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देश के अब रियल एस्टेट में भी मंदी का आहट सुनाई पड़ी

देश के ऑटो उद्योग में मंदी पर सरकार भले ही अपनी अलग दलील दे

लेकिन यह प्रमाणित हो चुका है कि देश का यह उद्योग भीषण मंदी की चपेट में आ चुका है।

देश के रियल एस्टेट का कारोबार भी अब इस मंदी से प्रभावित होता दिखने लगा है।

इसकी पुष्टि इस बात से हो रही है कि बड़े अथवा मध्यम आकार के मकान अब नहीं बिक रहे हैं।

इसकी एक वजह सरकार द्वारा घर बनाने के कार्यक्रम को बताया जाता है।

लेकिन सरकारी नियमों के तहत जो घर बनाये जा रहे हैं,

वे अत्यंत निर्धन श्रेणी के लोगों के लिए है।

कुछ ऐसी ही स्थिति शौचालयों के निर्माण में भी आयी थी।

अब धीरे धीरे इन तमाम योजनाओं का वास्तविकता का भी खुलासा होता चला जा रहा है।

यह बात सामने आ रही है कि अधिकारियों ने सिर्फ अपनी पीठ थपथपाने के लिए कागजी घोड़े दौड़ाये थे।

फाइलों में दर्ज आंकड़ों के आधार पर अनेक इलाकों को ओडीएफ मुक्त भी घोषित कर दिया गया था।

लेकिन वास्तविकता यही है कि अब तक इस योजना का काफी सारा हिस्सा कमसे कम झारखंड में पूरा तक नहीं हो पाया है।

इसके जो आंकड़े अब तक सामने आये हैं, उनके मुताबिक सरकार भी इस मंदी की स्थिति से इंकार नहीं कर सकती है।

देश के सात महानगरों का आंकड़ा इसे प्रमाणित करता है

देश के सात प्रमुख शहरों में जुलाई-सितंबर तिमाही के दौरान मकानों की बिक्री 18 प्रतिशत गिरकर 55,080 इकाई रही।

रीयल एस्टेट से जुड़ी सेवाएं देने वाली फर्म एनारॉक ने एक रपट में कहा है कि खरीदार मकान में निवेश करने को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं।

दिल्ली-एनसीआर, मुंबई महानगर क्षेत्र, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलूरू, पुणे

और हैदराबाद- इन प्रमुख शहरों में पिछले साल इसी अवधि में 67,140 मकान बिके थे।

बेंगलूरू में गिरावट 35 प्रतिशत तक रही।

एनारॉक ने अपनी रपट में कहा कि 2019 की तीसरी तिमाही में करीब 55,080 इकाइयों की बिक्री हुई।

यह 2019 की दुसरी तिमाही से 20 प्रतिशत और एक साल पहले की तीसरी तिमाही से

18 प्रतिशत कम है। फर्म ने कमजोर रुख के अलावा, ब्याज सहायता योजना

पर प्रतिबंध और श्राद्ध पक्ष को भी आवास बिक्री में गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहराया।

दरअसल कई बड़े बिल्डरों के अचानक दिवालिया होने और उनकी चालू परियोजनाओं में

जनता का काफी सारा पैसा लगा होने की वजह से अब लोगों को यह

जोखिम वाला काम नजर आ रहा है।

इससे पहले शेयर मार्केट के बदले देश के रियल एस्टेट में निवेश भी

एक अच्छा कारोबारी सौदा समझा जाता था।

पूरे देश के रिएल एस्टेट में एक जैसी स्थिति

लोगों का पैसा डूब जाने तथा बाजार में नकदी का प्रवाह तेजी से कम

होते जाने की वजह से अब लोग अपना बचाया हुआ पैसा अपने हाथ के नीचे

रखना ही बेहतर मान रहे हैं।

जब ऑटो सेक्टर में मंदी की बात आयी थी तो सरकार की यह दलील थी कि

लोगों ने अब कैब का इस्तेमाल करना बढ़ा दिया है।

इस वजह से वाहन बाजार में ऐसी स्थिति बनी है।

यह कुछ हद तक सही भी है लेकिन उबेर और ओला कैब जैसी कंपनियों के वित्तीय ढांचे यह बताते हैं कि अब तो उनके मुनाफे में भी कमी आयी है।

जिससे साबित हो जाता है कि अब गाड़ियों पर चाहे वह किराये की क्यों न हो, लोग अब खर्च करने से परहेज कर रहे हैं।

अब यही स्थिति देश के रियल एस्टेट में भी देखने को मिल रहा है।

जाहिर सी बात है कि जब तक लोगों के पास अपनी जरूरतों के बाहर का पैसा एकत्रित अथवा प्रवाहित नहीं होता, इस स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश भी नहीं है।

मंदी के उबरने के लिए सरकार की तरफ से जो कुछ उपाय अब तक किये जाने की घोषणा की गयी है, उनमें आधारभूच संरचना में कोई खास सुधार की गुंजाइश नहीं है।

लेकिन इन तरकीबों से निश्चित तौर पर देश में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा।

वरना शेयर बाजार की अस्थिर स्थिति ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि देश की गाड़ी चलने के दौरान जगह जगह पर अटक रही है।

मॉनसून की खेती पर बहुत कुछ निर्भर

इनके बीच ही मॉनसून की खेती की सफलता पर भी बहुत कुछ निर्भर है।

सरकार को समय रहते ही अनाज के मंडी तक आने पर त्वरित भुगतान का इंतजाम अभी से ही कर लेना चाहिए।

नई फसल को लेकर मंडी में आने वाले किसानों को अगर जल्द भुगतान मिलने लगे

तो कमसे कम ग्रामीण इलाकों में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा और अपनी प्रचलित अर्थव्यवस्था के

तौर पर भारतीय समाज फिर से गांव से कस्बा और कस्बा से शहर की नकदी प्रवाह

के माध्यम से अपनी स्थिति को कुछ हद तक सुधार पायेगा।

लेकिन इन तमाम व्यवस्थाओं के बीच अब सरकार को इस दिशा में काम करना ही होगा

कि बड़े बकायेदारों के पास फंसे देश के पैसे की वसूली हो।

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