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नासा के प्रिजरवेंस रोवर ने अपनी आंखों से बाढ़ के निशान खोजे हैं




मंगल ग्रह पर प्राचीन काल में अचानक बाढ़ आया करता था
एक बड़ी झील और नदी का भी पता चला
झील की सतह पर प्रमाण अब भी मौजूद
बाढ़ की गति काफी तेज हुआ करती थी
राष्ट्रीय खबर

रांचीः नासा के प्रिजरवेंस रोवर का मंगल ग्रह पर अभियान अब भी जारी है। यह रोवर वहां के विभिन्न इलाकों का दौरा कर वहां की स्थिति और संरचना का अध्ययन कर रहा है। इसके बीच ही इस बात की जानकारी मिली है कि मंगल ग्रह पर प्राचीन काल में अचानक बाढ़ आया करता था।




इस बात की पुष्टि वहां के पत्थरों पर बाढ़ आने के निशान से हुई है। साथ ही वहां प्रिजरवेंस रोवर ने यह भी पता लगाया है कि वहां एक नदी और एक बड़ा सा झील भी था।

इस रोवर से प्राप्त आंकड़ो के आधार पर मैसाच्युट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिको ने इस बार में जानकारी सार्वजनिक की है। नासा के प्रिजरवेंस रोवर द्वारा खींचे गये चित्रों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है।

मंगल ग्रह के जेजेरो क्रेटर में ही यह बड़ा सा झील हुआ करता था, जिसे एक छोटी सी नदी लगातार जलापूर्ति किया करती थी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक यह घटना आज से करीब 3.7 बिलियन वर्ष पहले की है।

अब उसी झील के इलाकों के अवशेषों में मिट्टी के सुक्ष्म कण और कार्बोनेट के कई सतहों का पता चला है। झील में छोटे बड़े पत्थर भी हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह छोटे बड़े पत्थर भी नदी के प्रवाह के साथ काफी दूर से यहां तक बहकर चले आये थे।

मंगल ग्रह में हो रहे मौसम के बदलाव के दौरान वहां अचानक ही बाढ़ आने का प्रमाण मिला है, जिसकी वजह से झील में सारा पानी आकर एकत्रित हो जाता था। इसके आधार पर वैज्ञानिक यह भी मान रहे हैं कि वहां के प्राचीन काल में इसी बाढ़ को मौसम के बदलाव का अंतिम चरण भी माना जा सकता है।

नासा के प्रिजरवेंस रोवर से मौसम का पता चला

जर्नल साइंस में प्रकाशित शोध प्रबंध में इन बातों की जानकारी दी गयी है। जिस इलाके में इसकी खोज हुई है, उस क्रेटर के चारों तरफ के आंकड़े इसी बात को प्रमाणित कर रहे हैं।

वहां की प्राचीन नदी का प्रवाह भी पृथ्वी के जैसा ही था। जिसमें अलग अलग स्तर रहे हैं और नदी का प्रवाह इसी झील में होता था, जो काफी पहले ही सूख चुका है। फिर भी वहां प्राचीन प्रमाण अब भी मौजूद हैं। इस इलाके के अंदर पहुंचकर नासा के प्रिजरवेंस रोवर ने वहां के चित्र भी अपने नियंत्रण कक्ष तक भेजे थे।




बता दें कि इस रोवर में खास किस्म के कैमरे लगे हुए हैं, जो 1.4 मील की दूरी से भी साफ तस्वीर खींच सकते हैं। इस नदी के प्रवाह का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वहां के प्रवाह के चारों तक जिस तरीके से वहां की जमीन की सतहों पर अलग अलग प्रमाण हैं, उससे साफ पता चला है कि नदी का बहाव काफी दूर से झील तक होता था।

इसी वजह से नदी और झील के सूखने के दौर में वहां ऊपरी सतह पर कीचड़ और छोटे पत्थरों के टुकड़े भी रहे थे। इस झील के सबसे गहरे इलाके में अब भी इसके साक्ष्य मौजूद हैं। जब कोई ऐसा जलाशय सूखता जाता है तो जिस तरीके से वहां मिट्टी और पत्थर नीचे की तरफ जाते हैं, वही सब कुछ यहां मौजूद है। वैज्ञानिकों ने इन तस्वीरों पर गौर किया है।

जिससे यह पाया गया है कि वहां कुछ पत्थर बड़े आकार के भी हैं, जो करीब तीन फीट चौड़े हैं। उनका वजन भी कई टन होने का अनुमान है। इतने बड़े आकार के पत्थर सिर्फ अचानक आयी बाढ़ की वजह से ही बहकर आ सकते हैं।

नदी में तेज बाढ़ आने के साक्ष्य भी मौजूद हैं

नासा के प्रिजरवेंस रोवर की आंखों से नदी के बारे में जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक यह सारे पत्थर चालीस मील या उससे दूर से बहकर चले आये हैं। इसीलिए यह माना जा रहा है कि अचानक आयी बाढ़ के तेज प्रवाह के बिना ऐसा हो पाना संभव नहीं था।

वैज्ञानिकों ने उस प्राचीन काल के बाढ़ के बारे में भी बताया है कि यहां नौ मीटर प्रति सेकंड की गति से यह बाढ़ आती थी। वर्तमान में यूरोप के राइन नदी में भी कभी कभार इतनी तेज गति से बाढ़ आती है। आम समय में नदी का प्रवाह सामान्य गति से ही हुआ करता था।

जब अचानक बाढ़ का प्रकोप होता था तो दूर की मिट्टी और बड़े बोल्डर भी नीचे की तरफ बहकर आने लगते थे। वैसे यह नदी और झील क्यों सूख गयी, इस बारे में वैज्ञानिक अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं। वैसे शोध दल यह समझने की कोशिश कर रहा है कि यहां मौसम के बदलाव की असली वजह क्या थी।

इस शोध दल के नेता और एमआईटी के प्रोफसर बेंजामिन वेइस कहते हैं कि पत्थरों से ही इस बदलाव के असली राज का पता भविष्य में चल पायेगा। इस पूरे ग्रह में इस किस्म की परिस्थिति कहीं और नहीं है। लेकिन अब यह कहा जा सकता है कि प्राचीन काल में यहां भी पानी हुआ करता था, जिसकी वजह से नदी और झील बने थे।



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