाल के दिनों में इस गुरुत्वाकर्षण के कम होने की गति तेज होने की वजह से

वैज्ञानिकों का ध्यान इसकी तरफ गया है।

जर्मनी के जिओसाइंस रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक जूरगेन माटजा ने इस बारे में बताया कि

कई दशकों से इस स्थिति के घटित होने की पुष्टि अब हो रही है। इसके कारणों की तलाश

के लिए सैटेलाइटों को भी काम पर लगाया गया है।

ताकि अंतरिक्ष से खास तौर पर इस साउथ अटलांटिक की गतिविधियों को बेहतर तरीके से

और ऊपर से देखा जा सके। इससे गुरुत्वाकर्षण के कम होने के बारे में कुछ अतिरिक्त

जानकारी मिल सकती है।

दुनिया पर नये संकट पर चिंता अन्य घटनाक्रमों से भी

इस पर इसलिए भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि हाल ही में पृथ्वी के आंतरिक

सतह में भी तेजी से बदलाव होने की घटनाएं दर्ज की गयी हैं।

सैटेलाइट एजेंसी का अपना निष्कर्ष है कि शायद पृथ्वी के दोनों ध्रुवों के जगह बदलने की

वजह से ऐसा हो रहा है। यह तो पहले ही पता चल गया है कि पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव अब

ग्रीनलैंड के ऊपर से खिसकता हुआ रुस के साइबेरिया की तरफ जा रहा है।

वैसे वैज्ञानिक इतिहास बताते हैं कि सात लाख अस्सी हजार साल पहले भी पृथ्वी पर ऐसा

ही दौर आया था।

इसलिए अगर ऐसा हो रहा है तो यह कोई नई बात नहीं है। आम तौर पर हर ढाई लाख वर्ष

के अंतराल में पृथ्वी पर किसी न किसी किस्म का बदलाव आता ही रहता है। समझा जाता

है कि इसी गुरुत्वाकर्षण की वजह से पृथ्वी का सौर तूफान और कॉस्मिक रेडियेशन से

बचाव होता है।

आशंका इस बात की भी है कि इसके अधिक प्रभावशाली होने से यह सारा बचाव आवरण

खत्म हो सकता है। नतीजतन दुनिया भर की मोबाइल सेवा भी बाधित हो सकती है।

अनेक सैटेलाइटों से लगातार रखी जा रही है नजर

तमाम आधुनिक संचार सुविधाओं पर इसके प्रभाव की वजह से बाधा उत्पन्न हो सकती

है। इस बारे में वैज्ञानिक शोध पत्रिका में विस्तार से जानकारी प्रकाशित की गयी है।

इसमें बताया गया है कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र संभवतः वापस नहीं जा रहा है बल्कि

यह दिशा बदलने की वजह से ऐसा कमजोर होता हुआ नजर आने लगा है।

लेकिन इस कमी से आधुनिक विज्ञान पर काफी कुछ प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसकी

खास वजह से यह भी है कि वर्तमान वैज्ञानिक संयंत्रों के निर्माण के दौरान इस परिस्थिति

का आकलन भी नहीं किया गया था।

इएसए ने अपने स्वार्म सैटेलाइटों के समूह के माध्यम से इस पर पूरी जानकारी और नये

तथ्य एकत्रित करने का काम जारी रखा है।

वैसे कोरोना संकट के बीच अनेक किस्म की अजीबोगरीब घटनाओं से लोगों का ध्यान पूरी

पृथ्वी पर हो रहे तमाम किस्म के बदलावों पर निरंतर लगा हुआ है।


 

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