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नियर अर्थ उल्कापिंड बढ़ा रहे हैं वैज्ञानिकों का टेंशन

  • सौर मंडल की गतिविधियों में हमेशा हो रहा बदलाव

  • काफी करीब से अचानक निकला एक उल्कापिंड

  • गैस उत्सर्जन की वजह से यह सिलसिला जारी

  • पृथ्वी के गर्म होने का इससे कोई रिश्ता नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नियर अर्थ उल्कापिंड यानी वे उल्कापिंड जो अपने चक्कर काटने के क्रम में पृथ्वी के

करीब से गुजरते हैं। इन पर नासा का एक दल खास नजर रखता है। नासा के अलावा भी

अन्य खगोल वैज्ञानिक अपनी खगोल दूरबीनों की मदद से इनकी गतिविधियों पर गौर

करते आये हैं। अब कुछेक उल्कापिंड वैज्ञानिकों के लिए चिंता का कारण बन रहे हैं। इसकी

खास वजह अचानक से उन उल्कापिंडों के आगे बढ़ने का रास्ता बदल जाना है। इनमें से

एक की पहचान पहले ही हो चुकी है और यह प्रमाणित भी हो चुका है कि खगोलीय कारणों

से यह बार बार अपनी दिशा और गति बदल रहा है। इस बार फिर से कुछ और उल्कापिंड

इसी तरह का आचरण करते पाये गये हैं। पिछले 11 नवंबर को एक उल्कापिंड इतने करीब

से गुजरा कि वैज्ञानिकों ने उसकी साफ तस्वीरें खींची है। यह अपने रास्ते से गुजरते वक्त

पृथ्वी से चांद की कुल दूरी की आधी दूरी पर से गुजरा है। अंतरिक्ष विज्ञान के लिहाज से

यह दूरी काफी करीब है। जिस नियर अर्थ उल्कापिंड का हम जिक्र कर रहे हैं उसका नाम

2020 वीपी 1 है। 18 मीटर लंबा यह उल्कापिंड मात्र एक लाख 80 हजार किलोमीटर की

दूरी से गुजरा है। सबसे बड़ी बात है कि यह इतने करीब से गुजरने वाला है, उसका पता

सिर्फ एक दिन पहले ही चल पाया था। इस पर नजर रखने वालों ने पाया कि यह करीब 78

हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। यानी आकार में काफी छोटा

होने के बाद भी इसकी तेज गति चिंता का विषय है। पृथ्वी के सबसे करीब आने के क्रम में

यह नियर अर्थ उल्कापिंड कभी भी पृथ्वी के अपने गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से अपनी दिशा

बदल भी सकता था।

नियर अर्थ ऑब्जेक्ट कभी भी पृथ्वी की तरफ मुड़ सकता है

लेकिन अचानक से पृथ्वी पर आ गिरने वाले उल्कापिंड दूसरे किस्म की परेशानियां भी

पैदा करते हैं। वर्ष 2013 में एक ऐसा ही उल्कापिंड रूस के चेलियाबिंस्क के पास आकर

गिरा था। इसके विस्फोट की वजह से 14 सौ लोग घायल हुए थे जबकि सात हजार से

अधिक इमारतों को नुकसान पहुंचा था।

अचानक से दिशा बदलने की वजह की भी खोज चल रही है। वैज्ञानिक प्रारंभिक तौर पर

इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि दरअसल सिर्फ पृथ्वी ही नहीं बल्कि पूरा सौर मंडल भी धीरे धीरे

गर्म हो रहा है। इसी गर्मी की वजह से सौर मंडल में मंडराते उल्कापिंडों के रास्ते भी बदल

रहे हैं।

ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस पर अनुसंधान किया है। इससे पहले

वैज्ञानिक सिर्फ पृथ्वी के अत्यधिक गर्म होने की वजह से आने वाले खतरों की चेतावनी दे

चुके हैं। अब पाया गया है कि पिछले दस खरब वर्ष से यह सौरमंडल गर्म हो रहा है। इसमें

मौजूद गैसों का तापमान भी पहले के मुकाबले दस गुणा अधिक बढ़ चुका है। भौतिक

शास्त्र के सामान्य नियमों के तहत इन गैसों के गर्म होने की वजह से ही वहां से गुजरने

वाले सारे पिंडों की गति और दिशा पर इस गर्मी का प्रभाव पड़ रहा है। अंतरिक्ष का वर्तमान

औसत तापमान करीब चार मिलियन डिग्री फारेनहाइट है। जो लगातार बढ़ता ही चला

गया है। इस शोध से जुड़े यी कुआंग चियांग ने कहा कि इस तापमान को मापने की विधि

का विकास नोबल पुरस्कार विजेता जिम पीबल्स के सिद्धांतों पर आधारित है। समझा

जाता है कि ब्लैक होल में बड़े पिंडों को सोख लेने के पूर्व जो गैस निकलते हैं, उनकी गति

भी बहुत तेज होती है।

ब्लैक होल भी सौरमंडल में गैसों की गर्म कर रहे हैं

सोखे जाने के दौरान टूटते तारों से भी जो ऊर्जा निकलती है, वह इन गैसों को गर्म करती

जाती है। इसी वजह से सौर मंडल के गर्म होने का यह क्रम चलता रहता है। वैसे

शोधकर्ताओं ने साफ कर दिया है कि सौर मंडल के गर्म होने का पृथ्वी का तापमान बढ़ने से

कोई रिश्ता नहीं है। पृथ्वी अपने प्रदूषण और अन्य कारणों से गर्म हो रही है, जिसके सारे

खतरों के बारे में दुनिया को पहले ही आगाह कर दिया गया है।

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