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कभी खुद भी पैदल चलकर देखिये माई लार्ड,मर्जी और मजबूरी का फर्क समझ में आ जाता

कभी खुद पैदल चलना पड़ता वह भी इस हालत में तो शायद न्याय की कुर्सी को मर्जी और

मजबूरी का फर्क समझ में आ जाता। अभी देश भर में लाखों की संख्या में पैदल चलते

मजदूरों के बारे में उच्चतम न्यायालय का यह फैसला मन को व्यथित करने वाला रहा।

आखिर अदालत इतनी संवेदनहीन कैसे हो सकती है। दरअसल उच्चतम न्यायालय ने

पैदल जा रहे मजदूरों के प्रति अदालत ने कोई आदेश देने से इंकार कर दिया। यह अच्छी

बात है कि अब राज्य सरकारों ने अपने इलाके में इन मजदूरों का राहत देने और घर तक

पहुंचाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने का इंतजाम करना प्रारंभ कर दिया है। इसमें भी

अपना झारखंड सबसे अब्बल है। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति संजय किशन

कौल और न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की पीठ ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये की गयी

सुनवाई के दौरान वकील अखल आलोक श्रीवास्तव की याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति राव ने कहा, ‘‘जब लोग बात नहीं मान रहे और वे पैदल ही निकल जा रहे हैं तो

उन्हें कैसे रोका जा सकता है?’’ उन्होंने कहा, ‘‘वे (प्रवासी मजदूर) रेल की पटरियों पर सो

जाएं, तो कोई कैसे रोक सकता है।’’

अदालत का फैसला और टिप्पणी संवेदनाओं से परे

इस आदेश को जारी करते वक्त अगर अदालत ने रेल पटरी पर सोए मजदूरों की मजबूरी

का ख्याल किया होता तो शायद ऐसा दुखद फैसला नही आता। याद रहे कि औरंगाबाद में

रेल की पटरी पर मजदूरों को इसलिए नींद आ गयी थी क्योंकि वे लगातार पैदल चलते

चलते थकपर बैठ गये थे। थकान इतनी अधिक थी कि इसी हालत में उन्हें नींद आ गयी।

इसलिए खुद भी लंबी दूरी तक पैदल चले होते तो माई लार्ड को इस कष्ट का एहसास होता।

यह अनुभव होता तो वे जिस अपनी मर्जी मान बैठे, उसकी मजबूरी उन्हें समझ में आ

जाती। जो लोग सड़कों पर सपरिवार चल रहे हैं वे किसी पर्यटन अथवा धार्मिक यात्रा पर

नहीं निकले हैं। खाली जेब और खाली पेट ऐसा सफर कितना कष्टकर होता है, इसे अनुभव

करना लेना चाहिए। फैसला सुनाने वाले जजों को आत्मविश्लेषण के तहत ही सही कमसे

कम तीस किलोमीटर पैदल चलना चाहिए। फिर उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ में आ

जाएगी कि मरजी से भी पैदल चलने की मजबूरी कैसी रही होगी। अदालत की सुनवाई में

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेल की पटरियों में सोए प्रवासी मजदूरों की कटकर हुई मौत का

जिक्र करने के साथ-साथ मध्य प्रदेश के गुना और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में सड़क

हादसों में प्रवासी मजदूरों की मौत का भी मामला उठाया। अब अगर बात करें तो उसमें

औरैया में वाहन दुर्घटना में मारे गये 24 मजदूरों को भी हम जोड़ सकते हैं। न्यायमूर्ति

कौल ने कहा, ‘‘आपकी जानकारी केवल समाचार पत्रों की खबरों पर आधारित है। आप यह

कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि हम कोई आदेश जारी करेंगे।

कभी खुद भी मजबूरी में चले होते तो ऐसा सवाल नहीं करते

न्यायालय ने हालांकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या किसी तरह सड़क

पर चल रहे प्रवासी मजदूरों को रोका नहीं जा सकता? इस पर श्री मेहता ने जवाब दिया,

‘‘राज्य सरकारें ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था कर रही हैं, लेकिन लोग गुस्से में पैदल ही निकल रहे

हैं, इंतज़ार नहीं कर रहे हैं। ऐसे में क्या किया जा सकता है।’’ सॉलिसिटर जनरल ने कहा

कि प्रवासी मजदूर अपनी बारी का इंतजार नहीं कर रहे हैं। वे जल्द से जल्द अपने पैतृक

गृह पहुंच जाना चाहते हैं और इसी वजह से वे अपनी बारी का इंतजार करने के बजाय

पैदल ही निकल पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि सरकारें केवल प्रवासी मजदूरों से पैदल नहीं के

लिए अनुरोध ही कर सकती हैं। इनके ऊपर बलप्रयोग भी तो नहीं किया जा सकता, क्योंकि

इसका विपरीत परिणाम भी सामने आ सकता है। याचिकाकर्ता ने औरंगाबाद की हालिया

घटना के परिप्रेक्ष्य में याचिका दायर करके न्यायालय से हस्तक्षेप का अनुरोध किया था।

याचिका के अनुसार, केंद्र सरकार ने न्यायालय में कहा था कि लॉकडाउन के दौरान

मजदूरों का पलायन पूरी तरह रुक गया है। अच्छी बात यह है कि परेशानी के जड़ तक

पहुंचते हुए समाज ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जतायी है।

आम आदमी के लिए अदालत  का इतना संवेदनहीन होना अखर जाता है

यह अच्छी बात है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने ऐसे मजदूरों के लिए अपनी तरफ से

इंतजाम करने का एलान कर दिया है। इस विषय पर भागलपुर के विधायक अजीत शर्मा

को भी धन्यवाद जिन्होंने औपचारिक तौर पर सबसे पहले इस पर न सिर्फ दुख व्यक्त

किया है बल्कि सीधे प्रधानमंत्री से इसे रोकने और मजदूरों के लिए कोई न कोई इंतजाम

करने की अपील तक की है। अब राज्य सरकारें अपनी अपनी राज्य सीमा के भीतर ही

पैदल चलने वालों को कमसे कम एक जिला से दूसरे जिला की सीमा तक भेजने की

व्यवस्था कर उनका कष्ट कम कर सकती हैं। वैसे कभी खुद पैदल चले होते तो शायद जज

ऐसा फैसला नहीं देते।


 

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