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धरती पर प्रकृति अपना कमाल दिखाती है जब इंसान पीछे हट जाता है




  • वीरान इलाकों में फिर से लौट आता है प्राकृतिक जीवन
  • फ्रांस के फोटोग्राफर ने काम किया है इस पर
  • लगातार 38 वर्षों तक ऐसे इलाकों को देखा
  • बेतला का पलामू किला भी एक नमूना है
राष्ट्रीय खबर

रांचीः धरती पर प्रकृति का आचरण इंसानी आचरण से बिल्कुल भिन्न है। इसी वजह से जब इंसान किसी इलाके को वीरान छोड़ देता है तो प्रकृति अपने तौर पर उसे फिर से संवारती हुई पुरानी अवस्था में लौटाने लगती है। यह पहले से ही वैज्ञानिक कल्पना है कि अगर वाकई इस धरती से इंसानो द्वारा फैलाया गया प्रदूषण समाप्त हो गया तो अगले एक सौ वर्षो में बहुत कुछ पूर्व स्थिति में लौट जाएगा।




वैसे इस कल्पना पर आधारित कई साइंस फिक्शन फिल्में भी पहले ही बन चुकी हैं। फ्रांस के एक फोटोग्राफर ने इसी स्थिति का अध्ययन लगातार 38 वर्षों तक किया है। जिन इलाकों को इंसानों ने छोड़ दिया है, वह प्रकृति कैसे खुद से इलाकों को अपने तरीके से संवारती है, इसका प्रमाण इसी फोटोग्राफर के शोध से पता चलता है। फ्रांस के इस फोटोग्राफर का नाम रोमेन वेइलोन है। उसने दुनिया के अनेक इलाकों में जाते हुए इंसानों द्वारा छोड़े गये इलाकों की स्थिति का अध्ययन किया है।

धरती पर प्रकृति अपना असर तुरंत दिखाती है

अपनी किताब ग्रीन उरबेक्स, द वर्ल्ड विदआउट अस में उन्होंने इस बारे में अपने चित्रों के माध्यम से ऐसे इलाकों में प्रकृति ने कैसी पूर्वस्थिति लौटाने की कोशिश की है, उसे बताया गया है। उनके दौरे में नामिबिया का वह शहर भी है, जो अब पूरी तरह वीरान है और उसे घोस्ट टाउन यानी भूतहा शहर कहा जाता है।

इसके अलावा ब्रसेल्स के एक वीरान सिनेमाघर, उक्रेन के एक रेलवे ट्रैक और टूस्कन के गांवों के भवनों को भी उन्होंने अपने कैमरे में कैद कर प्रकृति के आचरण को दर्शाया है। इन चित्रों से यह बात प्रमाणित हो जाती है कि इंसानों का हस्तक्षेप नहीं होने के बाद प्रकृति अपने तरीके से ऐसे इलाकों को पूर्व स्थित में ले जाने की कवायद प्रारंभ कर देती है। धरती से इंसानों से पूरी तरह विलुप्त हो जाने की स्थिति में शायद यह प्रक्रिया और तेज होगी क्योंकि तब का पर्यावरण भी तेजी से बदलता और सुधारता चला जाएगा।




वीरान हुआ पलामू किला तो जंगल से घिर गया

उनके अनुभव से यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे वीरान छोड़े गये इलाको में इलाके की आवश्यकता के मुताबिक ही प्रकृति ने आचरण किया है। इसी वजह से ऐसे वीरान इलाकों में जंगलों का बढ़ जाना स्थानीय पारिस्थितिकी पर आधारित है। हो सकता है कि ऐसे भी इलाके हों, जो इंसानों द्वारा छोड़ दिये जाने के बाद अब पूरी तरह जंगलों से ढक गये हों।

वैसे भी प्राचीन इतिहास के साक्ष्य कई बार खनन कार्य के दौरान हमें मिलते रहते हैं। जिससे पूर्व की सभ्यताओं का पता भी चलता रहता है। अभी हाल ही में पाकिस्तान के स्वात में एक प्राचीन बौद्ध मंदिर का मिलना भी इसका प्रमाण है।
लेकिन यह स्पष्ट है कि इंसानी हस्तक्षेप बंद होते ही प्रकृति दोगुणे उत्साह के साथ वहां की हरियाली लौटाने में जुट जाती है।

यह एक निरंतर प्रक्रिया है और समय के साथ साथ इसकी गति भी तेज होती चली जाती है। विशाल भवनों के अंदर उगने वाले छोटे छोटे पौधे धीरे धीरे वहां बड़े पेड़ों की शक्ल लेते हैं। जिसकी वजह से इंसानों द्वारा बनाये गये मजबूत भवन भी श्वस्त होते चले जाते हैं। इसे झारखंड के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। पलामू में मेदिनीराय का किला बेतला जंगल के बीच अब ध्वस्त होता जा रहा है। कभी यह भी राजा का महल था लेकिन उसके वीरान होने के बाद प्रकृति ने कैसे उसे अपने तरीके से ढाला है, यह देखने और समझने वाली बात है।



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