नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी चुनावी समस्या पार्टी के बड़बोले नेता

नरेंद्र मोदी को पार्टी के बड़बोले नेताओं से परेशानी
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सुरेश उन्नीथन



नईदिल्लीः नरेंद्र मोदी और भाजपा को अगले चुनाव में विपक्ष से कम और पार्टी के अंदर

ज्यादा चुनौती मिलने वाली है। इसके लिए पार्टी के कुछ बड़ूबोले नेता मुख्य तौर पर जिम्मेदार हैं।

ऐसे नेता हर मौके -बमौके पर कुछ न कुछ बयान देकर पार्टी के लिए रोज नई नई मुसीबत खड़ी कर रहे हैं।

भाजपा को आगामी चुनाव में अपनी जीत पर पूरा भरोसा है।

पार्टी यह मानती है कि वह अपने संगठन और नरेंद्र मोदी सरकार के काम-काज के

बलबूते पर आसानी से चुनाव जीतने जा रही है।

खुद नरेंद्र मोदी ने भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अजेय और अटल भाजपा का नारा दिया है।

इस नारे के पीछे एक मकसद दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की छवि का लाभ उठाना भी है।

पार्टी कार्यकर्ताओं को जोश दिलाते हुए पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि

पार्टी दोबारा सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आने जा रही है।

क्योंकि संकल्प की शक्ति को कोई पराजित नहीं कर सकता।

नरेंद्र मोदी को वास्तविक स्थिति का पूरा ज्ञान है

स्पष्ट है कि खुद प्रधानमंत्री घटनाक्रमों और उनतक पहुंच रही सूचनाओं की वजह से पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।

इसलिए उन्होंने अजेय और अटल भारत के नारे बदलते हुए अजेय भारत और अटल भाजपा का नारा दिया है।

इस नारा के माध्यम से नरेंद्र मोदी ने एक साथ दो संकेत दिये हैं।

पहला तो पार्टी अब भी आत्मसंतोष की स्थिति में नहीं है।

दूसरी तरफ उन्होंने पूरे संगठन को एक नारे के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि

पार्टी के असली नायक खुद नरेंद्र मोदी ही हैं।

वैसै अमित शाह खुद भी इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि

पार्टी की जीत के लिए एकमात्र नरेंद्र मोदी ही तुरुप का पत्ता है।

उनके बगैर भाजपा की लोकप्रियता कुछ भी नहीं है।

लिहाजा सुर बदलते हुए उन्होंने साफ कर दिया कि पार्टी के बाद दुनिया का सबसे अधिक

लोकप्रिय प्रधानमंत्री यानी नरेंद्र मोदी है।

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता गिरने के पीछे पार्टी के नेता

इस उम्मीद के बीच एक प्रमुख समाचारपत्र समूह द्वारा कराये गये सर्वेक्षण के

नतीजे भाजपा की परेशानी को बढ़ाने वाले हैं।

इंडिया टूडे के इस सर्वेक्षण में यह बताया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता तेजी से नीचे आ रही है।

जनवरी 2018 में मोदी की लोकप्रियता 53 प्रतिशत थी जो अब जुलाई में घटकर 49 प्रतिशत रह गयी है।

इसके बाद पेट्रोल-डीजल के दाम एवं राफेल डील की वजह से इस लोकप्रियता को और बट्टा लगा है।

दूसरी तरफ लोकनीति-एबीपी-सीएडीएस सर्वेक्षण में भी यह निष्कर्ष निकला है कि

प्रधानमंत्री की बतौर प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे आया है।

यह सर्वेक्षण 27 अप्रैल 2017 और 17 मई 2017 के बीच के आंकड़ों पर किया गया था।

इस सर्वेक्षण के आगे की कड़ियों के मुताबिक अब यह लोकप्रियता का ग्राफ नीचे उतरकर 34 प्रतिशत पर आ गया है।

सर्वेक्षण के दायरे में आये 15 हजार से अधिक लोगों ने कहा है कि मोदी सरकार को दोबारा अवसर नहीं मिलना चाहिए क्योंकि इस सरकार ने अपनी घोषणाओं और वादों को पूरा करने की दिशा में कोई काम नहीं किया है।

इन सर्वेक्षणों की बेहतर जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ के मुताबिक लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे आने की असली वजह मोदी के समर्थक नेताओं की घटिया टिप्पणियां और उस पर मोदी की चुप्पी मुख्य वजह है।

नरेंद्र मोदी की पार्टी के नेताओं के बयान से जनता नाराज

इस किस्म की गैरजिम्मेदाराना बयानों ने आम जनता को बहुत ज्यादा नाराज कर दिया है।

इन बकवासी नेताओं को अगर मुंह बंद करने को मजबूर नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में सिर्फ उनकी बातों की वजह से मोदी को और अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

इस संबंध में विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बड़े नेता इस तरीके से बयान देते हैं कि आम जनता का नाराज होना स्वाभाविक है।

मसलन हरियाणा के वरिष्ठ नेता अनिल विज ने नोट पर महात्मा गांधी की तस्वीर होने पर कहा कि गांधी की तस्वीर की वजह से ही भारतीय रुपये की यह हालत हुई है।

उनके इस बयान पर भाजपा के किसी नेता ने उन्हें नहीं टोका।

इससे जनता के बीच गलत संदेश यह गया कि ऐसे बयानों को नरेंद्र मोदी का समर्थन प्राप्त है।

कर्नाटक के भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री बी एस पाटिल याटनाल ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि

भाजपा देश के मुसलमानों के लिए कोई विकास कार्य नहीं करेगी क्योंकि उनलोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया है।

इस नेता से भी इस किस्म के गैर जिम्मेदाराना बयान के लिए कोई सवाल नहीं पूछा गया।

चंद सप्ताह पूर्व केरल में आय़ी भीषण बाढ़ में चार सौ से अधिक लोगों के मारे जाने के बाद

कर्नाटक के इसी नेता ने फिर से कहा कि गाय काटे जाने की वजह से केरल का यह हाल हुआ है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि टीवी चैनलों में मोदी समर्थकों को चीखने चिल्लाने की वजह से भी

देश का पढ़ा लिखा वर्ग इस सरकार की सोच पर संदेह व्यक्त करने लगा है।

नरेंद्र मोदी की लहर को सूनामी बनाने वाले ही हो गये नाराज

इसी वर्ग से समर्थन ने देश में मोदी लहर को सूनामी बनने में प्रमुख भूमिका निभायी थी।

तिरुअनंतपुरम की एक प्रमुख महिला की टिप्पणी है कि जिस तरीके से घृणा को फैलाने का

काम किया जा रहा है, उसे आम समझदार भारतीय कभी भी समर्थन नहीं दे सकता।

उनके मुताबिक भी टीवी चैनलों में जिस तरीके की भाषा भाजपा के लोग व्यवहार करते हैं

और जिस तेवर में बात करते हैं, वह नरेंद्र मोदी की छवि को ही नुकसान पहुंचाने वाला है।

कोच्ची के साफ्टवेयर विशेषज्ञ एन सुभद्रा कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने खुद को

प्रधान सेवक कहने की जो पहल की थी, उसका लेश मात्र भी उनके अनुयायियों में अब नजर नहीं आ रहा है।

ऊपर से साइबर दुनिया में भक्त के नाम से ख्यातिप्राप्त लोगों के अदृश्य चेहरों की टिप्पणियां भी

दिनोंदिन नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को बट्टा लगाने में प्रमुख भूमिका अदा कर रही है।

लोकसभा में प्रवेश करने के बाद खुद नरेंद्र मोदी ने खुद को प्रधानमंत्री के बदले प्रधान सेवक की संज्ञा दी थी।

उनके आचरण में अब तक कोई बदलाव तो नहीं आया और वे लगातार जनता से

इसी अंदाज में वार्ता करते आ रहे हैं।

इस वजह से पार्टी के अन्य बड़बोले नेताओं की कड़वी जुबान जनता को कितना अंदर तक दुखी कर सकती है, इसका अंदाजा उन्हें अच्छी तरह है।

इस बात को भाजपा के अन्य नेता भले ही नहीं समझें लेकिन प्रधान सेवक अच्छी तरह इस बात को समझ रहे हैं कि दरअसल जनता को सरकार से नहीं बल्कि सरकारों को जनता से भयभीत रहना चाहिए।

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