सौर ऊर्जा की सस्ती नई तकनीक का विकास हुआ

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  • लोहे की आणविक संरचना में किया बदलाव

  • लोहा अन्य प्रचलित धातुओं से सस्ता

  • सोलर बैटरी हो जाएगी बहुत सस्ती

  • ऊर्जा उत्पादन का पूरा नक्शा ही बदलेगा

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सौर ऊर्जा आज भी पसंद होने के बाद भी आम आदमी की पहुंच से दूर है।

पारंपरिक बिजली से काफी महंगा होने की वजह से लोग घरों में अपनी खर्च से इसे लगाने से बचते है।

भारत में भी सौर ऊर्जा ग्रामीण इलाकों में लोकप्रिय तो है लेकिन उसके पीछे सरकारी अनुदान का बड़ा हाथ है।

सामान्य तौर पर सौर ऊर्जा उपकरण इसलिए भी महंगे होते हैं

क्योंकि उनकी सोलर बैटरी बनाने की तकनीक काफी महंगी है।

सिर्फ अत्यधिक व्यावसायिक उत्पादनों से ही इसे कम किया जाता है।

इसके बाद भी वह आम आदमी की बजट में नहीं आता।

अब वैज्ञानिकों ने इसकी काट खोज ली है।

सौर ऊर्जा के संयंत्र भी अब सस्ते होंगे

एक नई तकनीक का विकास किया गया है, जो सस्ती सौर ऊर्जा देने में सक्षम होगी।

एक नये किस्म के अणु का विकास किया गया है जो न सिर्फ ईंधन पैदा करेगी

बल्कि सौर बैटरी से बिजली बनाने में भी कारगर साबित होगी।

इन दोनों भूमिकाओं को एक साथ निभाने की वजह से इसकी कार्यकुशलता भी आम सोलर बैटरी से कई गुणी अधिक हो जाएगी।

इसके सस्ता होने का राज यह है कि यह लौह आधारित अणु है।

लोहा पूरी दुनिया मे प्रचुर मात्रा में और सस्ते दर पर उपलब्ध है।

इसलिए इस नये अणु के आधार पर सौर ऊर्जा पैदा करने वाली सेल को तैयार करना भी आसान और सस्ता होगा।

वैज्ञानिकों की इस खोज के बाद ऐसा तय माना जा रहा है कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करने वाली

कंपनियों के साथ साथ पारंपरिक बिजली उत्पादन के संयंत्रों को भी बाजार में टिके रहने के लिए

अपने आप को सुधारना पड़ेगा और सस्ती बिजली की तकनीक के साथ साथ अपनी कीमत काफी कम करनी पड़ेगी।

इसके बाद भी शायद आने वाले कुछ वर्षों में यह नये अणु पर आधारित सौर ऊर्जा पूरी दुनिया के बाजार के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लेगी।

सौर ऊर्जा की इस तकनीक को आने में अभी कुछ वर्ष लगेंगे

लेकिन इस विधि को व्यापारिक तौर पर विकसित करने में अभी कुछ वर्ष और लगेंगे,

ऐसा वैज्ञानिकों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है।

दुनिया भर के वैज्ञानिक कई दशकों से अलग अलग धातुओं की फोटो संश्लेषण की विधियों पर काम करते आ रहे थे।

वैज्ञानिकों का ध्यान खास तौर पर कम पायी जाने वाले धातुओं मसलन इरिडियम और रूथेनियम पर अधिक था।

इसी कठिन प्रयोग के विकल्प के तौर पर शोध करते हुए लोहा आधारित

इस अणु संयंत्र को तैयार करने में वैज्ञानिकों को कामयाबी मिली है।

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक सिर्फ लौह अणु की संरचना को बेहतर बनाकर

इससे अपेक्षित कार्य लिया जा सका है।

इस विधि से सौर ऊर्जा उत्पादन के सफल होने के बाद अब वैज्ञानिक लौह आधारित अन्य उद्योगों और कार्यों में भी सुधार की गुंजाइश तलाश रहे हैं।

इसमें भी सिर्फ लौह कण की संरचना में आणविक बदलाव भर करना है।

हो सकता है कि व्यापक प्रयोग से इस बदलाव के कई नये आयामों का भी पता चल पायेगा।

वैसे वैज्ञानिक इस बात से खुश है कि कमसे कम इस विधि से उन दुर्लभ धातुओं पर निर्भरता कम होगी,

जो किसी भी उत्पाद की कीमत को सिर्फ इसलिए बढ़ा देते हैं क्योंकि वे आसानी से नहीं मिलते।

अब लोहा से यह काम होने की वजह से उन बेशकीमती धातुओं पर निर्भरता कम हो जाएगी।

शोध से जुड़े स्वीडन के विश्वविद्यालय के प्रोफसर केनेथ वार्नमार्क का कहना है कि

पृथ्वी में वर्तमान में तथा गहराई में भी लोहा प्रचुर मात्रा में मौजूद है।

इसलिए कच्चे माल की उपलब्धता बनी रहेगी।

इससे हर काम की लागत कम होगी और वेशकीमती धातुओं से इनके निर्माण पर होने वाले खर्च को भी समाप्त किया सकेगा।

सौर ऊर्जा से ही चीन बना रहा है  नकली सूरज

लोग यह मान रहे हैं कि जिस तरीके से चीन अब नकली सूर्य बनाकर सौर ऊर्जा की मदद से अपनी पारंपरिक ऊर्जा के खर्च को कम करना चाहता है।

ठीक उसी तरह इस किस्म की सस्ती सौर ऊर्जा बैटरी के बाजार में आने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संबंधी संरचना ही बदल जाएगी।

जिसका अंततः लाभ आम आदमी को मिलेगा क्योंकि सौर ऊर्जा के अधिकाधिक उपयोग के लिहाज से उनकी कीमतें भी बहुत कम हो जाएंगी।

दूसरी तरफ ऊर्जा उत्पादन में ताप विद्युत केंद्रों की निर्भरता कम होने से प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी आयेगी।

क्योंकि सूर्य की रोशनी प्रचुर मात्रा में पूरी दुनिया में उपलब्ध है।

इससे ऊर्जा उत्पादन की लागत हमेशा ही कम होती है क्योंकि उसमें लगने वाला ईंधन यानी सूर्य की रोशनी हर किसी को मुफ्त में मिलती है।

अब संयंत्र की लागत कम होते ही लोग इसकी तरफ तुरंत आकर्षित होंगे।

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