चूहों को भी मिल गयी इंफ्रारेड दृष्टि

चूहों को भी मिल गयी इंफ्रारेड दृष्टि
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वैज्ञानिकों ने ईजाद की नये पद्धति का इंजेक्शन
एक बार में दस सप्ताह तक असर
साइड एफेक्ट का प्रभाव भी नगण्य रहा
अगले चरण में होगा इंसानों पर परीक्षण

नईदिल्लीः चूहों ने इंफ्रारेड दृष्टि पाकर खुद में ही अचंभित महसूस किया। वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग के तहत उन्हें खास किस्म का इंजेक्शन दिया था। इसी इंजेक्शन की वजह से उन चूहों में नाइट विजन के गुण विकसित हो गये। यह प्रभाव चूहों पर दस सप्ताह तक रहा। दरअसल इस प्रयोग को करते वक्त वैज्ञानिक यह जांचना चाहते थे कि इससे साइड एफेक्ट के प्रभाव क्या होते हैं। परीक्षण में यह पाया गया कि चूहों पर यह प्रभाव नगण्य तौर पर पड़ा है।

चीन के साइंस एंड टेकनोलॉजी विश्वविद्यालय में यह प्रयोग किया गया था। इस प्रयोग के निष्कर्षों की जानकारी एक रिपोर्ट के तौर पर जर्नल सेल में प्रकाशित की गयी है। इसमें बताया गया है कि शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग को अंजाम देने के लिए चूहों की आंखों के अंदर नैने पार्टिकल (अति सुक्ष्म कण) डाले थे। इन्हीं सुक्ष्म कणों की वजह से उनमें इंफ्रा रेड विजन विकसित हुए थे। यह देखा गया कि एक बार इंजेक्शन देने के बाद उसका प्रभाव करीब दस सप्ताह तक रहा। इस प्रयोग के आगे बढ़ने पर इंसानों में भी यह गुण विकसित करने पर शोध आगे बढ़ सकता है।

वैसे समझा जाता है कि इस विधि के पूरी तरह सफल होने के बाद उनका अधिकतर इस्तेमाल सामान्य नागरिक सुरक्षा के अलावा सैनिक कार्रवाइयों में बेहतर तरीके से किया जा सकता है क्योंकि तब इंसान भी रात के अंधेरे में साफ साफ देख पायेगा। प्रयोग में यह पाया गया कि जिन्हें यह इंजेक्शन लगाये गये थे, वे दिन की रोशनी में भी इंफ्रा रेड किरणों को पहचान पा रहे थे यहां तक कि वे अलग अलग आकार की पहचान भी सही तरीके से करते रहे।

मालूम रहे कि इंसानों और कई अन्य जानवरों के देखने की क्षमता दूसरी  होती है। इस श्रेणी के जीव सिर्फ दिखने वाली रोशनी में ही कुछ देख पाते हैं। इनमें इंद्रधनुषी रंग के तरंगों का रंग शामिल होता है। दूसरी तरफ हमारे आस-पास हमेशा ही इंफ्रा रेड यानी पारा बैगनी किरणें मौजूद होती हैं। इन किरणों के तरंगों की लंबाई सामान्य किरणों से काफी अधिक होती है। इसलिए इंसान सहित कुछ जानवरों की आंखें इन्हें नहीं पकड़ पाती हैं।

दरअसल इंफ्रा रेड किरणों का परावर्तन हर पदार्थ से निरंतर होता रहता है। गर्मी की वजह से यह किरणें निकलती रहती हैं। अब इन किरणों को भी दैनंदिन इस्तेमाल के काम में लाने के लिए चीन के शोधकर्ताओं ने यह प्रयोग चला रखा है। इस शोध से जुड़े चीन के विश्वविद्यालय के तियान जू ने कहा कि दरअसल दिखने लायक हर चीज विद्युतीय चुंबकीय दायरे के भीतर की चीजें हैं। इनमें वह रोशनी बहुत कम हिस्सा घेरती है, जिनकी मदद से इंसान देख पाता है। इसलिए अगर इंसान के देखने की क्षमता इस दायरे में बढ़ा दी जाए तो मानव बहुत कुछ देख पायेगा, जो फिलहाल उसकी आंखों से अदृश्य है। इन अदृश्य तरंगों में ढेर सारा संकेत छिपा होता है।

चूहों की आंखें भी इंसानों के जैसी ही हैं

चूंकि इंसान की आंखों इसके लिए नहीं बनी, इसलिए वह इन्हें देख समझ नहीं पाता। इंफ्रा रेड किरणों को नहीं देख पाने की वजह की भी व्याख्या की गयी है। जिसमें यह बताया गया है कि इंसान की आंखों पर जब रोशनी पड़ती है तो वहां के फोटो रिसेप्टर सेल के माध्यम से हमें दिमाग तक सामने वाली वस्तु के आकार और रंग का पता चलता है। चूंकि इनके तरंगों की लंबाई कम होती है, इसलिए हम इन्हें देख पाते हैं। अब नये प्रयोग के तहत नैनो पार्टिकल्स की मदद से आंखों के फोटो रिसेप्टर सेलों की क्षमता बढ़ाने की कोशिश हो रही है। चूहों पर भी ऐसा ही प्रयोग किया गया है।

इसकी क्षमता बढ़ने से अधिक लंबाई वाले इंफ्रा रेड किरणों को देखने की क्षमता विकसित हो जाती है। उसी आधार पर ब्रेन तक इसके संकेत भी पहुंचने लगते है। दरअसल प्रयोग में लाये गये नैनो पार्टिकल आंखों के अंदर इन किरणों को सामान्य किरणों की भांति तब्दील करने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। इससे दृष्टि क्षमता विकसित हो जाती है क्योंकि दिमाग तक सारे संकेत सामान्य तरीके से ही पहुंचने लगते हैं। इन नैनो पार्टिकलों की भूमिका लंबी आकार के इंफ्रारेड किरणों को अपने में कैद कर उन्हें कम लंबाई के दृष्टि तरंगों में बदलने भर की होती है। चूहों पर यह प्रयोग इसलिए किया गया है क्योंकि उसकी आंखें भी इंसानों की तरह इंफ्रा रेड किरणों को नहीं देख पाती है। प्रारंभिक प्रयोग के दौरान कुछ चूहों की आंखों के कॉर्निया पर धुंधलापन आया था, जो एक सप्ताह के अंदर ही अपने आप गायब हो गया।  

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