नासा को ऑरबिटर यान से मिले चांद पर पानी के निशान

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  • चीन का मिशन चंद्रमा है अब भी जारी

  • ऑरबिटर मिशन के आंकड़ों का निष्कर्ष

  • पृथ्वी की ओट में आने पर बनता है पानी

  • भविष्य के अंतरिक्ष अभियान में बनेगा मददगार

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः नासा को अपने चंद्र अभियान के तहत अब वहां पानी के अणुओं की मौजूदगी का पता चला है।

नासा का ऑरबिटर यान इसी काम के लिए अंतरिक्ष में भेजा गया था।

इसके अलावा वहां चीन का अंतरिक्ष यान पहले से ही चांद के

दूसरी छोर पर काम कर रहा है और अपने अनुसंधान जारी रखे हुए हैं।

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नासा के यान ने यह पाया है कि चंद्रमा के एक सतह पर जल के अणु चलते पाये जा रहे हैं।

यह सतह चांद के दिन का इलाका है, यानी चंद्रमा का यह छोर हमेशा ही सूर्य की तरफ रहता है।

मालूम रहे कि चांद का एक दूसरा छोर है, जो कभी भी पृथ्वी की तरफ नहीं आता और इसी तरफ चीन का यान उतारा गया है।

नासा के इस अंतरिक्ष यान ऑरबिटर में एक खास उपकरण लगा हुआ है।

लैंप नामक इस यंत्र का पूरा नाम लेइमैन अल्फा मैपिंग प्रोजेट है।

इस यंत्र ने चांद की तहत पर चंद्रमा की सतह पर पानी की बूंदों के होने का पता लगाया है।

खोज से चांद पर पानी की उपलब्धता के पुराने सिद्धांत बदलते नजर आ रहे हैं।

इस एलआरओ (ऑरबिटर मिशन) के उप प्रमुख जॉन किलर ने कहा कि

यह दरअसल वर्षों के शोध का नतीजा है और हर आंकड़े के विश्लेषण के बाद ही नये नतीजे निकाले जा रहे हैं।

पिछले दशक तक वैज्ञानिकों का यह अनुमान था कि चंद्रमा की सतह पर पानी की कोई उपलब्धता नहीं है।

यह पूरी तरह शुष्क और कठोर धरती है।

वहां के छोर पर बने गहरे गड्डों में जो पानी है वह कठोर बर्फ की शक्ल में है।

जहां सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंच पाती है।

अब हाल के दिनों में वैज्ञानिकों को पानी के छोटे कणों के वहां अस्तित्व में होने का पता चला है।

वहां की मिट्टी के बीच यह कण मौजूद होने की पुष्टि होने की वजह से पूर्व के निष्कर्षों को बदला गया है।

जल के यह कण गर्मी पाकर भाप में बदल जाया करते हैं।

इस वजह से उन्हें स्थायी तौर पर नहीं पाया जा सकता है।

इस पानी के कणों के मौजूद होने की वजह से वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे हैं कि

दरअसल वहां मौजूद हाइड्रोजन के अणुओं की वजह से वहां पानी बनता है।

लेकिन यह हाइड्रोजन वहां सौर आंधियों की वजह से पैदा होता है।

वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि जब चंद्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी आता है।

पृथ्वी की ओट में होन की वजह से उस दौरान चंद्रमा पर सौर आंधियों का असर खत्म हो जाता है।

उसी दौरान हाईड्रोजन के कण वहां रासायनिक प्रतिक्रिया कर पानी की बूंदों को जन्म देते हैं, ऐसा वैज्ञानिकों का अनुमान है।

बाद में फिर से सूर्य के सीधे संपर्क में आने के बाद गर्मी की वजह से यह जल कण भाप बनकर उड़ जाते हैं।

वहां पानी होने के बाद इस जलकणों से बारिश होने की संभावनाओं का पता लगाया जा रहा है।

इस पूरे शोध का असली मकसद वहां मानव जीवन के लायक पानी की उपलब्धता और उसके चक्र को निर्धारित करना ही है।

वहां पानी मिलने से भविष्य में इंसानों को चंद्रमा पर मौजूद पानी के इस्तेमाल का लाभ भी मिल सकता है।

ऐसा प्लेनेटरी साइंस इंस्टिटियूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक आमांडा हेंड्रिक्स का मानना है।

उनके मुताबिक अगर वहां पानी की उपलब्धता हो जाती है तो यह भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए बड़ी उपलब्धि होगी

क्योंकि तब कई कार्यों के लिए यहां से कई चीजों को ढोकर नहीं ले जाना पड़ेगा।

वे सारे काम चांद पर मौजूद पानी और अन्य प्रक्रियाओं के तहत पूरे किये जाएंगे।

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