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सोना भरे उल्कापिंड के लिए नासा का अभियान चालू होगा




  • सौरजगत के सोना पर भी लग गयी है नजर
  • हर व्यक्ति को औसतन खरबपति बना देगा यह
  • अगस्त में यान को इसके लिए रवाना किया जाएगा
  • धातु वाले उल्कापिंडों की संख्या आकाश में कम ही है
राष्ट्रीय खबर

रांचीः सोना भरे उल्कापिंड पर नासा भी अपना यान भेजना चाहता है। अंतरिक्ष अनुसंधान के नाम पर अमेरिका फिर से उस उल्कापिंड पर भी कब्जा करना चाहता है, जिस पर सोना भरा पड़ा है। वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक साइकी 16 पर इतना अधिक सोना है कि वह दुनिया के हर व्यक्ति को औसतन अरबपति बना सकता है।




वैसे दुनिया में मौजूद पूंजी का समान बंटवारा नहीं होता, यह भी एक सत्य है। अब पहली बार नासा की तरफ से इस उल्कापिंड के लिए अलग से अभियान चलाने की औपचारिक घोषणा की गयी है। दूसरी तरफ नासा को लगातार टक्कर देने वाले एलन मस्क भी पहले ही इस सोना भरे उल्कापिंड का लाभ उठाने की बात कह चुके हैं।

यानी अंतरिक्ष अनुसंधान के नाम पर इस सोना पर पहले कब्जा करने की होड़ प्रारंभ हो चुकी है। नासा की घोषणा के मुताबिक इसी साल के अगस्त माह में एक खास अंतरिक्ष अभियान प्रारंभ होगा। इसका मकसद सोना भरे उस उल्कापिंड के बारे में अधिकाधिक जानकारी हासिल करना है।

सोना भरे उल्कापिंड की पहले ही पहचान हो चुकी थी

सोना भरे इस उल्कापिंड के बारे में पहले ही वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि इस उल्कापिंड में ढेर सारा सोना भरा है। वहां सोना के अलावा लोहा होने की जानकारी मिली है। गहन शोध से उसमें और कौन कौन से धातु हैं, उसकी भी जानकारी मिल जाएगी।

अनुमान है कि इस खगोलीय पिंज पर जो सोना मौजूद है, वह धरती पर सोने के थोक भाव के हिसाब से करीब दस खबर लाख डॉलर मूल्य का है। यानी इसका औसत दुनिया के हर व्यक्ति को करोड़पति बना सकता है।




वह उल्कापिंड जिस धुरी पर घूम रहा है, उसके मुताबिक यह वर्ष 2026 में एक खास स्थान पर पहुंचेगा, जहां अंतरिक्ष यान इसकी जांच कर उसके नमूने भी ले सकेंगे। इस तरह के खगोलीय पिंडों से पहले भी नमूना संग्रह करने का काम किया गया है। यानी उल्कापिंडों पर यान उतारने तथा वहां से नमूना एकत्रित करने की तकनीक सफल साबित हो चुकी है।

उल्कापिंड से नमूना लाने की तकनीक सफल रही

साइकी 16 अपने किस्म का पहला उल्कापिंड है, जिसमें बर्फ के बदले धातु भरे पड़े हैं। इसलिए भी वैज्ञानिकों की रूचि इसकी संरचना को समझने की है। आखिर यह उल्कापिंड कैसे और किन परिस्थितियों में ऐसा बना है, इसके पता तो नमूनों की जांच से चल पायेगा।

दूसरी तरफ इस बात की पहले से ही चर्चा रही है कि अब विकसित देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों की मदद से पृथ्वी के बाहर से खनिज आयात करने की तकनीक पर काम कर रहे हैं। इसके लिए अंतरिक्ष में एक अन्य स्पेस स्टेशन स्थापित कर वहां उनका भंडारण किया जाएगा। इस स्पेस स्टेशन से धरती तक खनिज लाने की अलग व्यवस्था होगी। इससे पृथ्वी के खनिजों पर निर्भरता कम होगी तथा पर्यावरण को होने वाला नुकसान भी कम किया जा सकेगा।

एलन मस्क ने भी किया है इसपर कोशिश का एलान

एक हजार फीट लंबा उल्कापिंड पृथ्वी की धुरी के अंदर आयेगानासा की योजना में अंतरिक्ष यान करीब 2।4 बिलियन किलोमीटर की दूरी तय कर वर्ष 2023 में मंगल के करीब पहुंचेगा। इसके बाद वह इस उल्कापिंड की तरफ बढ़ेगा। जिस धुरी पर यह उल्कापिंड घूम रहा है वहां छोटे बड़े अनेक उल्कापिंड पहले से ही मौजूद हैं। इनमें से कुछ की लंबाई एक हजार किलोमीटर से भी बड़ी है।

सोना भरे इस उल्कापिंड की खोज वर्ष 1852 में खगोल वैज्ञानिक एनिबेले डे गासपेरिस ने की थी। यह करीब दो सौ किलोमीटर चौड़ा है। नासा के अभियान के साथ साथ एलन मस्क का अंतरिक्ष अभियान भी इसकी तरफ सोच रहा है, ऐसा खुद एलन मस्क ही बता चुके हैं।



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