उल्कापिंड को अंतरिक्ष में ध्वस्त करने का प्रयोग करेगा नासा

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  • पृथ्वी की धुरी पर बढ़ते उल्कापिंड बढ़ा रहे हैं वैज्ञानिकों की चिंता

  • बेन्नू पर पहले से ही चल रहा है प्रयोग

  • अनेक छोटे उल्कापिंड गिरते रहते हैं

  • योजना का नाम दिया गया है डार्ट

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः उल्कापिंड का सीधे पृथ्वी की धुरी पर घूमना खगोल वैज्ञानिकों की बड़ी चिंता का विषय है।

हाल के दिनों में अनेक ऐसे उल्का पिंडों का पता चला है, जो किसी न किसी समय सीधे पृथ्वी से आ टकरायेंगे।

इनमें से कुछ का आकार इतना बड़ा है कि टकराव की स्थिति में वह पृथ्वी पर बड़ी तबाही ला सकते हैं।

इसी वजह से नासा ने अपनी पूर्व योजना के तहत किसी उल्कापिंड को अंतरिक्ष में ध्वस्त करने की योजना को अमल में लाने की तैयारी प्रारंभ कर दी है।

उल्कापिंड पर टक्कर से दिशा बदल दी जाएगी

वैसे भी उल्कापिंड बेन्नू को अंतरिक्ष में ही प्रक्षेपास्त्र से ध्वस्त करने पर काम हो रहा है, जिसके पृथ्वी से टकराने की संभावना है।

इसी वजह से एक अंतरिक्ष यान बेन्नू की सतह के ठीक ऊपर उड़ रहा है

और वह अपन रोबोट बांह से इस उल्कापिंड की मिट्टी के नमूने एकत्रित कर वापस लौट आयेगा।

नासा के वैज्ञानिक सैद्धांतिक तौर पर बने उस योजना को अमल में लाना चाहते हैं,

जिससे पृथ्वी की तरफ किसी उल्का पिंड को अंतरिक्ष में भी ध्वस्त कर दिया जाना है।

इस काम में जुटे वैज्ञानिक मानते हैं कि आम तौर पर उल्कापिंड पत्थर का टुकड़ा भर है।

कई बार इनका आकार इतना बड़ा होता है कि वह पृथ्वी से आ टकराये तो तबाही आ सकती है।

वरना आम तौर पर छोटे छोटे उल्कापिंडों का गिरते रहना तो एक आम बात है।

ऐसे छोटे उल्कापिंड जब आ टकराते हैं तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में आते ही उनका अधिकांश भाग जलकर समाप्त हो जाता है।

लेकिन आकार में बड़े होने पर वे पृथ्वी पर बड़ा झटका पैदा करते हैं।

पूर्व में भी शीतयुग की समाप्ति के पूर्व कुछ ऐसा ही हुआ था।

जिसकी वजह से यहां के सबसे बड़े जीव डायनासोर एक ही झटके में समाप्त हो गये थे।

बाद में पृथ्वी पर नये किस्म के जीवन का उदय हुआ था।

पृथ्वी पर उल्कापिंड टकराने का वीडियो

अब नासा के वैज्ञानिक उल्कापिंड ध्वस्त करने की योजना को डार्ट नाम देकर काम कर रहे हैं।

डार्ट यानी डबल एस्ट्रोयड रिडाइरेक्ट टेस्ट।

इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसके जरिए नासा के वैज्ञानिक पृथ्वी की धुरी पर आते

उल्कापिंडों को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश कर रहे हैं।

उल्कापिंड ही हैं खगोल वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चुनौती

इस कोशिश को भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती के समाधान के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।

इस काम में नासा के साथ यूरोपियन स्पेस एजेंसी भी है।

पूरी योजना का मकसद किसी भी उल्कापिंड में टक्कर मारकर उसे पृथ्वी की धुरी से अलग भेज देना है।

ताकि पृथ्वी के साथ किसी बड़े उल्कापिंड की टक्कर को टाला जा सके।

मिली जानकारी के मुताबिक वैज्ञानिकों ने इसके लिए डिडीमोस नामक छोटे से उल्कापिंड को चुना है।

इस डिडीमोस के साथ ही उसका एक छोटा सा हिस्सा भी है, जिसे डिडीमून कहा जाता है।

यह डिडीमून भी डिडीमोस के चारों तरफ घूमता हुआ चल रहा है।

इनमें से कोई भी पृथ्वी के लिए खतरा नहीं है।

फिर भी वैज्ञानिक इन्हीं पर प्रयोग करना चाहते हैं।

यह प्रयोग जब अमल में लाया जाएगा तब यह उल्कापिंड पृथ्वी से करीब 1.12 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर होगा।

इतनी दूरी पर ऐसी टक्कर को सिर्फ इसलिए अंजाम दिया जाएगा ताकि उस टक्कर का कोई नुकसान पृथ्वी तक नहीं पहुंचे।

इस उल्कापिंड का आकार करीब गिजा के पिरामड जितना है।

लेकिन इस आकार का उल्कापिंड भी पृथ्वी से टकराने की स्थिति में बड़ा संकट पैदा कर सकता है।

इसीलिए इस उल्कापिंड को ही परीक्षण के लिए चुना गया है।

इस प्रथम प्रयोग के सफल होने पर वैज्ञानिक बड़े उल्कापिंडों को भी रास्ते से हटाने के अपने प्रयोग को आगे बढ़ायेंगे।

विकल्प के तौर पर वैज्ञानिकों ने पहले से ही अंतरिक्ष में मिसाइल की मदद से उन्हें ध्वस्त कर देने की योजना बना रखी है।

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