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देश के किसान राजनीति के केंद्र मे यह अच्छी बात




देश के किसान देश की रीढ़ हैं। बहुत सारे लोगों को अपने ही शरीर की रीढ़ का अक्सर ही

पता नहीं चल पाया है।

इसके सहारे वे अपनी दैनिक दिनचर्या को अंजाम देने के बाद भी यदा कदा रीढ़ को

झूकाकर आगे बढ़ने में संकोच नहीं करते।

इसलिए अगर देश के किसान के हित में कोई भी फैसला लिया जाता है

तो वह निश्चित तौर पर पूरे देश के फायदे में होता है।

इस बात को मर्म को बहुत संक्षेप में अगर कहा जाए तो इतना कहा जा सकता है कि

दुनिया के किसी भी कारखाने में रोटी नहीं तैयार हो सकती।

यह तो देश के किसान ही हैं जो पूरे देश के लिए अनाज उगाते हैं और तब जाकर लोगों को दो वक्त का भोजन उपलब्ध होता है।

अब झारखंड में इसी क्रम में किसान के लिए पेंशन योजना लागू की जा रही है।

देश के किसान के लिए पेंशन योजना एक बेहतर फैसला है

यह अच्छी बात है। सिर्फ इसके क्रियान्वयन पर बहुत अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है।

अभी हाल ही में सत्ता पलट के बाद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से जो कुछ राज बाहर आ रहे हैं,

वे इस सावधानी का ही संकेत देते हैं।

मध्यप्रदेश में यह मुद्दा एक राजनीतिक विवाद का विषय बना था।

बाद में दस्तावेजी साक्ष्य आने के बाद खुद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने आरोप से पीछे हट गये।

उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि खुद उनके भाई का भी कर्जा माफ हुआ था।

लेकिन किसान कर्ज के मामले में छान बीन से अरबों रुपयों की लूट का भी खुलासा हो गया।

यह सारा गोरखधंधा मुख्य तौर पर सहकारिता बैंकों के माध्यम से किया गया था।

जिन किसानों को नाम पर कर्ज बांटे गये थे, उन्हें पता ही नहीं था कि उनके नाम पर कोई कर्ज भी है।

सूची जारी होने के बाद एक एक कर ऐसे मामलों का खुलासा जब होने लगा

तो गोलमाल की रकम अरबों तक जा पहुंची।

जाहिर है कि किसानों के नाम पर बंटा यह धन किसी और की जेब में ही गया है।

इसलिए झारखंड में किसान पेंशन योजना के क्रियान्वयन पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि कई अवसरों पर ऑनलाइन व्यवस्था होने के बाद भी

गड़बड़ी करने वाले कोई न कोई रास्ता निकाल ही ले रहे हैं।

इसके लिए हम सिर्फ झारखंड के राशन व्यवस्था को देख सकते हैं।

राशन वितरण की गड़बड़ी को हम नमूना मान सकते हैं

यहां सारी व्यवस्था ऑनलाइन होने के बाद भी गरीबों के हक का राशन अब भी काला बाजार में बिक रहा है।

सारी कवायद होने के बाद भी जब उसके क्रियान्वयन में ईमानदारी का अभाव हो

तो व्यवस्था धराशायी होने लगती है।

साथ ही चूंकि इस गोरखधंधे में सरकारी अफसर भी शामिल होते हैं,

इसलिए इनके खिलाफ कार्रवाई तब तक नहीं होती जबतक कि कोई इसके खिलाफ मोर्चा नहीं खोलता।

देश के किसान अपनी मांगों के लेकर हाल के दिनों में कई बडे आंदोलन कर चुके हैं।

इसलिए अब राजनीतिक सत्ता को भी यह महसूस हो चुका है कि ग्रामीण भारत की राजनीति

पर अपना प्रभाव कायम रखने का रास्ता तो दरअसल किसान कल्याण के माध्यम से ही निकल सकता है।

गांव का किसान अगर किसी सरकार के नाराज हैं तो वोट के दौरान इसका खामियजा सत्तारूढ़ दल को ही भोगना पड़ता है।

इसलिए अब किसान पेंशन योजना को लागू करने के फैसले के बाद उसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए भी पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

इसके पहले भी केंद्र सरकार ने देश के किसान के हित में कई फैसले लिये हैं।

इन फैसलों का प्रभाव देश के कोने कोने तक पहुंचना अभी शेष है।

दूसरी तरफ देश की आर्थिक मंदी के बीच भी किसानों को प्रोत्साहन मिलने से मॉनसून के बाद बाजार की स्थिति में सुधार की वजह से इस आर्थिक मंदी का असर भी कम हो सकता है।

देश में फसल उगाने का दौर चल रहा है।

इसके बाद यह खेतों में उपजा यह अनाज देश की मंडियों तक पहुंचेगा

तो नये सिरे से आर्थिक प्रवाह की गति फिर से तेज होगी।

देश में रोजगार भी कृषि से ही संतुलित होगा

बार बार इस बात को समझने की जरूरत है कि देश का सबसे अधिक रोजगार

इसी कृषि के क्षेत्र में पैदा होता है।

ऐसे में सिर्फ कृषि कार्य तक ही ग्रामीण आबादी को सीमित रखने के बदले उन्हें खाली समय में अन्य उत्पादक कार्यों में भी लगाया जाना चाहिए।

इससे उनके पास भी वैकल्पिक रोजगार का साधन अपने घर में मौजूद रहेगा।

गांव में पैसे के प्रवाह की निरंतरता बनी रहने की स्थिति में गांव से तैयार हुआ

धन अंततः पास के कस्बे और शहरों से होता हुआ अंततः देश की अर्थव्यवस्था को

मजबूत बनाने का काम करेगा।

इसलिए देश के किसान को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा ही जाना चाहिए।

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