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नैनो प्लास्टिक के खतरों को भी रेखांकित किया वैज्ञानिकों ने




  • खून का प्रवाह रोकते हैं यह कण

  • प्रोटिन को सोखकर परेशानी पैदा करते हैं

  • सोखे गये प्रोटिन से रक्त सेल भी मरने लगते हैं

  • मानव शरीर में जानलेवा खतरा बनते अति सुक्ष्म कण


प्रतिनिधि

नईदिल्लीः नैनो प्लास्टिक इंसानी शरीर पर क्या क्या बुरा असर डालते हैं, इस पर भी काफी शोध हुआ है।

भारत सहित दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिकों ने इस पर काफी गहन अध्ययन किया है।

इसी का नतीजा है कि यह पाया गया है कि प्लास्टिक के दूसरे किस्म के ये अत्यंत सुक्ष्म कण मानव शरीर के लिए जानलेवा बनते जा रहे हैं।

इस बात का खुलासा तो पहले ही हो चुका है कि खुली आंखों से नजर नहीं आने वाले ऐसे कण भोजन के माध्यम से इंसानी शरीर के अंदर पहुंचते हैं।

इसके अलावा लिपस्टिक, मसकरा, शैम्पू और पानी के बोतलों की वजह से ही यह नैनो प्लास्टिक शरीर के अंदर पहुंच जाता है।

इंसान को इस खतरे का पता नहीं होने की वजह से ही वह जानते हुए भी इनका इस्तेमाल करता है।

भारत में इस शोध से वेल्लोर इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ जुड़े हुए थे।

इनके प्रोफसर नटराजन चंद्रशेखरण और उनके सहयोगियों ने इसके खतरों का गहन विश्लेषण किया है।

उन्होंने यह देखा है कि शरीर के अंदर प्रवेश करने के बाद ऐसे नन्हे प्लास्टिक के कण क्या कुछ प्रभाव डालते हैं।

यह पाया गया है कि ऐसे नैनो प्लास्टिक शरीर के अंदर मौजूद खून को प्रोटिन के साथ चिपकते जाते हैं।

इससे शरीर में खून का प्रवाह ठहरने लगता है।

इसी वजह से खून में मौजूद प्रोटिन भी काम करना बंद कर देते हैं।

जैसे जैसे यह काम धीमा होता जाता है, शरीर के अंदर अन्य बीमारियों सर उठाने लगती हैं

क्योंकि आंतरिक अंगों को पर्याप्त मात्रा में साफ खून और उसमें मौजूद प्रोटिन नहीं मिल पाते हैं।

नैनो प्लास्टिक के प्रभाव को खून के अंदर जांचा गया है




इस शोध को विज्ञान सम्मत तरीके से आगे बढ़ाया गया था।

इसके लिए पांच लोगों के खून के नमूने एकत्रित किये गये थे।

इन नमूनों को अलग किया गया था।

जांच के लिए वैज्ञानिकों ने इस बात का ध्यान रखा था कि रक्तदाता सभी पुरुष हों और पूरी तरह स्वस्थ्य भी हों।

इनके खून के प्लाज्मा और प्रोटिन अलग किये गये थे।

इसके बाद ही नैनो प्लास्टिक और प्लाज्मा के बीच के प्रभाव की जांच की गयी थी।

खून के प्रोटिन मसलन एलबुमिन, ग्लोबुलिन, फिब्रिंग्नोजेंस जैसों की गतिविधियों को देखा गया था।

इन सभी की भूमिका खून के अंदर दबाव को बनाये रखने, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने, खून को जमने से रोकने तथा रोग प्रतिरोधक के तौर पर होती है।

यह देखा गया कि नैनो प्लास्टिक के मौजूद होने की वजह से यह सारे गुण उसी नैनो प्लास्टिक द्वारा सोख लिये जाते हैं।

इन्हें सोखने के बाद इन नैनो प्लास्टिक का आकार भी बढ़ता है।

इस किस्म के नैनो प्लास्टिक का आकार 13 से 600 नैनोमीटर तक का पाया गया।

दरअसल वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान यह देखा कि जब कोई एक प्रोटिन किसी नैनो प्लास्टिक के साथ

चिपक जाता है तो स्वाभाविक गुण की वजह से अन्य प्रोटिन भी इसी की तरफ खींचे चले आते हैं।

सारे प्रोटिन इसी नैनो प्लास्टिक के चारो तरफ चिपकते जाते हैं।

प्रोटिन की कमी से आंतरिक अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

इससे खून में प्रोटिन की कमी होने लगती है और परेशानी पैदा होती है।

अधिक समय तक यह स्थिति कायम रहने की वजह से ऐसे प्रोटिन बाद में काम करना ही बंद कर देते हैं।

जिससे शरीर के अंदर कई किस्म के विकार तेजी से बढ़ने लगते हैं।

वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में यह भी पाया कि लाल और सफेद रक्तकोष के संपर्क में आने के बाद ऐसे नैनो प्लास्टिक एक खास तौर की रासायनिक प्रतिक्रिया पैदा करते हैं।

इससे सफेद और लाल दोनों प्रकार के रक्त सेल मर जाते हैं।

इनके मर जाने के बाद यह जहर शरीर में आगे बढ़ते हुए अन्य कोशिकाओं को मारता जाता है।

इस शोध दल में नटराजन चंद्रशेखरन के साथ पोन्नूसामी मनोगरन गोपीनाथ, विनयागम सारान्या, शनमूघम विजय कुमार, मोहन मिथैली मीरा, शर्मा रुप्रेक्षा, रेशमवाला कुणाल, प्रणय अग्रवाल, जॉन थॉमस और अमिताभ मुखर्जी थे।

उनके इस शोध का परिणाम सामने आने के बाद यह दल नये सिरे से इसके आगे के परीक्षणों की तैयारी में है।

जिसमें वे इस किस्म के नैनो प्लास्टिकों की जटिल प्रक्रियाओं के दौरान हरकतों को देखना

तथा उससे शरीर के आंतरिक अंगों में गहराई तक पड़ने वाले प्रभावों को जांचना चाहते हैं।

इस शोध की तैयारियां प्रारंभ हो चुकी है।


स्वास्थ्य विज्ञान की कुछ और जानकारी यहां हासिल करें

 



Rashtriya Khabar


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