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नगा अलगाववादी आंदोलनकारियों से केंद्र की बातचीत जारी

  • केंद्र सरकार ने वादे के मुताबिक नगा शांति वार्ता शुरु की

  • अलग झंडे और संविधान की मांग को स्वीकार नहीं

  • नगा विद्रोही गुट ने कहा, चीन से मदद मिलेगी

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी : नगा अलगाववादी आंदोलन की बात की जाए तो इसका इतिहास

करीब 100 साल पुराना है। 1918 में कोहिमा में नगा क्लब बनाया गया था।

इस ग्रुप में कुछ बुद्धिजीवी थे जिन्होंने साइमन कमीशन के सामने मांग रखी।

ये मांग थी कि ब्रिटिश इंडिया में संवैधानिक सुधारों से नगा समुदाय को अलग

रखा जाए। नगा क्लब से ही आगे चल कर 1946 में नगा नेशनल काउंसिल

(NNC) का जन्म हुआ। तब एक अलग सम्प्रभु देश की मांग की गई जिसमें

नगा हिल्स (जो अब अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और म्यांमार के कुछ

हिस्सों में पड़ता है) शामिल हो।

भारत को आज़ादी मिलने से एक दिन पहले यानि 14 अगस्त 1947 को NNC

ने खुद को आज़ाद घोषित कर दिया। इससे नॉर्थ ईस्ट में ग्रेटर नगालैंड और

नगालिम की मांग को लेकर सशस्त्र विद्रोह शुरू हो गया।

अब भी ये क्षेत्र संघर्ष वाले जोन की पहचान रखता है लेकिन तब से अब तक

बहुत कुछ बदल गया है। नगा विद्रोही संगठन ‘नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल

ऑफ नगालैंड (इसाक-मुइवा)’ यानि NSCN-IM म्यांमार में बेस बनाने

के लिए विकल्प तलाश रहा है. ये संगठन अन्य नगा संगठनों के साथ

केंद्र सरकार से चल रही शांति वार्ता का हिस्सा रहा है। सूत्रों के मुताबिक

NSCN-IM के रुख में बदलाव की वजह शांति वार्ता में गतिरोध दूर

नहीं होना हो सकता है।

NSCN-IM वार्ता में शामिल हुआ, लेकिन अलग झंडे और अलग संविधान

जैसे अधिकतर विवादित मुद्दों पर अपना रुख छोड़ने को तैयार नहीं है।सूत्रों

के मुताबिक केंद्र सरकार ने ये साफ कर दिया कि इन दो मांगों को नहीं

माना जा सकता लेकिन NSCN-IM इस पर झुकने को तैयार नहीं है।

नगा अलगाववादी म्यानमार में कैंप बनाने जुटे

जमीनी इंटेलीजेंस इनपुट्स से संकेत मिलता है कि इस संगठन की टॉप

लीडरशिप में शामिल दो नेता म्यांमार में कैंप बनाने के लिए वहां पहुंच भी

चुके हैं। ताज़ा खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक NSCN-IM के 300-500 सशस्त्र

सदस्य भी म्यांमार पहुंच चुके हैं। ये शेरा के सामने कोकी में डेरा डाले हुए

हैं। ये सब इशारा कर रहा है कि NSCN-IM की ओर से शांति समझौते में

हिस्सा बने रहने की संभावना नहीं है। NSCN-K, जो म्यांमार सरहद पार

से सक्रिय है, को सबसे ताकतवर माना जाता है। सीज़फायर समझौते

में NSCN-IM, NSCN- KN (किटोवी नियोकपाओ) और NSCN-R

(रिफॉर्मेशन) शामिल हैं। सीज़फायर के ज़मीनी नियमों के तहत इन ग्रुपों

के सदस्य हथियार लेकर नहीं घूम सकते. इनके हथियार तालों में बंद हैं।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को उम्मीद है कि 31 मार्च के बाद कोई

सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। केंद्र सरकार 1997 से ही

NSCN-IM से शांति वार्ता करती रही है। 1997 में ये नगा अलगाववादी

संगठन सीज़फायर समझौते का हिस्सा बन गया था. NSCN-IM की

मांग रही है कि असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगा आबादी

वाले इलाकों को मिला कर एक किया जाए। लेकिन केंद्र सरकार इसके

खिलाफ रही है। नरेंद्र मोदी सरकार ने NSCN-IM के साथ 2015 में एक

फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का मकसद जल्दी से

जल्दी भारत में सबसे पुरानी चली आ रही विद्रोही समस्या पर विराम

लगाना था। NSCN-K को सभी सशस्त्र नगा विद्रोही ग्रुपों में सबसे घातक

माना जाता रहा है।

वहीं NSCN-IM ने अपना रुख नर्म किया और केंद्र सरकार के साथ वार्ता

के लिए तैयार हो गया। सूत्रों के मुताबिक शांति वार्ता में गतिरोध दूर नहीं

होने की वजह से ये खतरा भी है कि कहीं NSCN-IM अब NSCN-K से

मिल कर चलने के विकल्प को ना अपना ले।

सुरक्षा एजेंसियों की हर घटना पर है तीखी नजर

घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखने वाले एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया

कि ये जमीनी इंटेलीजेंस पर आधारित है।लेकिन सवाल ये है कि क्या वे

फिर जंगलों में जाने को तैयार हैं। इनके ज्यादातर सदस्य सीज़फायर के

बाद जुड़े हैं और नगालैंड-मणिपुर में निर्धारित कैम्पों में रह रहे हैं। वो

कभी लड़ाई में शामिल नहीं रहे हैं इसलिए उनके लिए जंगलों में वापस

जाना आसान नहीं होगा।

दूसरी ओर नगालैंड के विद्रोही समूह एनएससीएन(के) के अध्यक्ष यंग औंग

ने कहा है कि शुरुआती दिनों में चीन की ओर से नगा विद्रोहियों को मदद

मिली। इसके लिए वह हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे. उम्मीद है कि हमें जब

जरूरत होगी, तब उससे मदद मिलेगी।उन्होंने कहा, यद्यपि चीनी ताकत

जरूरी है पर नगालैंड के लोगों की ताकत इस संघर्ष की असली ताकत है।

युंग औंग ने कहा, ‘आज चीन सहित पूरी दुनिया हमारे मसले पर ज्यादा

ध्यान दे रही है। नगा लोग अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में सहयोग

और नैतिक समर्थन के लिए हमेशा ही चीन के शुक्रगुजार रहे हैं। एक

संघर्षशील देश के रूप में, यह सही है कि नगाओं को मदद की जरूरत है,

पर हम अपनी सीमाओं को जानते हैं।

भारत और म्यांमार की सीमा पर है इनकी सक्रियता

जब तक भारत और म्यांमार का हमारे देश में प्रभुत्व रहेगा, संघर्ष होगा ही.

हम तब तक लड़ते रहेंगे जब तक कि अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर लेते।

हम उनके संयुक्त राजनीतिक और सैनिक ऑपरेशन को रोक नहीं सकते,

क्योंकि हमारे संघर्ष को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए उनके पास यह

एकमात्र विकल्प है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि एनएससीएन/

जीपीआरएन कमजोर हो जाएगा। तथ्य यह है कि इस समय हम पहले से

कहीं अधिक मजबूत हैं।जब तक हमारे पास हमारे अधिकार हैं और लोगों

का समर्थन हमें मिल रहा है, दुनिया की कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती

है, नगालैंड के विद्रोही गुट एनएससीएन(के) के अध्यक्ष ने कहा।

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