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म्यांमार में जानलेवा हिंसा में अब तक 780 लोग मारे गये

  • मिजोरम के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को लिखा पत्र

  • भारत के कई संगठनों ने की म्यांमार सैनिक शासन की निंदा

  • तमाम कोशिशों के बाद भी वहां नहीं थम रहा है खूनी संघर्ष

  • शरणार्थियों की समस्या दिनोंदिन गंभीर होती जा रही है

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी: म्यांमार में जानलेवा हिंसा और प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी की धमकियां

सेना को सत्ता छोड़ने और लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को फिर से बहाल करने

की मांग कर रहे प्रदर्शनों को दबाने में नाकाम रही हैं। भारत-म्यांमार सीमा से गश्त करने

वाले बीएसएफ ने भारतीय सुरक्षा अधिकारी को कहा कि मध्य म्यांमार में सुरक्षा बलों ने

तख्तापलट के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर शनिवार को गोली चला दी जिसमें दो

लोगों की मौत हो गई। स्थानीय सुरक्षा अधिकारी ने यह जानकारी दी। मानवाधिकारों के

लिए काम करने वाले एक संगठन ने कहा है कि म्यांमार में एक फरवरी को तख्तापलट के

बाद से बढ़ी हिंसा में कम से कम 780 नागरिक मारे गए हैं। वहीं मानवाधिकार संगठन

असिस्टेंस एसोसिएशन फॉर पॉलिटिकल प्रिजनर्स ने गुरुवार को बताया कि मृतकों में 78

बच्चे हैं। करीब 3,294 लोगों को हिरासत में लिया गया या सजा दी गई । इस तख्तापलट

ने दक्षिणपूर्वी एशियाई देश में लोकतंत्र की दिशा में हुई वर्षों की धीमी प्रगति पर पानी फेर

दिया है। बीएसएफ ने खबर दी कि सरकारी सुरक्षा बलों ने मध्य म्यांमार में गुरुवार को

प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला दीं जिसमें कम से कम 10 लोगों को जान से हाथ धोना

पड़ा। इस बीच दशकों से सरकार से लड़ रहे जातीय अल्पसंख्यक विद्रोही समूह का

प्रतिनिधित्व करने वाले कारेन नेशनल यूनियन ने थाईलैंड की सीमा से लगते अपने

गृहनगर में गांवों और निहत्थे नागरिकों के खिलाफ ‘लगातार बमबारी और हवाई हमलों’

की निंदा की है। वहीं क्षेत्र में काम कर रही एक राहत एजेंसी फ्री बर्मा रेंजर्स के अनुसार

कारेन के कंट्रोल वाले इलाकों में 27 मार्च के बाद से अब तक 42 से अधिक नागरिक मारे

गए और 29,000 से अधिक लोगों को अपनी जगह छोड़कर विस्थापन का शिकार होना

पड़ा।

म्यांमार में जानलेवा हिंसा की वजह से भारत में आ रहे शरणार्थी

भारत ने म्यांमार में जानलेवा हिंसा और जानमाल के नुकसान की निंदा की है। इसके साथ

ही भारत ने मामले में अधिकतम संयम बरतने और हिरासत में लिए गए नेताओं की

रिहाई की बात भी की है। बता दें कि 1 फरवरी को म्यांमार की सेना ने देश की सरकार को

गिरा दिया और एक साल के लिए सत्ता पर कब्जा कर लिया था। इसके साथ ही देश के

शीर्ष राजनीतिक हस्तियों को हिरासत में लिया गया, जिसमें आंग सान सू की और

राष्ट्रपति यू विन म्यिंट शामिल हैं।दरअसल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने बुधवार को

म्यांमार की स्थिति पर विचार-विमर्श प्रस्तुत किए थे। जिस दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत

के स्थायी प्रतिनिधि टी.एस. तिरुमूर्ति ने ट्वीट करते हुए म्यांमार में हो रही हिंसा और

जानमाल के नुकसान पर निंदा व्यक्त की है। वहीं हिरासत में लिए गए नेताओं की रिहाई

की बात भी कही है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने पिछले सप्ताह म्यांमार में जानलेवा हिंसा 

और सुरक्षा बलों द्वारा बच्चों और युवाओं सहित दर्जनों नागरिकों की हत्या करने पर

निंदा व्यक्त की थी। वहीं अब भारत की ओर से टी.एस. तिरुमूर्ति ने म्यांमार में हो रही

हिंसा को रोकने के लिए शांति से हल करने के पर जोर दिया है। हालाँकि, पड़ोसी देश

म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद सीमा पार से भाग कर खासकर पूर्वोत्तर के मिजोरम,

नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर आने वाले शरणार्थियों की समस्या लगातार

गंभीर होती जा रही है। लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर कोई ठोस फैसला नहीं

किया है। इस वजह से खासकर म्यांमार सीमा से लगे मिजोरम, नागालैंड और मणिपुर की

सरकार असमंजस में है। मणिपुर की बीजेपी सरकार ने तो पहले इन शरणार्थियों के लिए

राहत शिविर खोलने से इंकार कर दिया था।

पहले केंद्र सरकार ने दरवाजे बंद करने को कहा था

लेकिन इस फैसले की आलोचना के बाद सरकार ने इसे वापस ले लिया है। आठ हजार से

ज्यादा लोग सीमा पार कर इलाके में पहुंच चुके हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही

कह चुके हैं कि फिलहाल इन शरणार्थियों को भोजन और दवाएं तो दी जा सकती हैं।

लेकिन भारत अवैध घुसपैठ को बढ़ावा नहीं दे सकता। मोटे अनुमान के मुताबिक, बीते

करीब दो महीने में 8 हजार से ज्यादा ऐसे शरणार्थी मिजोरम, नागालैंड और मणिपुर में

पहुंच चुके हैं। म्यांमार के चिन राज्य के साथ मिजोरम की 510 किलोमीटर लंबी सीमा

सटी है। राज्य में शरण लेने वाले म्यांमार के ज्यादातर नागरिक चिन से हैं। उनको चिन

या जो समुदाय का कहा जाता है। वे मिजोरम के मिजो समुदाय के साथ संस्कृति साझा

करते हैं। म्यांमार में तख्तापलट के बाद देश के पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंचने वाले म्यांमार

शरणार्थियों को लेकर चल रही राजनीतिक खींचतान के बीच मिजोरम के मुख्यमंत्री

जोरमथांगा ने कहा है कि वे केंद्र सरकार से म्यांमार को लेकर अपनी विदेश नीति में

बदलाव करने और शरणार्थियों को वापस नहीं भेजने की अपील करेंगे। इससे पहले बीते

सप्ताह उन्होंने म्यांमार से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने और शरणार्थियों का तेजी से

प्रत्यर्पण सुनिश्चित करने के केंद्र सरकार के आदेश को अस्वीकार्य बताते हुए प्रधानमंत्री

नरेंद्र मोदी से मानवीय आधार पर उनको शरण देने का अनुरोध किया था।मुख्यमंत्री

जोरमथांगा कहते हैं। “मुझे लगता है कि म्यांमार के लोगों को लेकर भारत सरकार को

और उदार रवैया रखना चाहिए। मैंने प्रधानमंत्री मोदी से भी यह कहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा है कि भारत को उदार होना पड़ेगा

म्यांमार में जानलेवा हिंसा  से यहां आने वाले शरणार्थियों की तादाद लगातार बढ़ रही है।

हमें उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाना होगा। उन्होंने कहा था कि म्यांमार में बड़े

पैमाने पर मानवीय तबाही हो रही है और सेना बेकसूर नागरिकों की हत्या कर रही है।

इससे पहले 13 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से चार पूर्वोत्तर राज्यों को भेजे गए

एक पत्र में म्यांमार से अवैध तौर पर आ रहे लोगों को कानून के अनुसार नियंत्रित करने

की बात कही गई थी। उधर, मणिपुर सरकार ने बीते 26 मार्च को म्यांमार की सीमा से सटे

जिलों के उपायुक्तों को एक आदेश जारी कर म्यांमार से भागकर आ रहे शरणार्थियों को

आश्रय और खाना देने से इनकार और उन्हें शांतिपूर्वक लौटाने की बात कही थी। लेकिन

कड़ी आलोचना के बाद इस आदेश को वापस ले लिया गया। दूसरी ओर, म्यांमार में सैन्य

तख्तापलट के बाद हुई हिंसा के बाद पूर्वोत्तर भारत आने वाले शरणार्थियों को लेकर भारत

के गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि भारत उन्हें राशन और दवाइयां देने को तैयार है

लेकिन अवैध तरीके से घुसपैठ को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता है।

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