चुनाव में बढ़त में अकेले मोदी

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चुनाव की घोषणा होने के बाद अगली सरकार के लिए अटकलबाजी और प्रचार का दौर प्रारंभ हो चुका है।

पिछली बार जो बातें समझ में नहीं आयी थी, इस बार चुनाव की घोषणा होते ही सोशल मीडिया का यह गुरिल्ला युद्ध अच्छी तरह समझ में आने लगा है।

दरअसल यह युद्ध जैसी स्थिति इसलिए भी है क्योंकि इस बार दोनों तरफ से गोलीबारी होने लगी है।

पिछले चुनाव में इस किस्म के प्रचार को व्यक्तिगत अथवा सामूहिक विचार के तौर पर आंका गया था।

अब बात समझ में आयी है कि दरअसल यह भी प्रचार का एक सोचा समझा तरीका है।

वैसे इस बार इस प्रचार का अंतिम प्रभाव क्या होगा, इसका आकलन अभी तुरंत करना गलत होगा।

लेकिन सोशल मीडिया में चुनाव आयोग क मनाही के बाद भी प्रचार जारी हो गया है।

इस युद्ध का विजेता कौन होगा, इसका फैसला तो चुनाव परिणामों की घोषणा से ही हो पायेगा।

लेकिन प्रारंभिक आकलन के तौर पर यह देखा जा सकता है कि इस बार का चुनाव भी भाजपा सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के भरोसे लड़ रही है।

यह एक तरफ तो भाजपा को बेहतर स्थिति में रखता है तो दूसरी तरफ इस व्यक्तिमूलक प्रचार के चुनावी नतीजे खतरनाक भी हो सकते हैं।

फिलहाल जो स्थिति है, उससे साफ है कि अभी नरेंद्र मोदी अन्य तमाम विरोधी दलों के मुकाबले बहुत आगे हैं।

लेकिन यह बढ़त मतदान केंद्रों तक कितना प्रतिफलित होगा, यह पार्टी के शेष कार्यकर्ताओं पर निर्भर है।

दूसरी तरफ इसी एक बात को अगर अलग कर दें तो भाजपा को इस बार पहले के मुकाबले अधिक टक्कर का सामना करना पड़ेगा, यह भी तय हो चुका है।

इसके मूल में उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटें हैं, जहां बसपा और सपा को गठबंधन हो चुका है।

सिर्फ इसी एक गठबंधन से भाजपा को पहले के सत्तर सीटों के मुकाबले कम सीट आना तय हो चुका है।

इसी तरह राजस्थान और महाराष्ट्र में भी उसकी सीटें कम होंगी।

राजस्थान की सभी 25 सीटों पर दोबारा जीत पाना भाजपा के लिए संभव नहीं होगा।

ऐसे में पिछले चुनाव के 282 का आंकड़ा वह कैसे हासिल करेगी, यह उसके चुनाव कौशल और प्रबंधन पर निर्भर है।

इस तरह बिहार की राजनीति पर गौर करें तो भाजपा को इस बार 22 सीटों के मुकाबले कम सीटें आयेंगी क्योंकि समझौते के तहत जदयू के कोटे में कई सीटें गयी हैं।

पश्चिम बंगाल की 42 सीटें में भाजपा को लाभ की स्थिति मिल सकती है

लेकिन वह भी उत्तर प्रदेश में हो रहे घाटे की भरपाई नहीं कर पायेगी।

पिछले विधानसभा उपचुनाव में पंजाब के बाद एक साथ

राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलेंगना को मिलाकर

78 सीटों में चूंकि कांग्रेस की सरकार है तो भाजपा को यहां पहले के

मुकाबले कम सीटें मिलना तय है।

अब राजस्थान के अलावा उन राज्यों पर गौर करें जहां भाजपा ने कांग्रेस का लगभग सफाया कर दिया था।

इनमें गुजरात की 26 सीटें, मध्यप्रदेश की 27 सीटें, तमिलनाडू की 38 सीटें (गठबंधन में) शामिल हैं।

जाहिर सी बात है कि इस बार भाजपा को इन राज्यों में इस किस्म की अपेक्षित सफलता शायद ही मिले।

लिहाजा अगर इन राज्यों में भाजपा की सीटें कम हो रही हैं तो उनकी भरपाई कहां से होगी, यह भाजपा के लिए चिंता का विषय बनने जा रहा है।

अपने झारखंड की बात करें तो यहां भी पिछले चुनाव में भाजपा को 12 सीटें मिली थी।

लेकिन इस बार की परिस्थितियां भिन्न हैं।

लिहाजा यहां भी भाजपा को सीटों का नुकसान होना तय है।

जहां से सीटें बढ़ने का अनुमान हैं, उनमें सिर्फ दो राज्य पश्चिम बंगाल और उड़ीसा नजर आते हैं।

इन दोनों ही राज्यों में सत्तारूढ़ सरकार से उपजी नाराजगी का सीधा लाभ भाजपा को मिलने जा रहा है।

लेकिन इन दोनों राज्यों की कुल 63 सीटों में भाजपा के ही प्रत्याशी जीतेंगे, यह दावा नहीं किया जा सकता।

इनमें से अगर आधी सीटें भी भाजपा जीते तब भी उत्तर प्रदेश में होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो पायेगी।

इसलिए सीटों के समीकरण में इस बार का चुनाव भाजपा के लिए उतना आसान नहीं होगा।

क्योंकि पिछले चुनाव के वादों और उनके पूरा होने पर सवाल लगातार उठते रहे हैं।

साथ ही भाजपा के स्थानीय लोकसभा सांसदों के क्रियाकलापों का भी मूल्यांकन जनता करने लगी है।

ऐसी स्थिति में लोकप्रियता के शिखर पर होने के बाद भी नरेंद्र मोदी को अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के पूर्ण समर्पण की जरूरत पड़ेगी।

इसलिए माना जा सकता है कि लोकप्रियता के रेस में दूसरों से

काफी आगे होने के बाद भी चुनावी रेस फिलहाल नरेंद्र मोदी

के लिए पिछले बारे के मुकाबले आसान रास्ता नहीं होगा।

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