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मुख्यमंत्री की कुर्सी खतरे में दिखने के बाद नड्डा ने नेताओं को दिल्ली बुलाया

  • मुकुल राय के मिशन त्रिपुरा से घबड़ायी भाजपा

  • पार्टी के अंदर पहले से ही है ढेर असंतोष

  • बागियों से संपर्क साध रहे हैं मुकुल राय

  • नड्डा ने सत्तारूढ़ पार्टी को भी बुलाया

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी : मुख्यमंत्री की कुर्सी पर खतरा मंडराते देख भाजपा सतर्क हो गयी है। तृणमूल

कांग्रेस के नेता मुकुल राय ने त्रिपुरा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को हटाने के लिए

मिशन त्रिपुरा अभियान शुरू कर दिया है। इसको लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व

बड़ी चिंतित हो रही है। दरअसल,बंगाल विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद

तृणमूल कांग्रेस का अब अगला लक्ष्य त्रिपुरा है। यहां तृणमूल की जमीन वरिष्ठ नेता

मुकुल रॉय ने ही तैयार की थी। अब वह फिर से अपनी पुरानी पार्टी में लौट आए हैं। दोबारा

से मुकुल त्रिपुरा की राजनीति में सक्रिय होते दिख रहे हैं। इसी समय जोड़-तोड़ की

राजनीति में माहिर मुकुल त्रिपुरा में भाजपा नेतृत्व को कमजोर कर उनके बड़े नेताओं को

तृणमूल के खेमे में लाने की योजना बना रहे हैं। जल्द तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव

अभिषेक बंद्योपाध्याय और मुकुल रॉय त्रिपुरा दौरे पर निकलेंगे। दरअसल, तृणमूल

कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करना चाहती है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी कुछ दिनों

पहले ही इसका एलान कर चुकी हैं। मिशन त्रिपुरा उसका ही एक हिस्सा है। त्रिपुरा में

बांग्ला भाषी लोगों की आबादी अच्छी खासी है और तृणमूल इनमें अपनी पैठ जमाना

चाहती है। इसके लिए तृणमूल कांग्रेस अपने वरिष्ठ नेता मुकुल राय को त्रिपुरा की

राजनीति में फिर से सक्रिय करना चाहती है।सूत्रों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस ने त्रिपुरा

में भाजपा नेतृत्व को कमजोर कर उनके बड़े नेताओं को पार्टी में लाने की अहम जिम्मेदारी

मुकुल रॉय को सौंपी है। भाजपा के लिए बंगाल के साथ ही त्रिपुरा में भी अब तृणमूल बड़ा

सिरदर्द बनने लगी है, क्योंकि त्रिपुरा में भाजपा दो खेमों में बंटी है जिसके एक खेमे में

मुकुल की पैठ काफी अच्छी मानी जाती है।

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बागियों की भी नाराज नजर

त्रिपुरा की बात करें तो जब मुकुल रॉय तृणमूल में थे तो उन्होंने कांग्रेस के छह विधायकों

को पार्टी में शामिल कराया था। फिर जब वे भाजपा में गए तो इन सबको भाजपा में ले

गए। अभी ये सारे भाजपा के विधायक हैं। इनमें एक सुदीप रॉय बर्मन हैं, जो मुकुल रॉय के

बहुत करीब हैं। सुदीप रॉय बर्मन पिछले कुछ दिनों से प्रदेश के मुख्यमंत्री बिप्लब देब से

नाराज विधायकों का नेतृत्व कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन दिनों मुकुल रॉय फिर

सुदीप रॉय बर्मन के संपर्क में हैं, जो प्रदेश में कुछ उलटफेर के संकेत दे रहा है। इन गंभीर

परिस्थितियों मेंत्रिपुरा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में बढ़ते असंतोष के

बीच पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भाजपा गठबंधन सहयोगी इंडिजीनियस पीपुल्स

फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) को आदिवासी क्षेत्रों का जायजा लेने के बाद नयी दिल्ली

तलब किया है। पिछले महीने त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल

(एडीसी) चुनाव में शाही वंशज प्रद्योत किशोर देबबर्मन के जीतने के बाद भाजपा और

आईपीएफटी का वजूद न के बराबर रह गया। आईपीएफटी के सहायक महासचिव मंगल

देवबर्मा ने कहा कि उन्हें नड्डा ने 23 जून को नयी दिल्ली में आमंत्रित किया है और

भाजपा अध्यक्ष नड्डा के साथ बैठक के बाद आईपीएफअी नेता केंद्रीय गृह मंत्री अमित

शाह से उनके लंबे समय से लंबित मुद्दों पर चर्चा कर बात करेंगे, जिनके आधार पर

आईपीएफटी ने 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के साथ गठबंधन किया था।

हाल ही में जब तृणमूल कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब के खिलाफ असंतोष जताने

के लिए त्रिपुरा में अपनी गतिविधियों को फिर से शुरू करने की घोषणा की।

भाजपा ने शुरु में इसे हल्के में लिया था

तो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने असंतोष को शांत करने के लिए अपने एक नेता को भेजा

लेकिन इस पर कोई फैसला नहीं हो सका। केंद्रीय टीम ने अलग-अलग विधायकों, सांसदों

और मंत्रियों की प्रतिक्रिया को जाना था और पिछले साढ़े तीन वर्षों में सरकार के प्रदर्शन

पर अपने सहयोगी आईपीएफटी के नेताओं के साथ चर्चा की थी। विधानसभा की 20

आदिवासी आरक्षित सीटों में से 19 विधायक होने के बावजूद आईपीएफटी हाल ही में

संपन्न एडीसी चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी। सत्तारूढ भाजपा आदिवासी

परिषद के 28 सदस्यों में से नौ सीटों पर किसी तरह से जीत हासिल करने में सफल रही

और भाजपा-आईपीएफअी गठबंधनी को आदिवासी क्षेत्रों में वोट फीसदी घटकर 30

फीसदी रह गया। शाही वंशज के टीआईपीआरए ने भाजपा-आईपीएफटी के पूरा वोट शेयर

पर कब्जा कर लिया।

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