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नंदीग्राम, दरअसल तीन खेमों के असली जंग का मैदान

नंदीग्राम शायद देश में चल रही चुनावी गतिविधियों में सबसे अधिक चर्चित सीट है। इस

सीट की वैसे तो कोई चर्चा नहीं थी लेकिन इतिहास के पन्नों को अगर झांक ले तो यह पता

चलता है कि यही वह इलाका है जो 34 वर्षों के वामपंथी शासन की समाप्ति का कारण बना

था। इस बार नये सिरे से नंदीग्राम की चर्चा सिर्फ इस वजह से हो रही है क्योंकि भाजपा के

तमाम नेताओं की चुनौती को स्वीकारते हुए ममता बनर्जी ने अपनी सुरक्षित सीट छोड़कर

इसी सीट से चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। इस बार भाजपा की तरफ से उनके

खिलाफ शुभेंदु अधिकारी है, जो कभी ममता के विश्वासपात्र सिपहसलाह हुआ करते थे।

लेकिन नंदीग्राम का चुनाव परिणाम यह साबित कर देगा कि भाजपा का यह दांव सही

लगा है अथवा अपने लड़ाकू तेवर की वजह से ममता बनर्जी अब भी पश्चिम बंगाल की

जनता के दिलों पर राज करती हैं। इसलिए यह माना जा सकता है कि पांच राज्यों में होने

वाले विधानसभा चुनाव में अगर राष्ट्रीय परिदृश्य पर विचार करें तो नंदीग्राम सबसे

चर्चित सीट बन चुका है। पैर में चोट लगने से घायल ममता बनर्जी अब व्हील चेयर पर

बैठकर चुनाव प्रचार करने का एलान कर चुकी है। वैसे नंदीग्राम का ग्रामीण वोटर अगर

इतिहास को याद करें तो उसके जेहन में वह सारी बातें आ जाती हैं जो कभी सलीम समूह

को रासायनिक कारखाना बनाने के लिए जमीन देने के वाम मोर्चा शासन का फैसला था।

नंदीग्राम के राजनीतिक जोड़ घटाव के बीच

उस दौरान वाम मोर्चा शासन में माकपा समर्थकों और पुलिस को दमन को जिनलोगों ने

झेला था, उन्हें आज भी याद है कि चारों तरफ से कोई सहारा नहीं दिखने के बाद एक

टिमटिमाते दीये की तरह ममता बनर्जी वहां पहुंची थी और फिर वहां से आंदोलन का ऐसा

मशाल जला कि उसकी आग में पश्चिम बंगाल का वाम मोर्चा शासन ही जलकर राख हो

गया। यह भी याद रखना पड़ेगा कि यह भी किसानों का ही इलाका है और नंदीग्राम का

आंदोलन  भी जमीन नहीं देने के मुद्दे पर था।  इसी मुद्दे पर पश्चिम बंगाल के किसानों को

अपने साथ जोड़ने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा के नेता भी नंदीग्राम आ चुके हैं। किसान

की बात किसान समझेगा, यह स्वाभाविक है। लेकिन अब संयुक्त किसान मोर्चा के हमले

की धार इतनी तीखी हो चुकी है कि उसमें भाजपा कितनी घायल होगी, यह चुनाव

परिणामों की घोषणा से स्पष्ट हो पायेगा। यह भी हो सकता है कि इस आंदोलन से भाजपा

को जबर्दस्त नुकसान होने का जो अंदाजा लगाया जा रहा है वह ख्याली पुलाव पकाने जैसा

है।

जमीनी हकीकत वही है जिसका दावा भाजपा के नेता कर रहे हैं।

कुल मिलाकर नंदीग्राम को अब कोई भी पक्ष हल्के में नहीं लेना चाहता है क्योंकि इस एक

चुनाव परिणाम से पूरे देश में जो राजनीतिक संकेत जाएगा, उसके दूरगामी परिणाम

होंगे।वैसे दूसरी तरफ यह शुभेंदु अधिकारी नहीं बल्कि ममता बनर्जी वनाम नरेंद्र मोदी की

लोकप्रियता की अग्निपरीक्षा भी है। जले पर नमक छिड़कने अब पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत

सिन्हा भी ममता की शिविर में हैं। उनके आने पर भाजपा की तरफ से जो तीर छोड़े गये थे,

उससे भाजपा खुद घायल होती दिख रही है। श्री सिन्हा को रिटायर नेता बताने के क्रम में

भाजपा को अब इस नये सवाल का उत्तर नंदीग्राम में ही देना पड़ रहा है कि अगर श्री

सिन्हा उम्रदराज हैं तो केरल में मेट्रो मैन को भाजपा ने क्या सोचकर मुख्यमंत्री पद का

प्रत्याशी बनाया है। वैसे खुद को एक्सपायरी डेट का नेता बताये जाने के बाद यशवंत

सिन्हा ने देश को फिर से यह याद दिला दिया है कि कंधार विमान अपहरण के  बाद बंधकों

को छोड़ने के बदले खुद को बंधक बनाने का प्रस्ताव देने वाली देश की पहली महिला नेत्री

ममता बनर्जी ही थी। इस एक उल्लेख ने भाजपा के देशभक्ति और राष्ट्रवाद की हवा

निकाल दी है। अच्छी बात यह है कि अन्य गैर जरूरी मुद्दों से अलग इस बार देश में फिर से

कृषि और किसानों की बात हो रही है।

भाजपा भी अपनी तरफ से बार बार खुद को किसानों का हितैषी ही बता रही है

ऐसे में किसान अगर देश की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है तो भी राजनीतिक घटनाक्रमों

में बदलाव का एक दौर ही है। नंदीग्राम के सामान्य दिनचर्या के बीच में खेल खलिहानों में

निश्चित तौर पर राजनीतिक तूफान खड़ा होने के आसान बन चुके हैं। अलबत्ता यह

तूफान महानगरों से चंद घंटे के लिए वहां गये लोगों को समझ में नहीं आयेगी। भीषण

हिंसा के दौर में वहां जाने का मौका मिला था। बिहार के डीजी रैंक के पुलिस आलोक राज

उस वक्त सीआरपीएफ में वहां तैनात थे। उनकी बदौलत जिन इलाकों तक जा पाया था,

वहां के लोग निश्चित तौर पर उस खूनी दौर को नहीं भूले होंगे, जो नंदीग्राम को दुनिया में

चर्चित कर गया था।

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