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मजदूरों के साथ सरकारों का यह कैसा रवैया

  • सरकार आश्वासन देने के बाद भी ट्रेन नहीं दे रही है

  • महाराष्ट्र से चले तो छिंदवाड़ा में रोक दिये गये मजदूर

  • अपने पास के पैसे खत्म हो रहे तो परदेस में क्या करते

  • रोके गये दल में अनेक बच्चे और महिलाएं भी शामिल

सचिन पांडेय

छिंदवाड़ाः मजदूरों के साथ सरकारों का क्या रवैया है, इसका ताजा नमूना छिंदवाड़ा में

फिर से देखने को मिला। यूं भी यह सारा देश यह लगातार देख समझ रहा है कि असहाय

और बेबस मजदूरों के नाम पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच राजनीति का खेल चल रहा

है।  तय है कि इस किस्म की हरकतों का असर चुनाव में देखने को मिलेगा।

वीडियो में देखिये छिंदवाड़ा में फंसे मजदूरों की व्यथा

जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहां के लिए त्वरित सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं लेकिन जहां

गैर भाजपा सरकारें हैं, वहां के लिए रेल का प्रबंध करने में लेटलतीफी हो रही है। रेल की

व्यवस्था के बारे में रेल मंत्री पियूष गोयल पहले ही यह गलत बयान दे चुके हैं कि राज्य

सरकारे इसमें सहयोग नही कर रही है। सभी को मालूम है कि देश की सारी रेल पटरी और

रेलवे स्टेशन के आस पास की सारी आधारभूत संरचना रेलवे की होती है। भारत में आम

दिनों में हर दिन बीस हजार पैसेंजर ट्रेनें चलती है। अगर सरकार को मजदूरों को वाकई

आराम से भेजना होता तो इन सारी पैसेंजर गाड़ियों से एकमुश्त इंतजाम कर प्रति ट्रेन एक

हजार यात्री के औसत से अधिकांश को अब तक गंतव्य तक भेजा जा चुका होता। लेकिन

दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया है।

मजदूरों के साथ हर जगह दोयम दर्जे का व्यवहार

छिंदवाड़ा रेलवे स्टेशन पर अनेक मजदूर मिले, जिन्हें बिहार जाना है। घर वापसी का कोई

प्रबंध नहीं होने के बाद वे मजबूरी में पैदल ही रेलवे पटरी के सहारे बिहार लौट जाना चाहते

हैं। छिंदवाड़ा आने के बाद उन्हें इस अवस्था में रेल की पटरी पर चलते देखकर प्रशासन की

तरफ से रोका गया है। पूछने पर मजदूरों ने बताया कि अब अपने इंतजाम से बस से घर

लौटने लायक पैसा भी उनके पास नहीं है। सरकार की तरफ से रेल का इंतजाम किये जाने

का आश्वासन दिये जाने के बाद भी दरअसल कोई प्रबंध नहीं किया गया। इस बीच उनके

अपने चंद रुपये भी तेजी से खर्च हो रहे हैं। ऐसे में जान बचाने के लिए किसी तरह अपने

गांव पहुंचने के लिए रेलवे की पटरी ही उनका एकमात्र सहारा है। अब जब वे बिना किसी से

मदद मांगे पैदल बढ़ रहे हैं तब भी प्रशासन उन्हें रोक रहा है। उनकी परेशानी यह है कि न

तो उनके लिए सरकार कोई इंतजाम कर रही है और न ही उन्हें अपने तरीके से रेलवे पटरी

पर घर लौट जाने की अनुमति दे रही है। सरकार और राजनीति के खेल में ऐसे लाखों

मजदूर पूरे देश में फुटबॉल बना दिये गये हैं।


 

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