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बालू के साथ बैक्टेरिया मिलाकर तैयार हुआ नया बिल्डिंग मैटेरियल

  • अब आ रहा है जीवंत सीमेंट की कारीगरी का जमाना

  • बैक्टेरिया के साथ बना पदार्थ तकनीक को ही बदल देगा

  • एक ईंट से दूसरी ईंट का निर्माण खुद बैक्टेरिया करेगा

  • इन्हें बनाये रखने के लिए सिर्फ नमी का होना जरूरी

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बालू के साथ जीवन की मिलावट इस आधुनिक विज्ञान की

वजह से संभव हो पाया है। इसी अनुसंधान के तहत अब जीवंत प्रजाति

का सीमेंट भी सामने आने जा रहा है। अगर इसे आम भाषा में समझे

तो अब सीमेंट के इसे नये स्वरुप का इस्तेमाल होने की स्थिति में जो

ढांचा तैयार होगा वह अंदर से पूरी तरह जीवंत ही रहेगा। यानी अगर

इससे कोई घर बनाया भी जाता है तो उस घर का पूरा ढांचा ही जीवित

होगा। इस नई विधि के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है।

कोलाराडो के वैज्ञानिकों ने यह कमाल कर दिखाया है। भवन निर्माण

के क्षेत्र में इस तकनीक को सफलता के साथ आजमाया जा चुका है।

इसे सफल बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने सामान्य बालू के भीतर जीवंत

बैक्टेरिया को मिलाया है। इन दोनों के मिश्रण से यह जीवित सीमेंट

तैयार कर पाना संभव हुआ है। शोध से जुड़े लोग बताते हैं कि जो

मिश्रण तैयार हुआ है, उसके अंदर मौजूद सुक्ष्म जीवन जीवित

अवस्था में ही है। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि जो पक्का ढांचा

तैयार होगा वह भी अंदर से जीवंत ही होगा क्योंकि इस ढांचे की

संरचना में जीवंत बैक्टेरिया भी शामिल होंगे। अच्छी स्थिति यह है कि

बालू के साथ मिले बैक्टेरिया जीवित रहते हुए भी वजन उठाने में पूरी

तरह सक्षम है। इसी वजह से इस मिश्रण की मदद से दीवार का

निर्माण भी संभव है। इसमें मौजूद बैक्टेरिया सीमेंट के जैसा ठोस

आचरण करने के साथ साथ अपने जीवन को भी जारी रखेंगे। इसलिए

भी इसकी मदद से बना कोई भी ढांचा दरअसल पूरी तरह एक जीवंत

ढांचा ही होगा।

बालू का सर्वाधिक प्रयोग आधारभूत ढांचा बनाने में

इस परीक्षण को सफल बनाने के लिए वैज्ञानिकों को कई चरणों से

गुजरना पड़ा है। सबसे पहले बालू के साथ हाइड्रोजन को मिलाकर वह

परिस्थिति पैदा की गयी, जिसमें बैक्टेरिया जीवित रह सके और खुद

की वंशवृद्धि भी कर सकें। इनके अंदर जीवन के वह तमाम गुण

यथावत बने रहते हैं। इसकी बदौलत वैज्ञानिकों ने जो पदार्थ तैयार

किया वह सीमेंट की तरह मजबूत और वजन उठाने लायक होने के

बाद भी अंदर से पूरी तरह जीवित होता है। इस शोध से जुड़े वरिष्ठ

वैज्ञानिक विल श्रुबर ने कहा कि यह दरअसल प्रकृति के काफी करीब

का एक प्रयोग है। सामान्य तौर पर लोग इसे फ्रैंकेस्टाइन जैसी रचना

भी मान सकते हैं। लेकिन यह दरअसल पर्यावरण के अनुकूल है। इसे

बनान के लिए फोटोसिंथेटिक साइनोबैक्टेरिया का इस्तेमाल किया

गया है। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि यह सीमेंट जैसा पदार्थ

सिर्फ ठोस और मजबूत ही नहीं है बल्कि यह अपनी वंशवृद्धि भी करता

जाता है। इसे दूसरी तरह से भी समझा जा सकता है कि अगर इस

पदार्थ से बने एक ईंट को दो हिस्सों में तोड़ दिया जाए तो दोनों हिस्से

अपने आप ही खुद को एक पूरी ईंट में तब्दील कर सकते हैं। लेकिन

इस काम को पूरा करने के लिए ईंट के अंदर मौजूद बैक्टेरिया को

अतिरिक्त बालू, हाइड्रोजन और न्यूट्रियंट्स की जरूरत भी पड़ेगी।

परीक्षण के दौरान एक ईंट से क्रमवार तरीके से आठ ईंट बनाने तक

की विधि सफल साबित हो चुकी है। इस प्रक्रिया के और अधिक

विकसित होने की स्थिति में बार बार ईंट बनाने के काम से भी हमें

छुटकारा मिल सकता है। एक ईंट से आठ ईंट तैयार करने में उसमें

मौजूद बैक्टेरिया के तीन प्रजन्मों का योगदान होता है।

एक ईंट से अपने आप तैयार होंगे आठ ईंट

वैज्ञानिक इस उपलब्धि से इसलिए भी प्रसन्न हैं क्योंकि इस विधि के

और विकसित होने पर किसी भी निर्माण के लिए अतिरिक्त वस्तुओं

की जरूरतें भी सीमित हो जाएंगी। एक ही उपादान अपने अंदर ही नये

उपादानों को तैयार करता जाएगा। इससे निर्माण कार्यों की पूरी

तकनीक ही बदल जाएगी। हम सभी जानते हैं कि दुनिया में पानी के

बाद अगर किसी चीज की सबसे अधिक खपत होती है तो वह है

सीमेंट। हर किस्म के निर्माण के लिए इसकी आवश्यकता होती है। इस

सीमेंट को बनाने और किसी ढांचे को मजबूत रखने के लिए जो

रासायनिक प्रक्रिया है, उसे यह नई प्रजाति की ईंट अपने अंदर ही

पूरा कर सकती है। इसके अलावा सीमेंट निर्माण और उसके इस्तेमाल

से जो कार्बन डॉईऑक्साइड पैदा होता है, नई प्रजाति की ईंट में उससे

भी छुटकारा मिल जाता है। यानी यह ईंट पर्यावरण के लिहाज से भी

काफी बेहतर है। इस परीक्षण में यह पाया गया है कि सामान्य ईंट और

सीमेंट पूरी तरह सूख जाने के बाद मजबूती प्रदान करते हैं लेकिन इस

नई प्रजाति की ईंट को सक्रिय और जीवंत बनाये रखने के लिए नमी

की जरूरत पड़ती है। इस नमी की कमी से उसकी गुणवत्ता पर

प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

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