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आपसी संवाद में समुद्र में ह्वेल भी इंसानों के जैसे ही संपर्क करते हैं

  • अनेक प्राणी आपस में बात चीत करते हैं

  • स्पर्म ह्वेल के ध्वनि संकेत सबसे अधिक

  • अत्याधुनिक तकनीक से मिल रही है मदद

  • उनसे संवाद स्थापित करने का अनुसंधान जारी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः आपसी संवाद इंसानों की सबसे प्रमुख विशेषता है। लेकिन दुनिया के कई प्राणी भी

अपने समूहों में बोलकर यह संवाद स्थापित करते हैं। भले ही हमें उनकी भाषा समझ में

नहीं आये, लेकिन यह विज्ञान प्रमाणित सत्य है। इस दिशा में अलग अलग अनुसंधान

चल रहे हैं। इन अनुसंधानों का एक लक्ष्य प्रकृति के करीब रहने वाले इन प्राणियों के बीच

के आपसी संवाद को समझना है। कई अवसरों पर प्रकृति प्रदत्त गुणों की वजह से यह

प्राणी अथवा पक्षी किसी प्राकृतिक आपदा के आने के पहले ही पूर्व संकेत आपस में देते हैं।

वे आपसी संवाद से किसी आसन्न खतरे की चेतावनी देते हैं। इसी वजह से उनके आपसी

संवाद को समझने की कोशिशें जारी है। इधर समुद्र में ह्वेल भी आपसी संवाद से अपने

समूह और दूसरे समूहों से संपर्क बनाये रखते हैं। हजारों मील के सफर के दौरन उन्हें पता

होता है कि उसके समूह का अथवा किसी दूसरे समूह का ह्वेल कितनी दूरी पर है। समुद्र के

अंदर ह्वेल की आवाज काफी तेज होती है और यह काफी दूर तक सफर करती है। इससे वे

एक दूसरे से आपसी संवाद कायम किये रहते हैं। अब इसी दिशा में शोध कर उनके बीच के

आपसी संवाद को समझने तथा उनकी मदद से उनकी आवाज से कौन से संकेत दिये जा

रहे हैं, उन्हें भी समझने की कोशिशें हो रही हैं। अब तक की जानकारी के मुताबिक समुद्र

का स्पर्म ह्वेल सबसे तेज आवाज निकालने वाला प्राणी है। वे अलग अलग किस्म की

ध्वनि निकालते हैं। उनकी प्रजाति को इन अलग अलग किस्म की ध्वनि से मिलने वाले

संकेतों को समझने का प्राकृतिक गुण हासिल होता है। एक दूसरे से कई सौ मील की दूरी

पर होने के बाद भी वे इसे सुन लेते हैं।

आपसी संवाद में अनेक किस्म की ध्वनियां शामिल हैं

वैज्ञानिक मानते हैं कि यह भी अपने किस्म की एक भाषा है, जिससे आपसी संवाद

स्थापित होता रहता है। इसी भाषा में इस्तेमाल होने वाले शब्दों और उसके अर्थ को

समझने की कोशिशें जारी हैं। इसके लिए स्पर्म ह्वेल के शब्दों को रिकार्ड कर उनका अर्थ

समझने के लिए कंप्यूटर मॉडलों का भी प्रयोग किया जा रहा है। इस प्रजाति को ही इस

शोध के लिए इसलिए भी चुना गया है क्योंकि उनके बीच का आपसी संवाद दूसरों से

अधिक होता है। इसलिए उनके ध्वनि संकेत भी अलग अलग होते हैं। अजीब बात यह है

कि आपसी संवाद के लिए इस्तेमाल होने वाले यह ध्वनि संकेत दस सेकंड से होकर आधा

घंटा तक का होता है। इसलिए उसका अधिक से अधिक आंकड़ा एकत्रित कर उनका

विश्लेषण किया जा रहा है। इन अलग अलग ध्वनि संकेतों के माध्यम से स्पर्म व्हेल अपने

परिचित को क्या संदेश देते हैं, इसे तो दोनों तरफ से आचरण को देखकर ही समझा जा

सकता है। इसके लिए ध्वनि संकेत रिकार्ड करने के साथ साथ ध्वनि संकेत मिलने के बाद

दूसरे तरफ की प्रतिक्रिया को भी देखा जा रहा है। इस बारे में जारी शोध में अन्य प्राणियों

के भी आपसी संवाद का उल्लेख किया गया है लेकिन यह पाया गया है कि दूसरी प्रजाति

के प्राणियों के ध्वनि संकेत में उतनी विविधता नहीं है। शोधकर्ता मानते हैं कि

आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस की मदद से इन ध्वनि संकेतों का विश्लेषण शायद आसान हो

जाएगा। हमलोगों के टेलीग्राम जैसे मोर्स कोड की तरह यह समुद्र की गहराई में आपस में

संपर्क स्थापित करते हैं। समुद्र का यह प्राणी कई बार समुद्र में एक किलोमीटर से भी

अधिक की गहराई तक जा सकता है। वहां से भी वे ध्वनि संकेत भेजते हैं जो सैकड़ों मील

दूर तक साफ सुनाई पड़ता है।

उनकी आवाज कई सौ मील दूर तक दूसरे ह्वेल सुन पाते हैं

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक डेविड ग्रूबर कहते हैं कि पहले तो उनकी गतिविधियों को पकड़

पाना कठिन था। अब अधिक गहराई तक झांकने वाले उपकरणों की मदद से यह काम

बहुत आसान हो गया है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस के साथ साथ ड्रोन और

गहरे समुद्र के अत्याधुनिक रोबोट सबमेरिन भी उपलब्ध हैं। इनकी मदद से आपसी संवाद

और उसकी प्रतिक्रिया का बेहतर विश्लेषण किया जा सकता है। इस शोध दल ने अब तक

एक लाख ऐसे स्पर्म व्हेल के ध्वनि संकेतों को रिकार्ड किया है। इस आंकड़े को और बेहतर

बनाने के लिए ड्रोन की मदद से व्हेलों के झूंड के पास माइक्रोफोन लगाने की योजना पर

काम चल रहा है। आपसी संवाद के तहत किसी ऐसे झूंड के नजर आने पर ड्रोन की मदद से

उनके पास माइक्रोफोन गिराये जा सकते हैं जो ध्वनि संकेत रिकार्ड कर सकेंगे। वैज्ञानिक

मानते हैं कि इस एक प्राणी के ध्वनि संकेतों को समझ लेने के बाद अन्य प्राणियों के

आपसी संवाद को भी समझ पाना अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा।

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