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नासा के प्रिजरवेंस रोवर से मिले मंगल ग्रह पर जीवन होने की चर्चा फैली

  • वहां सफेद सफेद फंगस देखे गये हैं

  • नदी और ज्वालामुखी के निशान भी हैं

  • नासा ने खारिज किया जीवन होने की बात को

  • हर रात बनता है अगले दिन का शोध का कार्यक्रम

राष्ट्रीय खबर

रांचीः नासा के प्रिजरवेंस रोवर ने मंगल ग्रह पर उड़ते हुए कुछ नये तथ्य भेजे हैं। इन्हीं

तथ्यों और वहां उड़ रहे नासा के हेलीकॉप्टर से जो चित्र मिल रहे हैं, उसके आधार पर यह

शोध नये सिरे से प्रारंभ हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिकों को अनुमान है

कि मंगल ग्रह की सतह पर फंगस भी हैं। फंगस अपने आप में जीवन का एक संकेत होता

है। इसके अलावा नासा के प्रिजरवेंस रोवर ने पहले ही वहां प्राचीन नदी और ज्वालामुखी

होने के संकेत दिये थे। यह सभी किसी न किसी रुप में जीवन की मौजूदगी का संकेत देते

हैं। लेकिन वहां का अति सुक्ष्म जीवन कैसा है, इस बारे में वैज्ञानिक अभी कोई अनुमान

लगाना नहीं चाहते। हो सकता है कि जांच में वहां पहले जीवन होने की पुष्टि हो लेकिन

वैज्ञानिक सारे तथ्यों की पहले पुष्टि कर लेना चाहते हैं। इस शोध के प्रारंभ होने के साथ ही

इस बारे में एडवांसेज इन माइक्रोबॉयोलॉजी नामक पत्रिका में इस बारे में एक प्रबंध भी

प्रकाशित किया गया है। जिसमें यह सुझाव दिया गया है कि नजदीक से लिये गये मंगल

ग्रह के चित्र यह संकेत देते हैं कि वहां फंगस जीवित अवस्था में है। इससे साबित होता है

कि वहां सुक्ष्म जीवन मौजूद है। प्रिजरवेंस रोवर के साथ साथ नासा के हेलीकॉप्टर ने ग्रह

के विभिन्न क्षेत्रों में उड़ान भरते हुए यह तस्वीरें खींची है। तस्वीरो में सफेद सफेद नजर

आने वाले इलाकों को भी फंगस माना गया है। यह ग्रह के कई इलाकों में देखा गया है।

इसके अलावा उनका गोलाकार भी उनके फंगस होने का संकेत देता है। अगर वाकई यह

फंगस हैं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि वहां किसी न किसी रुप में बैक्टेरिया भी मौजूद है,

जो जीवन होने की पुष्टि कर सकता है।

नासा के प्रिजरवेंस रोवर के अलावा हेलीकॉप्टर ने फोटो भेजे

वैसे वहां फंगस होने के इस तर्क ने वैज्ञानिकों को हैरान अवश्य किया है। ऐसा इसलिए है

कि मंगल ग्रह की सतह पर विकिरण बहुत अधिक है। ऐसे में वहां जीवन का पनपना पृथ्वी

के जीवन संबंधी सिद्धांतो के प्रतिकूल है। इस किस्म के फंगस आर्कटिक के क्षेत्र में भी देखे

जाते हैं जो खास मौसम में तीन सौ मीटर तक बड़े हो जाते हैं। उन्हें ब्लैक आर्कटिक

एरानिफॉर्मस कहा जाता है। लेकिन जाड़ा का मौसम आते ही वे गायब हो जाते हैं। यानी

वहां आर्कटिक क्षेत्र में भी जमीन के नीचे ऐसे सुक्ष्म जीवन की मौजूदगी हमेशा बनी रहती

है। कुछ इसी किस्म के फंगस मंगल ग्रह पर भी नजर आया है, जो वैज्ञानिकों के लिए

फिलहाल आश्चर्य का विषय बना हुआ है। दूसरी तरफ नासा ने ऐसी किसी संभावना से

साफ इंकार कर दिया है। नासा के मुताबिक वहां के पत्थरों के अंदर मौजूद खनिजों की

वजह से ऐसा बदलाव हुआ है। नासा के वैज्ञानिक औपचारिक तौर पर वहां जीवन होने का

कोई भी संकेत मिलने से साफ इंकार कर रहे हैं। उनके मुताबिक वैज्ञानिक सिद्धांत तो यही

कहता है कि इतने भीषण विकिरण वाले इलाके में जीवन का होना असंभव है। लेकिन कुछ

तस्वीरों पर उठे सवालों पर नासा ने चुप्पी साध ली है। वैसे कुछ वैज्ञानिक यह मानते हैं कि

नासा की तरफ से जो दलील दी गयी है, वह भी वैज्ञानिक तौर पर सही है। कई बार

भूगर्भविज्ञान की अपनी प्रक्रियाओं की वजह से ऐसा माहौल बनता है जो किसी जैविक

प्रक्रिया के घटित होने का भ्रम पैदा करता है। लेकिन इस दिशा में बहस को आगे बढ़ाने में

नासा के उस छोटे से हेलीकॉप्टर की भी प्रमुख भूमिका है। इनजेन्यूनिटी नामक यह

हेलीकॉप्टर लगातार मंगल ग्रह पर उड़ान भर रहा है। उससे भी कई रोचक तस्वीरें देखने

को मिली है।

इनजेन्यूनिटी नाम का यह हेलीकॉप्टर वहां लगातार सक्रिय है

यह छोटा सा हेलीकॉप्टर गत वर्ष पृथ्वी से रवाना हुआ था। अंतरिक्ष यान पर सवार होकर

रवाना होने के पूर्व इसे बनाने वालों ने उसकी बार बार जांच की थी। यह जांचा परखा गया

था कि यह हेलीकॉप्टर वाकई मंगल ग्रह पर प्रिजरवेंस रोवर के साथ जाने के बाद सही ढंग

से काम कर पायेगा। अब व्यवहार में यह साबित हो गया है कि यह इनजेन्यूनिटी

हेलीकॉप्टर सही काम कर रहा है। इसकी मदद से वैज्ञानिकों को मंगल ग्रह के जेजेरो क्रेटर

को देखने में मदद मिली है। पिछले महीने यह प्रिजरवेंस रोवर से अलग हो गया था और

तब से अलग से अपना काम करते हुए नियंत्रण कक्ष को सूचनाएं प्रेषित कर रहा है। अब

मंगल ग्रह पर मौजूद प्राचीन नदी की जांच करेगा। अपनी ऊर्जा बचाने के लिए यह दोनों

यंत्र जब विश्राम करते हैं तो नियंत्रण कक्ष में मौजूद वैज्ञानिक इन यंत्रों से प्राप्त आंकड़ों का

विश्लेषण कर उन्हें अगले दिन क्या करना है, इसकी रुपरेखा बनाते रहते हैं।

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