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नरेंद्र मोदी के आसरे झारखंड भाजपा का चुनावी रथ

नरेंद्र मोदी के आसरे ही झारखंड में भाजपा की चुनावी वैतरणी पार लग सकती है।

उनकी जनसभाओं में जुटने वाली भीड़ शायद भाजपा एवं अन्य दलों के नेताओं के

लिए अब ईर्ष्या का विषय बन सकता है।

आम तौर पर अब इस किस्म की जनसभाओं में जनता खुद से चलकर शायद ही जाती है।

दरअसल इस किस्म की जनसभाएं अब शहर के बीच में नहीं होती। सुरक्षा के लिहाज

से जो प्रबंध किये जा सकते हैं, वे भीड़ भाड़ वाले इलाकों में नहीं होते हैं। दूसरी तरफ

जहां इस किस्म की जनसभाओं का आयोजन होता है, वहां जनता के लिए पैदल

पहुंचना आसान नहीं होता। ऊपर से सुरक्षा जांच जैसी प्रक्रिया से गुजरने की परेशानियों

को समझते हुए भी जनता ने भी सामान्य नेताओं की जनसभाओं में जाना ही छोड़

दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन गिने चुने नेताओं में हैं, जिन्हें आज भी जनता सुनना चाहती

है। भाजपा के अंदर नंबर दो के नेता अमित शाह भी खुद अपनी जनसभा में कम भीड़

देखकर नाराजगी जता चुके हैं। हालांकि मीडिया में जिस तरीके से इसे प्रस्तुत किया

गया, बात वैसी नहीं थी। श्री शाह ने अपने कार्यकर्ताओं और उपस्थित जनता को मतदान

के लिए उत्साहित करने के लिहाज यह वह बातें कही थी।

लेकिन कुल मिलाकर यह फिर से साफ हो गया है कि झारखंड में भी भाजपा की जीत

की जिम्मेदार अकेले नरेंद्र मोदी के कंधे पर ही है।

यहां चुनावी अधिसूचना जारी होने के काफी पहले से इस बार 65 पार का नारा भाजपा

का एक गुट लगाता आ रहा है। बीच में जोश अधिक हुआ तो यह नारा इस बार

70 पार तक जा पहुंचा था। चुनाव करीब आने के बाद घर घर रघुवर का नारा चलाने

की कोशिश हुई। खुद प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा ने इस नारे को आगे बढ़ाया था।

नरेंद्र मोदी के मुकाबले नहीं है कोई विरोधी नेता

चुनाव में जैसे ही विरोधी दलों के बीच एक महागठबंधन तैयार हुआ, पूर्व के सारे नारे

दरकिनार कर दिये गये। इसी बीच सरयू राय प्रकरण के सामने आने के बाद अचानक

से भाजपा के अंदर ही सारे समीकरण बिगड़ गये हैं।

स्पष्ट है कि आज के दिन में जमशेदपुर (पूर्वी) सीट झारखंड के राजनीतिक भविष्य

के लिहाज से सबसे अधिक महत्वपूर्ण बन चुकी है। सरयू राय के अलावा कांग्रेस ने

भी अपनी तरफ से अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रो. गौरव बल्लभ को मैदान में उतार दिया है।

प्रथम चरण का चुनाव समाप्त होने बाद आम लोगों के बीच हो रही चर्चा का आकलन

राजनीतिक दलों के रणनीतिकार भी कर रहे हैं। इसी वजह से अब नरेंद्र मोदी खुद

जमशेदपुर और खूंटी में प्रचार करने आ चुके हैं।

जाहिर है कि कमसे कम इन दो सीटों पर अपने प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने में

खुद श्री मोदी को फिर से ताकत लगाने की आवश्यकता महसूस हो रही है। इससे पहले भी

हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को नरेंद्र मोदी के सहारे

चुनावी गाड़ी को आगे बढ़ाना पड़ा था। अब झारखंड विधानसभा का चुनाव समाप्त होने

के बाद पश्चिम बंगाल और दिल्ली के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

सीटों के लिहाज से झारखंड भले ही राष्ट्रीय महत्व का राज्य नहीं हो लेकिन यह स्पष्ट

होता जा रहा है कि महाराष्ट्र के घटनाक्रमों की वजह से अब भाजपा को पहली बार

कठिन चुनौती का एहसास हो रहा है।

स्पष्ट है कि अगर झारखंड में भी चुनाव परिणाम भाजपा के पूर्व रिकार्ड से बेहतर नहीं

रहे तो अन्य राज्यों में तेजी से इसका प्रभाव पड़ेगा और बदहाल अर्थव्यवस्था के दौर

में भाजपा यह खतरा उठाना नहीं चाहती।

एक नेता के भरोसे पूरी पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं

भारतीय राजनीति में किसी एक नेता के भरोसे पूरी पार्टी की चुनावी गाड़ी को आगे

बढ़ाना का खामियजा कांग्रेस भी पहले भुगत चुकी है।

कभी इसी देश में इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया का नारा पूरे कांग्रेस का

लुटिया डूबो चुकी है। यह अलग बात है कि उस दौर में विपक्षी एकता अधिक दिनों

तक कायम नहीं रह पायी। इसी वजह से कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लौटने का अवसर

मिल गया।

इस बार के लोकसभा चुनाव में प्रचंड जनादेश के साथ दोबारा सरकार बनाने में भाजपा

सफल तो हुई है लेकिन कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों का वोट प्रतिशत भी बढ़ा है।

उसके बाद से देश में आम जनता के जरूरी मुद्दे लगातार हावी होते चले जा रहे हैं।

सरकार द्वारा प्रारंभिक दौर में इंकार करन के बाद भी यह स्पष्ट हो चुका है कि तमाम

उपाय करने के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी पर नहीं आ रही है।

नतीजा है कि प्याज और सब्जियों के दाम भी आसमान छू रहे हैं। जाहिर है कि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक करिश्मे की भी एक सीमा है। इस सीमा से जनता

को एक सीमा तक बांधे रखा जा सकता है। उसके बाद मौलिक मुद्दों पर जनता

अपना उत्तर खोजती है।

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